महाराजा रणजीत सिंह – शेर-ए-पंजाब
सतीश शर्मा 
महाराजा रणजीत सिंह, जिन्हें “शेर-ए-पंजाब” (पंजाब का शेर) के नाम से भी जाना जाता है, 19वीं सदी के एक महान शासक थे जिन्होंने सिख साम्राज्य की स्थापना की और उसे मजबूत बनाया। उनका जन्म 13 नवंबर 1780 को हुआ था और 27 जून 1839 को उनका निधन हो गया। महाराजा रणजीत सिंह का जन्म महा सिंह और राज कौर के परिवार में पंजाब के गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में 13 नवंबर 1780 को हुआ था। रणजीत के पिता महा सिंह सुकरचकिया मिसल के कमांडर थे जो पश्चिमी पंजाब में स्थित था इस का मुख्यालय गुजरांवाला में था। महाराजा रणजीत सिंह ने 10 साल की उम्र में पहला युद्ध लड़ा था और 12 साल की उम्र में गद्दी संभाल ली थी। वहीं 18 साल की उम्र में लाहौर को जीत लिया था। 40 वर्षों तक के अपने शासन में उन्होंने अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के आसपास भी नहीं फटकने दिया।
बचपन में चेचक से पीड़ित होने के कारण उनकी एक आंख की रोशनी चली गई थी। 1799 में, महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर पर विजय प्राप्त की और खुद को महाराजा घोषित किया । महाराजा रणजीत सिंह एक कुशल व बहादुर शासक थे जिन्होंने 19वीं शताब्दी में सिख साम्राज्य की स्थापना की और उसे मजबूत किया। महाराजा रणजीत सिंह ने न केवल पंजाब को एकजुट किया, बल्कि अपने शासनकाल में अंग्रेजों को भी अपने साम्राज्य के पास फटकने नहीं दिया। विभिन्न सिख मिसलों को एकीकृत करके महाराजा रणजीत सिंह ने एक मजबूत सिख साम्राज्य की स्थापना की, जिसका विस्तार उत्तर-पश्चिम में खैबर दर्रे से लेकर पूर्व में सतलुज नदी तक और दक्षिण में थार रेगिस्तान तक था।महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर, हजारा, पेशावर और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की और अपनी सैन्य शक्ति को मजबूत किया। महाराजा रणजीत सिंह ने एक एसा मजबूत शासन स्थापित किया, जिसमें सभी संप्रदाय के लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाता था। उन्होंने अपने शासनकाल में आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया और व्यापार और वाणिज्य को प्रोत्साहित किया। उन्होंने अमृतसर में हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) का जीर्णोद्धार करवाया और उसे सोने से मढ़वाया, जिससे वह स्वर्ण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने अपनी सेना में पश्चिमी सैन्य तकनीकों को शामिल किया और उसे आधुनिक बनाया। महाराजा रणजीत सिंह ने संप्रदाय सहिष्णुता की नीति अपनाई और सभी संप्रदाय के लोगों को समान अवसर प्रदान किए। महाराजा रणजीत सिंह न केवल एक महान योद्धा और शासक थे, बल्कि एक दूरदर्शी,कुशल प्रकाशक और निडर नेता भी थे, जिन्होंने अपने शासनकाल में पंजाब को समृद्धि और विकास के पथ पर अग्रसर किया। उन्होंने शाहशुजा को काबुल की राजगद्दी दिलाने के लिए “गुरुग्रंथ साहब” पर हाथ रखकर प्रतिज्ञा की। फिर उसे “पगड़ी-बदल भाई” बनाने के लिए उससे पगड़ी बदल कर कोहिनूर प्राप्त कर लिया। कोहिनूर हीरा इस प्रकार महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंचा।महाराजा रणजीत सिंह का साम्राज्य, जिसे सिख साम्राज्य के नाम से भी जाना जाता है, 1799 से 1849 तक अस्तित्व में रहा। रणजीत सिंह ने 1799 में लाहौर पर कब्ज़ा करके इसकी नींव रखी और फिर विभिन्न सिख मिसलों को एकजुट करके एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की। उनके साम्राज्य में पंजाब के साथ-साथ उत्तर-पश्चिमी भारत के कई क्षेत्र शामिल थे, जिसमें लाहौर, अमृतसर, मुल्तान, पेशावर, जम्मू, श्रीनगर, रावलपिंडी और सियालकोट जैसे प्रमुख शहर शामिल थे। रणजीत सिंह ने अपनी सेना, खालसा सेना का आधुनिकीकरण किया और उसे यूरोप की सेनाओं के समान बनाने के लिए काम किया। उनके शासनकाल में संप्रदाय सहिष्णुता, आर्थिक विकास और सैन्य शक्ति का विकास हुआ। महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब और आस-पास के क्षेत्रों को एकजुट करके एक मजबूत और समृद्ध सिख साम्राज्य की स्थापना की, जो अपने समय में एक महत्वपूर्ण शक्ति बन गया था। महाराजा रणजीत सिंह के कई प्रसिद्ध सेनापति थे, जिनमें से सरदार हरि सिंह नलवा और दीवान मोखम चंद प्रमुख थे।
सरदार हरि सिंह नलवा महाराजा रणजीत सिंह के सबसे भरोसेमंद और प्रसिद्ध सेनापतियों में से एक थे। सरदार हरि सिंह नलवा की बहादुरी की कहनियाँ अनेकों लोक गीतों में गई जाती हैं , उन्होंने कई युद्धों में सिख सेना का नेतृत्व किया और पठानों के खिलाफ अभियानों में विशेष रूप से प्रसिद्ध थे । दीवान मोखम चंद भी महाराजा रणजीत सिंह के एक प्रमुख सेनापति थे। उन्होंने 1813 में अटक की लड़ाई में अफगान सेना को हराया था । महाराजा रणजीत सिंह की सेना में ओर भी कई अन्य महत्वपूर्ण सेनापति थे, जनरल जीन फ्रेंकोइस एलार्ड, एक फ्रांसीसी सेनापति व रणनीतिकार थे, और महान सिंह बाली, जो एक ब्राह्मण थे ओर बहुत बहादुर योद्धा व युद्ध कला में निपुण थे ।
रानी जिंदन कौर, जो अपनी सुंदरता और साहस के लिए जानी जाती थीं, 1843-1846 तक सिक्ख साम्राज्य की राज्य-संरक्षक थीं। वे महाराजा रणजीत सिंह की पत्नी थीं। जिंदन कौर के पिता, जो महल के कर्मचारी थे, महाराजा रणजीत सिंह ने उनसे उनकी बेटी का हाथ शादी में माँगा था। उनकी प्रेम कहानी, गुल बहार के साथ, भी प्रसिद्ध है। रणजीत सिंह को अंतिम विदाई, 180 तोपों की सलामी के साथ दी गई थी। उस वक्त जो परिस्थिति थी उनके अनुसार महाराजा रणजीत सिंह जो कार्य किए वो दर्शाता है की महाराजा रणजीत सिंह एक महान योद्धा, कुशल शासक और पंजाब के एकीकरण कर्ता थे, जिनकी विरासत ओर बहदुरी की कहानियाँ आज भी हम सबको को प्रेरित करती है।






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