आपातकाल एक काली कहानी 

 आपातकाल एक काली कहानी 

सतीश शर्मा  

अब तक में कुल तीन बार आपातकाल लग चुका है जिसमें वर्ष 1962, 1971 तथा 1975 में अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया था। भारत का संविधान राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह पर आपातकाल की घोषणा करने की अनुमति देता है । 26 अक्टूबर-21 नवंबर, 1962: चीन के साथ भारत के युद्ध के दौरान “बाहरी आक्रमण” के आधार पर लगाया गया,3-17 दिसंबर, 1971 भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के दौरान “बाहरी आक्रमण” के आधार पर इसे लागू किया गया। 25 जून, 1975–21 मार्च, 1977 राजनीतिक अस्थिरता और “आंतरिक अशांति” के आधार पर इंदिरा गांधी सरकार की आलोचना के दौरान लगाया गया । 

1970 के दशक की शुरुआत में समाजवादी नेताओं, जयप्रकाश नारायण और जॉर्ज फर्नांडीस ने इंदिरा गांधी और उनकी सरकार के खिलाफ हड़ताल और विरोध प्रदर्शन आयोजित किए।जय प्रकाश  नारायण ने गुजरात और बिहार राज्यों में मौजूदा छात्र आंदोलन को इंदिरा गांधी के शासन के खिलाफ आंदोलन में बदल दिया जो “जेपी आंदोलन” के रूप में जाना जाता है ।  जय प्रकाश  नारायण को जेपी के नाम से भी  जाना जाता था । मई 1974 में फर्नांडिस ने रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल आयोजित की, जिसने देश के रेल नेटवर्क को तीन सप्ताह तक ठप कर दिया। जय प्रकाश नारायण, जो प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर पुलिस के हमले में घायल हो गए थे, ने रैलियों को संबोधित किया और नारा लगाया “सिंहासन खाली करो, जनता आती है” (“सिंहासन खाली करो, क्योंकि जनता आ रही है”)। जून 1975 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज ) के उच्च न्यायालय ने राजनीतिक नेता राज नारायण द्वारा दायर चुनावी धोखाधड़ी के मामले में इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया, जिन्हें इंदिरा गांधी ने 1971 के आम चुनाव में हराया था। न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र में इंदिरा गांधी की चुनावी जीत को रद्द कर दिया और उन्हें छह साल तक राजनीति से बाहर रहने का आदेश दिया। इंदिरा गांधी ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला, उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में काम करने की अनुमति दी जाएगी , लेकिन संसद सदस्य के रूप में उन्हें मिलने वाले विशेषाधिकार बंद कर दिए जाएंगे और उन्हें वोट देने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस कारण उनके इस्तीफे की मांग तेज और लगातार होने लगी।

 1975 में आपातकाल की घोषणा इंदिरा गांधी की राजनीतिक असुरक्षा की पराकाष्ठा थी। आंतरिक असंतोष, भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक मानदंडों के व्यवस्थित क्षरण ने इसे और भी जटिल बना दिया। इसका तात्कालिक कारण इलाहाबाद उच्च न्यायालय का प्रतिकूल निर्णय था, जिसने उनके राजनीतिक भविष्य को खतरे में डाल दिया।भारत में आपातकाल 1975 से 1977 तक 21 महीने की अवधि थी जब प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आंतरिक और बाहरी खतरों का हवाला देते हुए पूरे देश में आपातकाल की घोषणा की थी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून 1975 को राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 और 356 का इस्तेमाल करते हुए इंदिरा गांधी ने खुद को असाधारण शक्तियां प्रदान कीं और नागरिक अधिकारों और राजनीतिक विपक्ष पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की। सरकार ने देश भर में पुलिस बलों का इस्तेमाल करके हजारों प्रदर्शनकारियों और हड़ताल करने वाले नेताओं को निवारक हिरासत में रखा। बिना सूचना दिए, अकारण अधिकांश विरोधी दलों के नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकारियोंऔर कार्यकर्ताओं को जेल में बंद कर दिया गया। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका को पंगु बना दिया गया। समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संजय गांधी का हस्तक्षेप अधिक बढ़ गया। नवयुवकों से लेकर अशक्त और वृद्ध स्त्री-पुरुषों व साधु-संतों तक की जबरदस्ती नसबंदी की जाने लगी थी। नसबंदी की संख्या के आधार पर ही पदोन्नति की जाने लगी थी। जेलों में बंद कार्यकर्ताओं को भयावह और अमानवीय यातनाएं दी गईं। शत्रुवत व्यवहार करते हुए कई कार्यकर्ताओं की  हत्या कर डाली गई । अनेक लोगों को बेरहमी से पीटा गया। अनेक लोगों के घर, परिवार और व्यापार बर्बाद हो गए। क्रूरता और बर्बरता की सारी सीमाएं तोड़ दी गईं।

आपातकाल में सिनेमा , पत्रकारिता पर सेंसरशिप लागू की गई और उस समय इस विषय पर बनी कई फिल्मों पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया, जिनमें आंधी (1975; “तूफान”), किस्सा कुर्सी का (1978; “एक सिंहासन की कहानी”) और नसबंदी (1978; “नसबंदी”) शामिल हैं। बाद में शासन में बदलाव के बाद प्रतिबंध हटा दिए गए। बाद में संजय गांधी पर किस्सा कुर्सी का के प्रिंट नष्ट करने का आरोप लगाया गया , जिसमें उनकी पैरोडी की गई थी। आपातकाल समाप्त होने के बाद फिल्म को फिर से शूट किया गया और रिलीज़ किया गया।

ऐसे तानाशाही और भयाक्रांत वातावरण में भी भूमिगत हो गए विरोधी दलों के कुछ नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ अधिकारियों ने मंत्रणा कर आपातकाल का विरोध करने के लिए जन आंदोलन आरंभ करने का निश्चय किया। कई वरिष्ठ लोगों को विदेशों में भी आपातकाल का विरोध प्रदर्शन करने के लिए भेजा गया। योजना पूर्वक सत्याग्रह प्रारंभ किया गया। प्रतिदिन प्रत्येक प्रदेश व जनपद में सत्याग्रह करते हुए जेलें भर दी गईं। लोगों ने गिरफ्तारियां देकर आपातकाल का विरोध किया। जेल के अंदर और जेल के बाहर भूमिगत कार्यकर्ताओं द्वारा लोकतंत्र की रक्षा के लिए किए गए जन जागरण आंदोलन तथा अंतरराष्ट्रीय दबाव के फलस्वरूप 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्ति की घोषणा करनी पड़ी। लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदानों के फलस्वरूप देश 21 माह के यातनागृह से मुक्त हुआ । नागरिक स्वतंत्रता में कटौती, राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी और प्रेस पर सेंसरशिप के कारण आपातकाल की व्यापक रूप से निंदा की गई थी । 

 

1 thought on “आपातकाल एक काली कहानी ”

  1. In the year 1975 I was posted in Indian Oil Corpn.Ltd., HQ, Janpath, New Delhi. Since I belongs to Mathura, hence I used to come on weekends. I was an eye witnessed, the then Congress Central Govt. In New Delhi & in Mathura taking help of local administration forcefully all opposition party leaders/workers & those who belongs to BJP/RSS were put into Jail & tortured them. Not only this, forcefully नसबंदी was done if youths/Babaji,Sadhus etc. in our organisation, target have been fixed for नसबंदी. One of my colleague who had to join Indian Oil, HQ Management told him to get done Nasbandi of your Father aged about 75 years. He was forcefully brought to Distt.Hospital, Mathura n Doctors had done his Father’s नसबंदी. But he was later success to get an appointment letter in Indian Oil. So many other instances are also I had seen at that time in New Delhi as well as in Mathura but if I described here then it will become very lengthy. Thanks/regards.

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *