जानकारी काल हिन्दी मासिक अगस्त – 2025

जानकारी काल 

 

   वर्ष-26   अंक – 03        अगस्त – 2025 ,  पृष्ठ 48                www.sumansangam.com    

 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत! अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्

 प्रधान संपादक व  प्रकाशक सतीश शर्मा 

 कार्यालय

 ए 214 बुध नगर इंद्रपुरी  नई दिल्ली 110012

 मोबाइल –  9312002527

 संपादक मंडल- सौरभ  शर्मा,कपिल शर्मा,गौरव शर्मा,डॉ अजय प्रताप सिंह,

 करुणा ऋषि, डॉ मधु वैध,राजेश शुक्ल  

प्रकाशक व मुद्रक 

सतीश शर्मा के लिय ग्लैक्सी प्रिंटर-106 F,

कृणा नगर नई दिल्ली 110029, A- 214 बुध नगर इन्दर पूरी नई दिल्ली  110012 से प्रकाशित |

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अनुक्रमणिका

अपनों से अपनी बात – 3 
योग अनुकूल परिवर्तन के लिए हम तत्पर हो – 4 लेख
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पंचमुखी विकास योजना  – 9 लेख
कुलदेवता – 13 कहानी 
मेरे दर्द, शिव के दर्द  – 15 कविता 
पर्यावरण प्रेमी – 16 लेख
शनिवर – 17 कहानी
आपकी आंख अच्छी है, जो अच्छा ही देखती है – 18 कहानी 
चौघड़िया मुहूर्त – 19 ज्योतिष 
पिताजी कभी रिटायर नहीं होते – 20 कहानी
 यह एक शिक्षक की अंतिम शाम थी – 22 कहानी
शिक्षा उदय – 26 कविता 
जामुन – 27 लेख
कभी-कभी इंसानियत भी पंख बन जाती है – 28 कहानी 
पर्यावरण योद्धा जाधव- 29 लेख
जिजीविषा – 31 कविता 
एक मरता समाज – 32 – घटना 
सरपंच की बेटी 33 – कहानी
बस ओर क्या चाहिए 34 कहानी 
चिड़िया चुग गई खेत- 38 कहानी 
विधवा औरत – 40 कहानी 
अगस्त 2025 के महत्वपूर्ण दिवस – 42
अगस्त माह का पंचांग – 43 ज्योतिष 
पुत्रदा एकादशी – 47 एकादशी कथा 
अजा एकादशी – 48 एकादशी कथा 

 

अपनों से अपनी बात 

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं जन्यं चोक्तं समासतः । मद-भक्त एतद् विज्ञानाय मद-भावयोपपद्यते। । 

भगवान् क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके विभागका ही प्रकृति और पुरुषके नामसे पुनः वर्णन करते हैं। शरीर तथा संसार प्रकृति-विभागमें और आत्मा तथा परमात्मा पुरुष-विभागमें हैं। जैसे प्रकृति और पुरुष अनादि हैं, ऐसे ही इनके भेदका ज्ञान अर्थात् विवेक भी अनादि है। अतः विवेक-दृष्टिसे देखें तो ये दोनों विभाग एक-दूसरेसे बिलकुल असम्बद्ध हैं।

विकृति मात्र जड़ में ही होती है, चेतन में नहीं। अतः वास्तव में सुखी-दुःखी होना चेतन का धर्म नहीं है, प्रत्युत जड़के संगसे अपनेको सुखी-दुःखी मानना चेतनका स्वभाव है। तात्पर्य है कि चेतन सुखी-दुःखी नहीं होता, प्रत्युत (सुखाकार-दुःखाकार वृत्तिसे मिलकर) अपनेको सुखी-दुःखी मान लेता है। चेतनमें एक-दूसरेसे विरुद्ध सुख-दुःखरूप दो भाव हो ही कैसे सकते हैं ? दो भाव परिवर्तनशील प्रकृतिमें ही हो सकते हैं। जो अपरिवर्तनशील है, उसके दो भाव अथवा रूप नहीं हो सकते। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण विकार परिवर्तनशीलमें ही हो सकते हैं। चेतन स्वयं ज्यों-का-त्यों रहते हुए भी परिवर्तनशील प्रकृतिके संगसे उन विकारोंको अपनेमें आरोपित करता रहता है।

भगवान् शक्तिमान् हैं और प्रकृति उनकी शक्ति है। ज्ञानकी दृष्टिसे शक्ति और शक्तिमान् – दोनों अलग-अलग हैं; क्योंकि शक्तिमें तो परिवर्तन (घटना-बढ़ना) होता है, पर शक्तिमान् ज्यों-का-त्यों रहता है। परन्तु भक्तिकी दृष्टिसे देखें तो शक्ति और शक्तिमान् दोनों अभिन्न हैं; क्योंकि शक्तिको शक्तिमान्से अलग नहीं कर सकते अर्थात् शक्तिमान्के बिना शक्तिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। ज्ञान और भक्ति – दोनोंकी बात रखनेके लिये ही भगवान्ने प्रकृतिको न अनन्त कहा है, न सान्त, प्रत्युत ‘अनादि’ कहा है। कारण कि यदि प्रकृतिको अनन्त (नित्य) कहें तो ज्ञानका खण्डन हो जायगा; क्योंकि ज्ञानकी दृष्टिसे प्रकृतिकी सत्ता ही नहीं है- ‘नासतो विद्यते भावः’ (गीता २।१६)। यदि प्रकृतिको सान्त (अनित्य) कहें तो भक्तिका खण्डन हो जायगा, क्योंकि भक्तिकी दृष्टिसे प्रकृति भगवान्‌की शक्ति होनेसे भगवान्से अभिन्न है- ‘सदसच्चाहम्’ (गीता ९।१९)।३०२

वास्तवमें परमात्माका स्वरूप ‘समग्र’ है। परमात्मामें कोई शक्ति न हो-ऐसा सम्भव ही नहीं है। यदि परमात्माको सर्वथा शक्तिरहित मानें तो परमात्मा एकदेशीय (सीमित ) ही सिद्ध होंगे। उनमें शक्तिका परिवर्तन अथवा अदर्शन तो हो सकता है, पर शक्तिका अभाव नहीं हो सकता। शक्ति कारणरूपसे उनमें रहती ही है, अन्यथा परमात्माके सिवाय शक्ति (प्रकृति) के रहनेका स्थान कहाँ होगा ? इसलिये यहाँ प्रकृति और पुरुष – दोनोंको अनादि कहा गया है।

युगानुकूल परिवर्तन के लिए हम तत्पर हों

 – डॉ. मोहन भागवत

विद्या भारती एक शैक्षिक संगठन है जो एक निश्चित विचार के अनुसार विद्यालय संचालित करता है। शिक्षा के माध्यम से हम एक बहुत बड़े कार्य के अनुष्ठान में सहयोग कर रहे हैं। इस बड़े कार्य को अलग-अलग समय पर अलग-अलग ढंग से किया जाता है। इस बडे़ कार्य को एक नाम दिया गया है ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य के विषय में समयानुसार अपेक्षा और धारणाएँ बदलती रही हैं। कभी संघ हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र कराने का संगठन था। स्वतंत्रता के बाद संघ राष्ट्र की सर्वांगीण प्रगति का साधन बना। इन्हीं अपेक्षाओं के कारण संघ में प्रचलित शब्दों एवं गतिविधियों में परिवर्तन हुआ। इससे पहले संघ का कार्य शाखा चलाना मात्र था। संघ स्थान पर दंड, नियुद्ध आदि का अभ्यास होता है। पहले शिकायत थी कि संघ सभी स्थानों एवं गतिविधियों में क्यों है? पूज्य सरसंघचालक जी जनजाति समाज में प्रवास करते हैं, वहाँ के बन्धुओं से आत्मीयता स्थापित करते हैं। इस कार्यक्रम का चर्च के बंधु विरोध करते हैं। यह संघ का बढ़ता हुआ प्रभाव ही माना जाएगा। संघ के बारे में समाज में यह परिवर्तन हुआ है कि सभी सामाजिक सरोकारों में संघ को देखना चाहते हैं। पहले शाखा चलेगी तो अन्य सब स्वतः ही हो जाएगा। आज शाखा के साथ-साथ सेवा बस्तियों में कार्य करना होगा। पंच परिवर्तन के प्रयास भी करना चाहिए। यह सभी कार्य करते हुए संघ विश्व को सम्यक् दिशा 

दिखाने का कार्य भी करता है। कार्य की शक्ति जैसे-जैसे बढ़ती है वैसे-वैसे हमारी सोच और कार्यविधि में परिवर्तन होता है।

दत्तोपंत ठेंगड़ी जी इस विकास यात्रा को प्रोग्रेसिव अनफोल्ड कहते हैं। कभी-कभी लोगों को यह भ्रम भी होने लगता है कि संघ ने कोई नया विचार अपना लिया है। संघ की स्थापना के पाँच वर्ष पूर्ण होने पर एक संयोग बना। नागपुर में कांग्रेस का अधिवेशन था। व्यवस्था सम्बन्धी दायित्व डॉ. हेडगेवार का था। गांधी जी इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे। डॉ. हेडगेवार जी ने विषय नियामक समिति को प्रस्ताव में दो विषय दिए – प्रथम, गौ हत्या का सम्पूर्ण निषेध और दूसरा, भारत के लिए स्वतंत्रता को सम्पूर्ण रूप से प्राप्त करने का लक्ष्य। कांग्रेस इन दोनों विषयों पर घोषणा नहीं कर सकती थी। उस समय कांग्रेस में एक गरम दल था जिसमें अधिकांश अपनी सोच पर तीव्र गति से कार्य करने वाले जवान थे। दूसरा नरम दल था, जिसमें सभी वरिष्ठ नेता थे जो धीरे-धीरे चलने वाले थे। डॉ. हेडगेवार गरम दल के सदस्य थे। आज हम जिस भारत की बात करते हैं वह डॉ. हेडगेवार के विचार का है।

विश्व में परिवर्तन होना चाहिए, यह समय की आवश्यकता है। परिवर्तन की दिशा की रेखा सम्यक् होनी चाहिए। यह परिवर्तन सभी के लिए ठीक होना चाहिए। परिवर्तन समयानुकूल है तथा सर्वजनहिताय है तो स्वीकार्य होना चाहिए। हमारी आयु-सीमा बहुत छोटी है और संसार-चक्र बहुत बड़ा है। मेरा छोटा जीवन बिना कुछ करे सामान्य रूप से कट जाएगा, यह मानकर जियें तो जीवन निरर्थक है। हमारा जन्म भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं है। जन्म के साथ मृत्यु तय है तो फिर मृत्यु को मंगल बनाने के लिए मंगल कार्य करना चाहिए। अमरता भी अभिशाप है क्योंकि मन को परिवर्तन पसन्द है और अमरता जड़ता लाती है। यह परिवर्तन आवश्यक है किन्तु यह परिवर्तन विवेकपूर्ण हो। प्रकृति के परिवर्तन सार्वभौमिक है, हमें उन्हें स्वीकार करना चाहिए। समय के अनुसार परिवर्तन को स्वीकार्य बनाने के लिए सज्जन शक्ति को सक्रिय रहना चाहिए।

संसार के सभी जीव अपने अनुकूल वातावरण में रहने का प्रबंध करते हैं। अधिकांश जीव परिवेश के अनुकूल वातावरण बनाते हैं क्योंकि वे परिवेश को अपने अनुकूल नहीं बना सकते। हमने अपने को जंगलों में रहने के अनुकूल बना लिया है किन्तु जंगली जानवर जंगल के अलावा अन्य वातावरण में रहने के अनुकूल नहीं बना सकते, इसलिए लुप्त हो जाते हैं। परिवेश को प्रभावित करने की बुद्धि और कुबुद्धि मानव के पास है। मानव अपनी सद्बुद्धि से परिवर्तन को सकारात्मक बनाने में सक्षम है। इसका खतरा यह है कि मानव की संख्या बढ़ती जा रही है। इस खतरे के कारण पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ा है।

आज तकनीकी बढ़ी है लेकिन क्या नीति भी बढ़ी है? क्या मानवता भी बढ़ी है? क्या सभ्य मानव उदार भी है? विकास संस्कृति और सुविचार पर आधारित होना चाहिए। गत दो हजार वर्षों में हमारा विकास संस्कृति से विरत होकर किया गया, जिसके कारण हमें सुख के बदले में दुःख ही मिलता है। सुख लाने के पीछे जड़वादी और सूक्ष्मवादी विचारों का समावेश भारतीय दर्शन में प्राचीन काल में हुआ है। इस समावेशी प्रक्रिया में सच्चा सुख मिलने का सार था। इस प्रक्रिया में मनुष्य, प्रकृति, सृष्टि सभी संतुष्ट थे, 

कलह नहीं था। शरीर, मन और बुद्धि तृप्ति के साथ आत्मा की दिशा की ओर अग्रसर थे। मानव सम्पन्न कितना था, पता नहीं किन्तु सुखी पूर्णरूपेण था।

आज हमें युगानुकूल परिवर्तन की दिशा को ठीक करना होगा। परिवर्तन की दिशा को ठीक करने का कार्य हमें ही करना होगा। भारत वर्ष को करना होगा। आधुनिक विज्ञान और तकनीक में जो ठीक है उसे स्वीकार करके आगे बढ़ना होगा। जो भी गलत है उसे छोड़ना ही श्रेयस्कर है। समग्र एकात्म सम्पूर्ण धारणा जिनके पास है वे भारतीय हैं। हम यह समझते हैं कि अस्तित्व अलग और विविध है। वास्तव में वह अलग नहीं है अपितु विविध है यह विविधता एकात्मता का ही एक हिस्सा है। यह सृष्टि एक से अनेक होने का परिणाम है। ‘‘एकोऽहम् बहुस्याम’’। यह विविधता सदैव अपूर्ण रहती है क्योंकि अपूर्ण होने पर ही किसी अन्य की आवश्यकता होती है। पूर्ण होने पर किसी की आवश्यकता रहती ही नहीं है। विविधता में रहेंगे तो अपूर्णता रहेगी, दुख रहेगा। मूल की एकता में ही शाश्वत सुख मिलता है। इस सत्य के साक्षात्कार के आधार पर हमारे राष्ट्र कर जीवन खड़ा होगा। इस दुनिया में जो कुछ भी दिखाई देता है, वह मेरा अपना है, सब में मैं हूँ। मुझ में सब है। शाश्वत सुख पाने का यह मार्ग सम्पूर्ण जगत् को दिखाना होगा। यह कार्य एक दो व्यक्ति नहीं अपितु सम्पूर्ण समाज को करना होगा। विश्व कल्याण के लिए सभी शक्तियों को अर्जित करना होगा और उनका विनियोग विश्व कल्याण के लिए करना होगा। प्राचीन काल से ही समय-समय पर इस सनातन सत्य से हमने संसार को अवगत कराया है। आज विश्व में जो परिवर्तन आया है उसके गम्भीर परिणाम हमारे सामने हैं। विगत दो हजार वर्षों में परिवर्तन को ठीक करने के लिए जो भी प्रयोग किए गए हैं वे सभी असफल सिद्ध हुए हैं। अब अधिकांश देशों को भारत से ही आशा है कि कोई समाधान का मार्ग प्रशस्त होगा। इस अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए हमें तैयार रहना होगा। भारतवर्ष को पूर्णतः सम्पन्न बनाना होगा। सर्व प्रथम हमें युगानूकुल परिवर्तन को समुचित बनना होगा। परिवर्तन सबसे पहले भारतवर्ष में हो। भारत विश्व की परिवर्तन सम्बन्धी अधूरी धारणा को पूर्ण बनाकर अनुकरणीय बनायें। अपनी प्रकृति के अनुसार सर्व गुण सम्पन्न होना होगा। सर्व प्रथम भारत के समाज में परिवर्तन लाना होगा। समाज में परिवर्तन, व्यक्ति में परिवर्तन लाने से होगा इसलिए हमारा प्रमुख कार्य व्यक्ति निर्माण ही है। आज संघ केवल शाखाओं तक सीमित नहीं है अपितु जीवन के हर क्षेत्र में हम हैं। वहाँ केवल हमारी उपस्थिति मात्र नहीं है। वहाँ हमारी भूमिका सर्वस्वीकृत है।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर साधन एवं संशाधन के आधार पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से प्रगतिशील का दर्जा प्रदान किया जाता है। किसी अन्य व्यक्ति ने विद्या भारती के लिए आवेदन किया है। इस सर्वेक्षण के आधार पर विद्या भारती को सौ करोड़ लोगों को प्रभावित करने वाला संगठन घोषित किया गया है। ऐसी संस्थाओं को ‘बिलियन लाइफ क्लब’ कहा जाता है। हमें अपनी जगह का अनुभव नहीं होता क्योंकि हम केवल प्रतिष्ठा और पहचान के लिए कार्य नहीं करते हैं। विश्व यह भलीभाँति जानता है कि हमारे स्वयंसेवक का जीवन हर क्षेत्र में व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज परिवर्तन का कार्य करना चाहते हैं।

हमारे यहाँ चार युग कहे गए हैं- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर, कलियुग। कलयुग में धर्म की क्षीणता चरम पर है। धर्म का केवल एक ही पैर बचा है, सत्य। शुचिता चली गई, करुणा रही नहीं और हम तपस मुक्त हो गए हैं। हमारे समाज में कैसे भी पैसा प्राप्त करने के लिए खतरनाक होड़ लगी है। इस धनेष्णा को बढ़ाने के लिए उपाय भी प्रकट हो रहा है। इसी को हम धर्म मान रहे हैं। 1995 में विश्व व्यापार संगठन विकास का यह मॉडल घोषित किया कि किसी भी प्रकार हो विकास होना चाहिए। आर्थिक सत्ता एक होकर विश्व के सम्पन्न देशों के हाथों में रहेगी। अपनी संस्कृति को छोड़कर, भले बुरे का विचार त्यागकर कैसे सम्पन्नता आए यह मार्ग अपनाना चाहिए। एक अर्थशास्त्री ने विचार रख दिया कि भले बुरे का कोई अर्थ नहीं है। जिससे हमारा फायदा हो वह सही है भले ही इससे दूसरों का अहित क्यों न हो। यही वर्तमान कलि का प्रभाव है। हमारे पड़ोसी देश जिनका अस्तित्व हमारे बिना नहीं है, वे भी झूठ का शिष्टाचार बना लेते हैं। बंगलादेश मानता है कि भारत के बिना हमारा गुजारा नहीं है। फिर भी बंगलादेश में निर्दोष हिन्दुओं के साथ अत्याचार होता है। मानव के विचार, बद्धि, मत कितने अपवित्र हो गए हैं? करुणा समाप्त हो गई है और युद्ध हो रहे हैं। यह विनाशकारी परिदृष्य आज विश्व स्तर पर हमें दिखाई दे रहा है।

चीन अकारण हमारी सीमाओं में प्रवेश करता है, संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारा विरोध करता है। पाकिस्तान अभी कश्मीर से लेकर गलत बयानबाजी करता है। ऐसे अनेक अनैतिक विषयों का अभद्र लोग समर्थन करते हैं। आज नैतिकता और शुचिता इतिहास के विषय बन गए हैं। हमारा सनातन ही चिर सत्य और सुखदायी है। ऐसा धर्म जिसके कारण सृष्टि युगों-युगों तक गतिशील है। आज इस सनातन धर्म के चार पैरों में से एक मात्र पैर बचा है वह है सत्य। यह सत्य भारत के पास है। भारत में अभी भी करोड़ों लोग एकत्रित होते हैं, अनुशासन में रहते हैं। सभी सत्य के सहारे बड़े-बड़े अनुष्ठान पूर्ण कर लेते हैं। प्रयागराज का महाकुम्भ हमारे सनातन सत्य की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। महाकुम्भ के आयोजन के शोधपरक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि सत्य भारत में अभी सारपूर्ण है। उसी सत्य पर भारत चल रहा है। सत्य के आधार पर अन्य तीन पैरों का सृजन कर लेगा। इसी सत्य के आधार पर हमें परिवर्तन की दिशा तय करनी है। हमें ‘मैक्सिमम गुड ऑफ द मैक्सिम पीपल’ के स्थान पर ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’के आधार पर कार्य करना होगा। भारत का परम वैभव शेष सभी राष्ट्रों के लिए भी कल्याणकारी सिद्ध होगा। हम अपनी बल, बुद्धि, अहंकार बढ़ाने के लिए नहीं करेंगे। हमारा संगठन चाहता है कि हमारी उन्नति से सभी की उन्नति होनी चाहिए। सभी क्रियाकलापों का आयोजन सत्य के आधार पर विश्व-निर्माण और सृष्टि का निर्माण होगा। परम वैभव सम्पन्न भारतवर्ष की कल्पना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर आधारित होगी। यही युगानुकूल परिवर्तन है। वर्तमान में हम सभी को एकात्म मानववाद का अध्ययन एवं अनुकरण करना चाहिए।

युगानुकूल परिवर्तन के सृजन का कार्य भारतवर्ष ही कर सकता है। प्रत्येक अच्छे कार्य को करने में हमें कुछ प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ता ही है। जो भारतीय अस्मिता के स्थायी और घोषित विरोधी हैं वे अपना ज्ञान हमारे सम्यक् ज्ञान को उल्टा बताने में ही अपनी शक्ति लगाते हैं। सत्य तो निर्विवाद होता है। वस्तुतः स्वार्थ वश कुछ लोग सत्य का विरोध करते हैं। हम सभी को साथ लेकर सन्मार्ग पर चलेंगे। सभी को साथ लेते समय ‘बैनर्स’ का झगड़ा होता है। हम इस झगड़े से बचेंगे। कार्य ठीक दिशा में हो, यह उद्देश्य होना चाहिए।

समाज को साथ लेने का दूसरा अंग है जमीनी स्तर पर कार्य करना। अधिक कार्य, ऊपर के लोग नहीं, जमीन से जुड़े लोग करते हैं। संघ के सभी कार्य, समाज के सहयोग से समाज के लिए हो रहे हैं। सज्जन शक्ति के जागरण में हम सभी की भूमिका है। संघ शताब्दी वर्ष में हमने विस्तार, विमर्श, सज्जन शक्ति का जागरण और पंच परिवर्तन इन तीन विषयों पर कार्य करने का निश्चय किया है। हमें समाज का विमर्श बदलना है, समाज की बुद्धि को बदलना है। प्रबोधन से परिवर्तन लाना हमारा कार्य है। सभी लिए पाँच परिवर्तन वाले कार्यक्रम हों। गत वर्षों में अधूरे विमर्शों के मायाजाल में हमारा समाज पूरी तरह फँसा हुआ है। दूसरों का विनाश होगा तो हमारा फायदा होगा यह भयानक सोच विनाशक है। इस सोच को बदलने का कार्य सनातन से होगा।

श्री राजीव मल्होत्रा जी ‘Who is Raising Your Children’ नामक पुस्तक में समाज की वर्तमान चुनौतियों की ओर सटीक संकेत किए गए हैं और माता-पिता तथा समाज को छात्रों के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसके मनोवैज्ञानिक प्रयोग बताए गए हैं। यह पुस्तक यह भी सिद्ध करती है कि वर्तमान जीवन में अधिकांश लोग भ्रमजाल के पाश में फँसे हैं तथा जो भी वे कर रहे हैं इन्द्रियों की तुष्टि के लिए कर रहे हैं। सत्य, शुचिता तथा तपस युक्त जीवन को नष्ट करने वाली शिक्षा दी जा रही है। इस कार्य के लिए विश्वस्तर पर षड्यंत्रकारी सक्रिय हैं। पुस्तक के प्रारम्भ में अघासुर की कथा है। वृन्दावन के ग्वालाओं में भगवान् श्रीकृष्ण भी थे। अघासुर राक्षस ने आठ मील लम्बे सर्प का रूप धारण कर लिया। वह पर्वत के जबड़े फाड़कर बैठा था। उसकी आकृति एक गुफा के समान लग रही थी। सर्प की माया के कारण बालकों को उसके जबड़ों में सुन्दर उपवन एवं पक्षी आदि दिखाई दे रहे थे। श्रीकृष्ण ने इन छद्म आकर्षणों का रहस्य जान लिया और अघासुर का बड़ी चतुराई से वध कर दिया। ठीक इसी प्रकार आज विभिन्न मिथ्या आकर्षणों का अघासुर बैठा हुआ है और हम सभी जाने-अजाने में इसमें फँसे हुए हैं। माया के इस प्रपंच को हमें विच्छिन्न करना होगा। इस कार्य की भूमिका घर नाम की संस्था के आधार पर होती है, समाज और शिक्षा के प्रबोधन की होती है। इसलिए विमर्श बदलने में, लोगों का सत्य का दर्शन कराने में, युगानुकूल परिवर्तन को सही आधारपूर्ण दिशा देने में, हमारी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। हमारी दृष्टि में शिक्षा क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों की भूमिका प्रमुख है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हमारी उद्देशिकाओं का समायोजन है। ‘इस नीति से ‘रिओरिएन्ट्टेशन होगा। अभी कलियुग की केवल 5126 वर्ष ही व्ययतीत हुए हैं। अभी यात्रा काफी लम्बी है। भारत को खड़ा करने का पुनीत कार्य हम सभी को पूर्ण मनोयोग से कार्य करना है। भोपाल में परम पूज्य सरसंघचालक जी के मार्गदर्शन आधारित व्याख्यान प्रस्तुति श्री किशनवीर जी शाक्य)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पंच मुखी विकाश योजना  

सतीश शर्मा 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सम्पूर्ण भारतीय समाज में आधारभूत परिवर्तन के लिए जिन पांच आयामों को चुना है वे हैं ‘स्व’, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण और नागरिक कर्तव्य।पंच परिवर्तन का यह संकल्प भारत को वैभव सम्पन्न सशक्त राष्ट्र के रूप में विकसित करेगा। इस दृष्टि से शताब्दी वर्ष में संघ ने पंच अमृत धाराओं से समाज को सिंचित करने का संकल्प लिया है। परिवर्तन की साधना चरणबद्ध है। अतः अपेक्षा है कि ये सभी अत्यावश्यक परिवर्तन स्वयं के आचरण का अंग बनने के साथ-साथ परिवार में भी यह अभ्यास स्थायी बनें। इसी के समानांतर अपने कार्यस्थल, पड़ोस और क्रमशः सभी प्रभावक्षेत्रों में पंचपरिवर्तन परिणामकारी होते जाएँ इसका उद्देश्यपूर्ण प्रयास प्रत्येक से अपेक्षित है। इसलिए पहले यह परिवर्तन खुद में व अपने परिवार में करना हैं उसके बाद समाज मे लेकर जाना हैं | इन पंच परिवर्तन के कुछ करने योग्य कार्य नीचे दिए हैं |

पर्यावरण 

 पर्यावरण का हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके बिना मनुष्य एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। हरे-भरे पेड़-पौधे हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश इन पाञ्च तत्वों से ही मनुष्य का जीवन है और जीवन के अंत में भी व्यक्ति को इन्हीं पाञ्च तत्वों में विलीन होना पड़ता है।

प्रदूषण को रोकने के लिए, ये उपाय अपनाए जा सकते हैं – कूड़ा-कचरा उठाकर कूड़ेदान में फेंकें ।  पत्तियों को सड़क पर न उड़ाएं. घास या यार्ड के कचरे को मल्च या खाद में बदलें । फ़र्टिलाइज़र को बारिश से पहले घास पर न डालें | कार या बाहरी उपकरणों को ऐसी जगह धोएं जहां से पानी सड़क पर न बह सके । जल स्त्रोतों में पशुओं को न नहलाए, पूजा के अवशेष फूल इत्यादि नदी, तालाब, झील में डाल कर गंदगी ना करें | कीटनाशियों,कवकनाशियों जैसे निम्नीकरण योग्य पदार्थों का इस्तेमाल करें | खतरनाक कीटनाशियों के इस्तेमाल पर रोक लगाएं | जल स्त्रोतों के पानी को शुद्ध करने पर ध्यान दें | बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में जल शोधन संयंत्र लगाएं | प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करें | पालतू जानवरों के मल को बैग में भरकर कूड़ेदान में डालें | अपने पूल,स्पा या फ़व्वारे के पानी को नाले में न बहाएं बल्कि सिचाई के लिए इस्तेमाल करें | कृषि भूमि पर मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए आवरण फसलों का इस्तेमाल करें | ज़्यादा से ज़्यादा सार्वजनिक परिवहन, साइकिल या पैदल चलें | अगर आप निजी वाहन चलाते हैं, तो कार पूलिंग करें | अगर आपका ऑफ़िस घर से काम करने का विकल्प देता है, तो इसका लाभ उठाएं | बाहर जाने पर पुनः प्रयोज्य वायु मास्क पहनें | घर में तुलसी, एलोवेरा और मनी प्लांट जैसे पौधे लगाएं ये पौधे घर के अंदर की हवा को शुद्ध करते हैं | कुशल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल करें | हमें अपने पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए | आलाव ना जलाये,प्लास्टिक की थैली मे खाना ना रखें |घर के बचे खाने को प्लास्टिक की थैली मे भर कर बाहर ना फेंके गाय प्लास्टिक की थैली समेत  खाती है इससे उसे नुकसान होता है |

सामाजिक समरसता

जब हम सामाजिक समरसता शब्द का उच्चारण करते हैं तो हमारा सामना भारत की भाषाई विविधता या साम्प्रदायिक विविधता से नहीं, बल्कि जातीय असमानता से होता है। हमारे यहां अनेक जातियां हैं, न केवल जातियां हैं बल्कि जातिगत भेदभाव भी है। वह जातिगत भेदभाव कैसे मिटेगा? सामाजिक समरसता शब्द आते ही हम सोचते हैं कि जातिवाद सुनने को मिलेगा, कुछ कहा जाएगा, ऐसा क्यों? तो इसका कारण यह है कि हमारे यहाँ यह इतिहास है। यदि हम ‘जातिगत भेदभाव और उस पर आधारित असमानता’, ‘भेदभावपूर्ण व्यवहार’, ‘सामाजिक समरसता’ जैसे विषय को ठीक से समझना चाहते हैं तो हमें अंग्रेजी में निगेशन जिसे कहते हैं उसे अपने दिमाग से निकालना होगा। हमारे समाज में ऐसा कोई भेदभाव नहीं था, शायद ही ऐसी कोई असमानता हो, मतभेद तो हैं लेकिन असमानता की ऐसी कोई भावना नहीं थी ।

सामाजिक समरसता का अर्थ है – सभी को अपने समान समझना। जातिगत भेदभाव एवं अस्पृश्यता को दूर करना, लोगों में परस्पर प्रेम एवं सौहार्द बढ़ाना,समाज के सभी वर्गों एवं वर्णों के मध्य एकता स्थापित करना ही सामाजिक समरसता है,दोस्तों, परिवार, भागीदारों और पड़ोसियों से जुड़ने से शुरुआत करें। अपने जीवन में किसी भी तरह की असहमति से निपटने के लिए उदारतापूर्वक, 

दयालु तरीके से और अपने समुदाय के लोगों को वापस मुख्य धारा में लाने  पर ध्यान केंद्रित करें। 

सुनिश्चित करें कि आप व्यक्तिगत सद्भावना भी बनाए रखें, क्योंकि इससे आपको दूसरों के साथ तालमेल करने में मदद मिलेगी। समाज में सभी को समान अधिकार और अवसर मिलना चाहिए। समाज सेवा का कार्य हमें एकजुट करता है। एक बेहतर समाज की परिकल्पना के लिए संवाद व सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है।

कुटुंब प्रबोधन 

यह हमारा परिवार है, यह भारतीय परिवार है। उसका एक कर्तव्य अपने आप को ठीक चलाना है और ऐसे अनेक कर्तव्य को पार करते करते एक अंतिम कर्तव्य उसका यह है की सम्पूर्ण दुनिया के सामने परिवार कैसा होना चाहिए इसका उदाहरण प्रस्तुत करना है। यह करने के लिए क्या करना चाहिए इसका सारा ज्ञान अपनी हजारों वर्षों की प्राचीन परम्परा में से हम तक अक्षुण्ण चला है। सब प्रकार की परिस्थितियों में हमारे लोगों ने वेदकाल के समय से अभी तक अपने परिवार को चलाकर दिखाया है। आज हम लोग जानते है की परिस्थिति बड़ी कठिन है। लोगों को अच्छा रहना कठिन होते जा रहा है। इतने विपरीत प्रभाव आज की परिस्थिति में चाहे अनचाहे, जाने अनजाने क्यों या हो, लेकिन है। परिस्थिति बिगाड़ने के लिए भी प्रयास चलता है। हम जानते हैं, यह कपोलकल्पित कथाए नहीं है। अनेक दशकों तक गुलाम बनाए रखने के लिए पाश्चात्य देशों ने चीन में अफीम भेज कर वहां की युवा पीढ़ी को नशीली बना दिया और उसके पंगुत्व के भरोसे चीन पर राज किया। हमारे यहां आज यही प्रयोग चलता है।

कुटुंब प्रबोधन पर हम  तीन स्तर पर काम कर सकते है। 

हफ्ते में कम से कम एक दिन परिवार के साथ बैठकर भोजन करें,अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास पर बात करें । दूसरा स्तर है अपने मित्र व रिश्तेदारों  के परिवारों की बैठ कर भोजन करें  

सामूहिक चर्चा करे पर विवादों से बचें । हम सभी अपने आसपास के परिवारों के बीच मेलपिलप करें व  बातचीत करे व उनके सुख दुख मे भागीदारी करें ।

स्व का बोध  

हमारे सभी व्यवहार स्व-आधारित होने चाहिए। आत्म-आधारित जीवन का अर्थ है जीवन उपभोग के लिए नहीं है। समृद्धि आवश्यक है लेकिन भ्रष्टाचार नहीं। 

स्वदेशी का मतलब विदेशी सामान इस्तेमाल न करना, इतना आसान नहीं है। विनोबाजी कहते हैं स्वदेशी का अर्थ है आत्मनिर्भरता और अहिंसा। संघ ने इसमें एक चीज़ जोड़ी है: आत्मनिर्भरता, अहिंसा और सादगी। मितव्ययिता से जियो, कंजूसी से नहीं।

अपने व्यवहार,दृष्टिकोण,ताकत,और कमज़ोरियों के बारे में जानकारी होना । इससे दूसरों के प्रति अपने दृष्टिकोण का अनुमान लगाता है । 

आत्म-बोध में आत्म-सम्मान, आत्म-मूल्य, पहचान, और आत्म-छवि शामिल है |आत्म-बोध, मनोविज्ञान 

के प्रमुख लक्ष्यों में से एक है | दूसरों के साथ बातचीत भी आत्म-बोध को आकार देती है । आत्म-बोध को विकसित करने में अनुभव और दूसरों के साथ बातचीत का इस्तेमाल किया जा सकता है । आत्म-बोध अपनी  विकासशील पहचान से जुड़ा हुआ है | बच्चों को स्वयं के बारे में सकारात्मक भावना विकसित करने में मदद करना,भाषा भोजन व वेश स्वदेशी होनी चाहिए,अपने देश मे निर्मित समान का उपयोग करे | शादी व मांगलिक उत्सव के समय अपनी भाषा में निमंत्रण पत्र छपवाए,अपने मे व मित्रों से अपनी भाषा में बात करें,हॅलो की जगह अपनी मातृ भाषा का उपयोग करें राम-राम,नमस्ते इत्यादि ।

नागरिक कर्तव्य

नागरिक एवं सामाजिक अनुशासन का पालन करना ही स्वतंत्र देश में प्रतिदिन प्रकट होने वाली देशभक्ति है। जब हम स्वतंत्र नहीं थे तो विदेशियों के विरुद्ध आंदोलन करना, उन्हें येनकेन प्रकारेण देश से बाहर निकालने का प्रयास करना, वह देशभक्ति थी। वह तब आवश्यक थी और हमने यह किया। अब देश आजाद हो गया है, अब क्या करें? अब कोई दुश्मन नहीं, सब अपने है। इसलिए स्नेह के आधार पर आपसी व्यवहार और स्वतंत्र देश के संविधान में निर्धारित अनुशासन का पालन किया जाना चाहिए। स्वतन्त्रता-पूर्व युग में देशभक्ति का अर्थ स्वतन्त्रता के लिए सभी प्रकार के आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी था। लेकिन आज देशभक्ति नागरिकों के नागरिक अनुशासन के माध्यम से व्यक्त की जाती है। नागरिक कर्तव्यों का पालन सच्ची देशभक्ति है, क्योंकि यह देश की सुरक्षा, स्थिरता और प्रगति के लिए आवश्यक है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता – कानूनों का पालन करना और राष्ट्रीय सुरक्षा नागरिक कर्तव्य बोध का मतलब है कि नागरिकों को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना चाहिए और उन्हें पूरा करने के लिए ज़िम्मेदार होना चाहिए । नागरिक कर्तव्यों को पूरा करना, सरकार और नागरिकों के बीच होने वाले अनुबंध का सम्मान करना है।

नागरिकों के कर्तव्य कानून द्वारा अनिवार्य नहीं होते, लेकिन इन्हें सामाजिक रूप से अच्छा माना जाता है । इनका उलेख राज्य के नीति निर्देशक तत्व के द्वारा संविधान में है । 

चुनाव में मतदान करना,सामुदायिक सेवा परियोजनाओं में भाग लेना,करों का भुगतान करना,अदालत में गवाह के तौर पर सेवा करना,नियमों का पालन करना,हेलमेट पहनना,कार मे सीट बेल्ट बांधना,

सरकारी व सामाजिक संसाधनों व सीमित उपभोग करना ।   

(लेखक जानकारी काल पत्रिका के संपादक व विद्या भारती प्रचार विभाग मेरठ प्रांत के संरक्षक हैं)

कुलदेवता 

               बालेश्वर गुप्ता, नोयडा

               आज दादी अम्मा की आंखों में अलग ही चमक दिखायी दे रही थी।नम होती आंखों को बार बार पोछती और सामने लगे पीपल के वृक्ष पर कलावा बांधते बांधते दादी अम्मा भावुक हो उठती।मम्मी शायद दादी की भावनाओं को समझ रही थी तभी तो बार बार वे दादी अम्मा को सहारा भी देती और उनका सहयोग भी कर रही थी।

        पता नही कब, कुछ किसी को कुछ याद तक नही कि घर के सामने हमारे ही किस पीढ़ी के पूर्वज ने एक पीपल का पेड़ लगाया था और वहीं एक बहुत  छोटा सा त्रिकोण सा ईंटो का एक मंदिर नुमा ढांचा बनवा दिया था।सब कहते कि वहां हमारे कुल देवता निवास करते हैं और पीपल का वृक्ष उन पर छाया रखता है।यूँ तो हमारे घर से कोई न कोई प्रतिदिन कुलदेवता के घर मे दीपक जलाता ही था,पर यदि घर मे कोई बीमार पड़ जाता या कोई परेशानी खड़ी हो जाती तो कुलदेवता को खूब याद किया जाता और तब वहां वह संकट टलने तक दादी अम्मा स्वयं ही रोज दीपक जलाती और पीपल पर कलावा बांधती।उनका विश्वास था कि हमारे कुलदेवता जरूर हमारी सहायता करेंगे।मेरे पापा ने तो कुलदेवता के उस घर को टाइल्स से सजवा दिया था तथा पीपल के उस वृक्ष के चारो ओर चबूतरा बनवा दिया था।उस चबूतरे पर गावँ के लोग भी रोज बैठ कर अपनी महफ़िल देर रात तक जमाते थे,मेरे पापा भी उनके साथ ही बैठते।पीपल का वह पेड़ असल  मे मेरे परिवार की भावनाओ से तो जुड़ा ही था,वह गांव की पहचान भी बन गया था।   राम कृपाल जी की अपनी पैतृक हवेली गावँ में जहां स्थित थी उसी के पीछे उनकी कई एकड़ कृषि भूमि भी थी और सामने था पीपल का पेड़।रामकृपाल जी तो स्वर्ग सिधार गये थे पर पीपल के पेड़ के नीचे बने कुलदेवता पर दीपक जलाने और पीपल पर कलावा बांधने की परंपरा जो परिवार में चली आ रही थी उसे उन्होंने बड़ी ही श्रद्धा से चालू रखा था।उसी परंपरा का निर्वहन अब उनका पुत्र रमेश और उसकी पत्नी  कर रहे थे।इनका एक मात्र पुत्र मुन्ना जो मुश्किल से 7-8 वर्ष का ही था,वह भी यह सब कौतूहल पूर्वक देखता था या यूं कह ले वह भी भविष्य के लिये इस परंपरा को चलाने की ट्रेनिंग ले रहा था।राम कृपाल जी की पत्नी यानि रमेश की माता जी यानि मुन्ना की दादी यशोदा 87 वर्ष की अवस्था मे भी कुलदेवता पर दीपक जलाना और पीपल के वृक्ष पर कलावा बांधने को नही भूलती।कोई न हो तो भी वे मुन्ना का हाथ पकड़ कर पीपल के पेड़ के नीचे चली आती।

        एक वज्रपात एक दिन हो गया।सरकार का फरमान आ गया कि इधर से एक सड़क निकलेगी और वह पीपल का वृक्ष वहां से उखाड़ दिया जायेगा।पूरे घर मे मातम छा गया।क्या हमारे कुलदेवता को हटा दिया जायेगा, हमारी पहचान बन चुके पीपल के पेड़ को भी हटा दिया जायेगा?सोचकर ही घर के पूरे सदस्य सदमे में आ जाते। रमेश जी खुद अंदर से दुखी थे,पर असहाय अवस्था मे माँ को समझाते, माँ तू ही बता,कुलदेवता तो हमारे मन मे बसे हैं, गावँ का विकास हो रहा है,शहर के लिये सड़क बन रही है तो क्या हम रोड़ा बन जाये?माँ कुछ न बोल पाती, पता नही विकास की बात वह समझ भी रही है या नही,बस उसकी आँखों से आंसू ढलक पड़ते।असल बात तो यह थी सब दुखी थे,पर आत्मसंतुष्टि का कोई न कोई तर्क गढ़ते,पर सफल कोई नही हो रहा था,सब एक दूसरे से आंख बचा रहे थे।

       बेचैन से रमेश जी को एक उपाय सूझा और वे अगले दिन शहर में जिलाधिकारी महोदय से अकेले ही मिलने पहुंच गये।जिलाधिकारी महोदय को उन्होंने अपनी 87 वर्षीय माँ की भावनाओं का हवाला देते हुए प्रस्ताव रखा कि निर्माण होने वाली सड़क के लिये वे बिना किसी मुहवाज़े के अपने खेत की भूमि देने को तैयार हैं।बस हमारे पीपल के वृक्ष को सुरक्षित छोड़ दिया जाये।

        जिलाधिकारी महोदय आश्चर्य से रमेश के चेहरे को देख रहे थे।एक पीपल के वृक्ष के लिये जिससे किसी फल तक भी प्राप्ति नही होती यह व्यक्ति अपनी कृषि भूमि भी देने को तैयार है,बस इसलिये कि उस पीपल के पेड़ के नीचे उनके कुलदेवता वास करते हैं।

       जिलाधिकारी महोदय यह भी सोच रहे थे कि काश आज भारत मे हर पेड़ के नीचे किसी न किसी के कुलदेवता का वास होता तो कोई पेड़ कटता ही नही,पर्यावरण की समस्या से जूझना ही नही पड़ता। उन्होंने पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों को बुलाकर रमेश जी के प्रस्ताव पर विचार करने के निर्देश दिये।पीडब्ल्यूडी अधिकारी बोले साहब वह सड़क वास्तव में सुविधानुसार रमेश जी के खेत से ही निर्मित होनी थी,पर कृषि भूमि होने के कारण उसकी उपलब्धता न होने की दशा में परियोजना विलंबित होती इसलिये ही सड़क के निर्माण के लिये पीपल के वृक्ष वाली राह को चुना गया था। तो रमेश जी को उचित मुहवजा भी  देने को तत्पर है।रमेश जी तो हतप्रभ रह गये। उनके प्रस्ताव को इतनी सहजता से स्वीकार कर लिया जायेगा, इसकी तो उन्होंने कल्पना तक नही की थी।  घर वापस आ रमेश जी अतिरेक में दरवाजे से चिल्ला रहे थे,माँ ओ माँ देख तो अपने कुलदेवता की महिमा,री माँ अब हमारे भगवान कही नही जायेंगे, हमारा पीपल यूँ ही फैलता रहेगा।

     माँ की आंखों मे आँसू तो आज भी थे,पर ये आंसू उनकी श्रद्धा और विश्वास की जीत के थे।

मेरे दर्द, शिव का दर

रिँकू शर्मा,हिंदी अध्यापिका,अंबाला,

समय लगा समझने में, अब दुखड़े नहीं बताने

जिनका दर्द तुम बाँटोगे,  वही हो जाएँगे बेगाने

सुनकर तेरे मन का दर्द,  देंगे तुम्हीं को ताने

घुटन दबा कर जी लेना,मत बनना दीवाने

छुपा लेना मन के घाव, कोई भी देख न पाए

तेरी पीड़ा बस तेरी है, कोई न इसे अपनाए

दुखी मन, उदास चेहरा, किसी को न भाए

मंजिल तक चलता जा, कदम कदम बढ़ाए

महादेव देगें  साथ तुम्हारा, तुम नीयत साफ़ रखना

सौंप देना स्वयं को उन्हें, फिर उनका न्याय तकना

वे कुंदन बना देंगे तुम्हें, तुम उन्हें बना लो अपना

जब होगी उनकी कृपा ,तब पूरा होगा हर सपना

पर्यावरण प्रेमी 

– राजेंद्र सिंह (सोनीपत, हरियाणा)

“तीन साल पहले, मेरे घर की छत पर कचरे और बेकार पड़ी चीजों के अलावा और कुछ नहीं था। घर बनने के कई साल बाद ये सब चीजें इकट्ठी हो गयी थीं। एक दिन मैं छत पर यूँ ही टहलने गया तो मुझे एक आइडिया आया कि क्यों न अपने छत को हरा-भरा बनाया जाए। बस फिर क्या था, मैं एक कबाड़ी वाले के पास गया और उससे कुछ बेकार डिब्बे और बाकी चीजें बहुत ही सस्ते दाम पर लेकर आया। इन डिब्बों के नीचे छेद किया ताकि इनमें पौधे लगाए जा सकें। इसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बहुत से लोग मुझ पर हंसते थे, बहुतों ने मना किया क्योंकि हरियाणा में इस तरह की चीजें मुश्किल से ही देखने को मिलती हैं।

जब मैंने अपना टेरेस गार्डन लगाना शुरू किया तो मेरे दिमाग में एक ही बात थी- बेस्ट आउट ऑफ वेस्ट। इसलिए, जो भी चीज़ बेकार कहकर फेंकी जाने वाली थी या फिर कबाड़ी वाले को दी जानी थी, मैंने अपने गार्डन के लिए इस्तेमाल की….. पुराने टायर, टूटी हुई टाइल्स, पेंट के खाली डिब्बे, रस्सी के टुकड़े, लोहे की छड़ी आदि ।

मैं सुबह 4 बजे से उठकर दो घंटे तक अपने गार्डन पर काम करता और उसके बाद तैयार होकर ऑफिस जाता। शनिवार और रविवार की छुट्टी वाले दिन में मैं सीमेंट के प्लांटर्स बनाता था।

बस एक के बाद एक आइडियाज़ मुझे आते रहे और मैंने इसे हक़ीक़त बनाया। धीरे- धीरे घरवालों को भी मेरा प्रयास समझ में आने लगा और उन्होंने मुझे रोकना-टोकना बंद कर दिया। लोगों से अपना 

कोई काम करवाना हो तो रिश्वत सबसे पुराना तरीका है करवाने का। मुझे भी अपने घरवालों से कुछ करवाना होता है तो मैं अपने गार्डन से उन्हें आम, नींबू, और ताजी सब्ज़ियों का रिश्वत देता हूँ।

आज मेरे टेरेस गार्डन में छोटे-बड़े 2000 गमले हैं और जिनमें लगभग 400 किस्म के पेड़-पौधे लगे हुए हैं। मैं आज भी हर दिन चार घंटे अपने गार्डन को देता हूँ। इससे मुझे बहुत खुशी मिलती है और साथ ही, दिल में सुकून और आत्म-संतुष्टि है।”

 

शनिवर 

शनिवर ओर मैं , हम दोनों साथ में पढ़े खेले और बड़े हुए। शनिवर बिसारती हैं अर्थात इनका रोजगार चूड़ी बेचना है, जब हम गांव जाते हैं तो यह मिलने जरूर आते हैं साथ में चूड़ी का बक्सा लेकर। काम धंधा और मेल मिलाप दोनों जरूरी। 

हम लोग बचपन की बातें खूब करते हैं, गोली खेलने से लेकर मार मरउझे की बात तक, फिर बिछड़े यार दोस्तों की बात होती, बाल बच्चों की बात होती लेकिन इस दौरान कोई चूड़ी बेसहने आ गई तो शनिवर धंधे से समझौता नहीं करते, मुझे प्रतीक्षा करनी होती है।

शनिवर के काम को देखकर मुझे आनंद आता है, उन्हें अपनी कला और काम  पर उतना विश्वास है जितना मुझे अपनी कलम पर। शनिवर के अंदर कम पैसे होने का कोई विक्टिमहुड नहीं है, एक दिन मैने कहा शहर चलो वहां पैसा ज्यादा है, शनिवर ने तुरंत कहा कि पैसा ज्यादा आने से आदमी शराब पीने लगता है, परसंतापी हो जाता है। पैसा मैटर नहीं करता आराम और खुशी मैटर करती है, अपना पेट, परिवार का पेट बाल बच्चों की पढ़ाई लिखाई दवाई का खर्च निकल आता है और क्या चाहिए, बाकी कमाने की कोई सीमा तो है नहीं। शनिवर बोलते गए, पैसे आने के बाद भाई भाई को नहीं पहचानता। 

मैं सुनता रहा, क्या स्वार्थी होना पैसे बनाने का एकमात्र आधार है!  पैसे के आधार पर संबंध बनाने वाले, पैसे के आधार पर जीवन को आंकने वाले बहुत बड़ी भूल करते हैं। पैसा जरूरी है पर इससे भी अधिक यह जरूरी है कि आपकी जरूरतें क्या हैं उसकी पहचान हो जाना। जरूरत से ज्यादा पैसा कैंसर है जो जितना अधिक बढ़ता जाता है उतना ही शरीर का नुकसान करता है। जिनके पास ढेर सारा पैसा है उनके पास उतनी ही समस्याएं और परेशानियां हैं। पैसा एकमात्र परेशानी का हल नहीं।

एक समय के बाद पैसे के प्रति मोह छोड़ना श्रेयस्कर होता है। पैसा  है तो ठीक नहीं है तो कहीं न कहीं से काम भर आ ही जाएगा ज्यादा हाय हाय ठीक नहीं। शनिवर इस मामले में गुरु हैं।

 

आपकी आँख अच्छी है , जो अच्छा ही देखती है।

                                                                                                             किशन लाल शर्मा 

रात शायद अच्छी गहरी नींद आयी ; मैं सुबह अपने आपको फ्रेश और स्वस्थ महसूस कर रहा था।  दिन की एक कार्य सूची बनायी घर के सभी काम सलटा  कर  घर से निकल पड़ा।  आज  कुछ अलग ही जोश था।  शरीर भी हल्का फुलका लग रहा था। दिल में कुछ अलग ही उमंग थी।  आकाश में पंख लगा कर ऊंचा उड़ जाऊं।  सब कुछ अच्छा – अच्छा ही लग रहा था।  सड़क पर कोई भीड़ भड़क्का नहीं था।  रेडी वाले, रिक्शा वाले , खोमचे वाले सभी प्रतिदिन की भांति अपने काम धंदे में लगे थे।  सभी अच्छे लग रहे थे। मन को भा रहे थे।  कहीं कोई कचरा ; गंदगी नज़र नहीं आ रही थी।  ख़ुशी – ख़ुशी मैं चल रहा था या पानी की सतह पर तैर रहा था या हवा में उड़ रहा था , कुछ समझ नहीं आ रहा था।  पर हाँ यह मुझे समझ आ रहा था कि मैं आज खुश हूँ। सड़क पर सामने से आते लोगों में से मेरी नजर एक सज्जन पर पड़ी और उनकी तरफ मैं कुछ आकर्षित हुआ।  मैं उनको लगातार देखता रहा और वह सज्जन और पास आते रहे।  मेरा मन किया और उनको मैंने हाथ के इशारे से रोक लिया। सर पर आधे काले सफ़ेद बाल ,क्रीम रंग का सूट पहने , पॉलिश किये चमके जूते और मुँह पर एक मीठी सी मुसमान।  आँखों में सीधा सा प्रश्न , कहिये ? मैंने भी उनकी जिज्ञासा और प्रश्न का झट से  उत्तर दिया। स्वतः ही दोनों हाथ नमस्कार की मुद्रा में आ गये और मैंने उनसे कहा , सर ! मैं आपको नहीं जानता पर आप मुझे अच्छे लगे इसलिए मैंने आपको रोक लिया। आपकी क्या पर्सनैलिटी है।  दिल किया आपसे बात करूँ और मैंने आपको रोक लिया।  आप अच्छे हैं ; इसलिए  मैंने आपको रोक लिया। मुस्कुराकर उन्होंने कहा , मैं अच्छा नहीं हूँ , आपकी आँख ही अच्छी है जो अच्छा ही देखती है। कुछ 

 

बातों के सिलसिले के बाद हम दोनों ने एक दूसरे से विदा ली। सड़क पर चलते हुए मैंने विचार किया कि आज मुझे सब अच्छा – अच्छा ही क्यों लग रहा है ? वही सड़क है लोग वही हैं।  रेडी वाले ,

रिक्शा वाले , खोमचे वाले सभी तो रोजाना जैसा ही होते हुए भी मुझे आज विशेष अच्छा क्यों लग रहा है ? देखने वाली आँख  भी तो वही है।  गहरी नींद से उठा और सब सुबह का काम सुचारू रूप से और मेरे मन का हुआ तो मुझे अच्छा लगा।  घर से अच्छे मूड में निकला और मुझे सब अच्छा ही लगता रहा।  मन शांत और  किसी परेशानी में नहीं था।  सब अच्छा लग रहा था। ऐसी सूरत में आपका व्यवहार भी 

अच्छा होगा आप अपने चारों ओर ख़ुशी और मधुरता फैलाएंगे। किसी मित्र ने अपने दोस्त से कहा , यार ! देश की हालत बड़ी ख़राब है। उसने पूछा , क्या ये हालत तुमने की है ? उत्तर मिला नहीं। 

इसमें तुम कुछ कर सकते हो ? नहीं ? अगर नहीं तो चुप करके चाय पी।  इसमें बहुत साफ़ सन्देश दिया गया है।  सदा सकारात्मक बातचीत करो , नकारात्मक नहीं।  अपनी आँखों से अच्छा ही देखो।  कमल का फूल कीचड़ में पैदा होता है। किसी भी फूल में सुंदरता और खुशबू होती है।  फूल में कीड़े भी होते  हैं। पत्थरों की खदानों में हिरे भी मिलते हैं। समाज का प्रत्येक व्यक्ति सर्वगुण सम्पन्न नहीं हो सकता। इसमें अच्छाइयों के साथ साथ  कुछ कमियां भी होंगी।  आप अपनी आँखों को केवल अच्छाइयों देखने के लिए प्रशिक्षित करें। कमियों या बुराईयों की तरफ आपकी नज़र नहीं जानी चाहिए।  आप अपनी आँख को अच्छा बनाएं जो अच्छा ही देखे। 

 

चौघड़िया मुहूर्त

चौघड़िया मुहूर्त, ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय जानने की एक प्रणाली है। यह 24 घंटों को 8 भागों में विभाजित करता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया एक निश्चित अवधि का होता है, और इन्हें शुभ और अशुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है. 

चौघड़िया मुहूर्त क्या है? 24 घंटों को 16 भागों में बांटा जाता है, जिन्हें चौघड़िया कहा जाता है। प्रत्येक चौघड़िया लगभग 1.30 घंटे का होता है। 

शुभ-अशुभ – कुछ चौघड़िया शुभ माने जाते हैं, जैसे अमृत, शुभ, लाभ, और चर। कुछ अशुभ माने जाते हैं, जैसे रोग, उद्वेग, और काल। चौघड़िया का उपयोग शुभ कार्यों, जैसे विवाह, यात्रा, और व्यापार शुरू करने के लिए शुभ समय जानने के लिए किया जाता है। चौघड़िया के प्रकार,दिन का चौघड़िया,सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दिन का चौघड़िया कहा जाता है। रात का चौघड़िया,सूर्यास्त से अगले दिन के सूर्योदय तक के समय को रात का चौघड़िया कहा जाता है। 

चौघड़िया का महत्व,चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए एक अच्छे समय का चयन करने के लिए किया जाता है। यह माना जाता है कि यदि कोई कार्य शुभ चौघड़िया में शुरू किया जाता है, तो उसके सफल होने की संभावना अधिक होती है।   

 

पिताजी कभी रिटायर नहीं होते

सचिन साळुंके 

“पिताजी अब रिटायर हो गए हैं…”ये शब्द जितने साधारण लगते हैं,उतनी ही बड़ी एक गलतफहमी 

खुद इस वाक्य में छुपी होती है।क्योंकि सच्चाई ये है पिताजी कभी रिटायर नहीं होते।न वक़्त से, न ज़िम्मेदारियों से।न रिश्तों से, न फर्ज़ से।नौकरी से रिटायर हो सकते हैं,ऑफिस जाना बंद हो सकता है,

लेकिन ज़िम्मेदारियाँ…?वो कभी खत्म नहीं होतीं।जब बच्चे छोटे होते हैं, तो पिताजी घर चलाते हैं।जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो पिताजी घर सम्भालते हैं।जब बच्चे खुद बाप बन जाते हैं, तब भी वो अपने पिताजी से सलाह लेते हैं…क्योंकि “बाप”, कभी सलाह से रिटायर नहीं होता।बचपन में जब हम गिरते थे, माँ दौड़ती थी, लेकिन पिताजी दूर से देखते थे।क्योंकि उन्हें भरोसा होता था कि अगर अब नहीं सीखा उठना,तो ज़िंदगी इसे हर बार गिराएगी और बच्चा हर बार किसी की ओर देखेगा।उन्होंने हमें गिरने दिया…लेकिन कभी गिरने नहीं दिया ज़िंदगी में।कई बार लगता था कि पिताजी सख़्त क्यों हैं?

क्यों नहीं वो हमारे जैसे सोचते?क्यों हर चीज़ में ‘ना’ ही सुनाई देती थी?लेकिन आज जब खुद ज़िम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं,EMI भरनी होती है,बिल देखना होता है,बच्चों के स्कूल की फीस से लेकर बूढ़े माँ-बाप की दवाइयों तक का हिसाब रखना होता है…तब समझ आता है –पिता की सख्ती दरअसल एक कवच होती है…जो वो अपने बच्चों के भविष्य पर चढ़ा देता है।पिता कभी थकते नहीं थे।

चाहे रात की शिफ्ट हो या दोपहर की धूप,कभी अपनी हालत का ज़िक्र तक नहीं किया।बेटा खांसी से परेशान हो, तो पूरा घर सिर पर उठा लेते थे,लेकिन खुद बुखार में भी काम पर जाते थे…क्यों?

क्योंकि पिताजी जानते थे घर की नींव को खुद को मज़बूत रखना होता है,दीवारों को हिलने नहीं देना होता।आज जब हम उन्हें कुर्सी पर बैठे पाते हैं, चुपचाप खिड़की के बाहर देखते हुए,तो लगता है कि वो 

 

अब “फ्री” हैं।लेकिन नहीं…अब भी उनके दिमाग़ में बस यही चलता है “बेटा ठीक है ना?””पोता बड़ा हो रहा है, स्कूल की फीस कितनी होगी?””अब मेरा बेटा मेरे बिना ये सब कैसे मैनेज करता होगा?” रिटायरमेंट उनके शरीर को मिलती है,मन को नहीं।सपने अब भी चलते हैं,बस उनके नाम नहीं होते,

बच्चों के नाम से जुड़े होते हैं। एक पिता कभी कहता नहीं –”मुझे तुम्हारी ज़रूरत है” वो बस दरवाज़े के पास बैठा इंतज़ार करता है कि बेटा थोड़ी देर उसके पास बैठे,थोड़ी बातें करे। जब बच्चे पैसे कमाने लगते हैं, तो उन्हें लगता है कि अब पापा पर बोझ नहीं है। पर सच्चाई यह है –पैसा पापा का बोझ नहीं उठाता, पापा ही हमेशा पैसे के बोझ से हमें बचाते रहे।आज की पीढ़ी सोचती है कि मोबाइल मे “Retired” लिख दिया तो बस –अब उनकी ज़िम्मेदारी खत्म। पर क्या किसी बेटे ने कभी पूछा है “पिताजी, अब आप क्या करना चाहते हो?””अब आपकी ख्वाहिशें क्या हैं?”

“जिन चीजों के लिए आपने ज़िंदगी भर इंतज़ार किया, क्या अब उन्हें जीना चाहोगे?”अगर नहीं पूछा है,

तो आज पूछिए।आज बात कीजिए।क्योंकि जिस दिन पिता चुप हो जाते हैं…उस दिन घर में सबसे बड़ा सन्नाटा फैलता है।पिता रिटायर नहीं होते।वो बस एक दिन इतना थक जाते हैं,कि मुस्कुराना भी छोड़ देते हैं।उनके कंधे अब बोझ उठाने के काबिल नहीं रहते,पर मन अब भी वही है –जो चाहता है कि घर चलता रहे,सब खुश रहें।इसलिए अगली बार जब आप उन्हें एक कोने में बैठे हुए देखें,तो मत समझिए कि वो अब “फ्री” हैं…समझिए कि अब उन्हें हमारी “फिक्र” है।और हमें उनकी “जरूरत”।”पिता रिटायर नहीं होते,वो बस उम्र के आख़िरी पड़ाव पर खड़े होकरअपने बच्चों की ज़िंदगी को एक सफल मुसाफ़िर की तरह जाते हुए देखते हैं…बिना कोई आवाज़ किए, बिना कोई शिकायत किए…”

 

यह एक शिक्षक के जीवन की अंतिम शाम थी

दिनकर सर …..अपने  विद्यार्थियों के बीच  काफी लोकप्रिय  एक सेवा निवृत शिक्षक।   3 दिन पूर्व ही  शहर के एक अस्पताल में इलाज के चलते उनका  देहावसान हो गया था।

उनको श्रद्धांजलि देने हेतु  आज प्रार्थना सभा आयोजित की गई थी। समय हो चला था इसलिए लोग धीरे-धीरे एकत्रित हो रहे थे। 

ठीक समय पर सभा शुरू हुई। एक-एक कर  उनके विद्यार्थियों ने और कुछ  लोगों ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला।

अभी सभा चल ही रही थी कि एक अनजान व्यक्ति ने प्रवेश किया और यह कहते हुए सबको चौंका दिया कि अस्पताल में दिनकर सर के  बेड पर तकिये के नीचे यह लिफाफा मिला , जिस पर लिखा है कि इसे  मेरी प्रार्थना सभा में ही खोला जाए।

दिनकर सर की इच्छा के अनुरूप एक व्यक्ति ने लिफाफा खोला। लिफाफे एक पत्र प्राप्त हुआ। माइक से उस पत्र का वाचन शुरू किया-

“प्रिय आत्मीय बंधुओ,

जब यह पत्र पढ़ा जा रहा होगा  तब तक मैं संसार से विदा ले चुका होंगा। मेरा यह पत्र मुख्यतः शिक्षकों से अपने  जीवन के अनुभव बांटने के लिए है। अगर वह इससे कुछ प्रेरणा ले सके तो मैं अपने जीवन को धन्य समझुंगा।

बात 1975 की हैं। एक शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए मुझे 20 वर्ष हो चुके थे। इसी दौरान एक बार मैं अपनी धार्मिक यात्रा पर वृंदावन गया हुआ था। वहां  एक संत रामसुखदास के सत्संग में जाना  हुआ । प्रवचन समाप्त होने पर मैंने अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी –

“स्वामीजी!मुझे ईश्वर में बहुत आस्था है परंतु मैं नियमित पूजा पाठ, कर्मकांड आदि नहीं कर पाता हूं 

 

और इसमें मुझे रुचि भी नहीं है कृपया बताएं मैं ईश्वर की कृपा कैसे प्राप्त करु।”

स्वामी जी थोड़ी देर चुप रहे। कुछ देर सोच कर उन्होंने कहा –

“देखिए ! भक्ति का अर्थ होता है सेवा। अगर हम इस दुनिया को ईश्वर का ही स्वरूप माने और सभी के प्रति सद्भावना रखते हुए सेवा भाव  से अच्छे कर्म करें तो यह भी ईश्वर की ही भक्ति हुई। “

कुछ देर मौन रहकर स्वामी जी ने फिर प्रश्न किया-

“अच्छा यह बताइए कि तुम क्या करते हैं?”

“जी मैं एक शिक्षक हु “

“तुम्हे अपना यह कार्य कैसा लगता है ?”

” बहुतअच्छा लगता है। बच्चों के बीच रहना और उन्हें पढ़ाना, इसमें मुझे आनंद प्राप्त होता है।”

“तो अपने इसी कर्म को ईश्वर की भक्ति बना लो। देखा जाए तो शिक्षक का विद्यार्थी के प्रति, व्यापारी 

का ग्राहक के प्रति, डॉक्टर का मरीज के प्रति, नेता का जनता के प्रति यदि सेवा का भाव मन में जाग्रत हो जाए तो यह यथार्थ भक्ति हुई ।”

दो-तीन दिन बाद हम अपने गांव लौट आए और एक बार फिर मैं अपने स्कूल में था। स्वामी जी की बातों से तो अब बच्चों को पढ़ाने मे मुझे और भी आनंद आने लगा। हालांकि जल्द ही मुझे एहसास हो गया कि ईश्वर के प्रतिक चिन्ह मूर्तियों की पूजा करना तो फिर भी आसान हैं।कभी भी स्नान करा दो, कुछ भी भोग लगा दो। स्तुति करो तो ठीक, ना करो तो ठीक। उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं, कोई नखरे नहीं।  पर ये बच्चे… उफ्फ….इनकी चंचलता, शरारते, जिज्ञासाओं से भरा मन। कितनी कठिन है इनकी भक्ति।

स्कूल में सभी प्रकार के बच्चे होते हैं कुछ बहुत होशियार ,कुछ मंदबुद्धि ,कुछ आज्ञाकारी तो कुछ उद्दंड। ऐसा लगता था जैसे ईश्वर इन बच्चों के माध्यम से मेरे धैर्य, सहनशीलता की परीक्षा ले रहा हो ।पर इन सब बच्चों में मेरी ही कक्षा आठवीं का एक लड़का विजय ऐसा था जो बहुत ज्यादा समस्या मूलक था।उसका व्यवहार एक अत्यंत आवारा, बिगड़ैल बच्चे की तरह था। पढ़ाते समय बीच बीच में बोलना, शिक्षकों पर फब्तियां कसना। बच्चो के साइकिल की हवा निकाल देना या उनका सामान गायब कर देना। यह उसके लिए रोज की बात थी। और इन सब में वह अकेला नहीं था। उसकी पूरी टोली थी। उसकी इन हरकतों से कभी-कभी इतना गुस्सा बड़ जाता कि  मैं उसकी जोरदार पिटाई कर देता।  यह सब मेरे बस के बाहर की चीज थी। 

समय इसी तरह निकल रहा था कि एक दिन सूचना मिली कि विजय का भयंकर एक्सीडेंट हो गया है और उसके दोनों पैर फ्रैक्चर हो गए हैं। सुनकर दुख तो हुआ परंतु हम सब के लिए यह राहत की बात थी कि वह महीने दो महीने स्कूल नहीं आएगा।

इस घटना को अभी सप्ताह भर ही हुआ था कि मुझे महसूस हुआ कि शायद मेरे विचार और भाव गलत दिशा में जा रहे हैं।हकीकत तो यह थी कि मेरी  भक्ति एक कठिन परीक्षा के दौर से गुजर रही 

 

थी।

विजय जैसे अपराधी प्रवृत्ति केबच्चो में प्रेम और संवेदनाओं का अभाव होता है। लेकिन संवेदनाओं को तो संवेदनाए देकर ही जागृत किया जा सकता था। अतः मैंने स्कूल  समाप्त होने के बाद विजय को उसके ही घर पर जाकर पढ़ाने का निर्णय लिया। 

मुझे अपने घर देखकर विजय चौक गया। मैंने उसे लेटे रहने का इशारा किया और एक्सीडेंट के बारे में सामान्य जानकारी प्राप्त की। परीक्षा नजदीक होने से उसके लिए समय बहुत महत्वपूर्ण था। अतः उसे पढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ।

विजय को मुझसे संवेदना पूर्ण व्यवहार की उम्मीद नहीं थी इसलिए उसे कहीं ना कहीं अपराध बोध हो रहा था। धीरे-धीरे उसे पढ़ने में मजा आने लगा। मैंने महसूस किया कि वह पढ़ाई में बहुत अच्छा था। उसकी याददाश्त भी बहुत तेज थी। मैं उसे गणित, विज्ञान ,और अंग्रेजी पढ़ाता और बाकी विषयों के नोट्स अपने साथी शिक्षकों से लेकर उसे देता।आठवीं ‘बोर्ड’की परीक्षा थी और परीक्षा के ठीक पहले 

वह स्वस्थ हो गया था। उसने परीक्षा अच्छे से दी  और वह 73% अंको से पास हो गया। ग्रीष्म अवकाश के तुरंत बाद मेरा ट्रांसफर अन्य जगह हो गया।समय धीरे-धीरे निकलता गया। मेरी ईश्वर भक्ति जारी रही। कई विद्यार्थी मेरे जीवन में आए।उनकी उच्च प्रतिभा में मैंने ईश्वर के दिव्य दर्शन किए…. और एक दिन मेरे सेवा निवृत्ति होते ही इस आनंदमय यात्रा पर विराम लगा। सेवानिवृत्ति के  लगभग 10 वर्ष बाद और इस पत्र को लिखने के 8 दिन पहले अचानक मेरा ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया और मैं  बेहोश हो गया। जब होश आया तो मैंने स्वयं को शहर के बड़े अस्पताल के आईसीयू वार्ड में एक बिस्तर पर पाया।

“मुझे क्या हुआ है?”  एक नर्स से मैंने पूछा।

“कुछ ही देर में डॉक्टर राउंड पर आने वाले है, वो ही बता पाएंगे ” कहते हुए नर्स चली गई। 

करीब 15 मिनट बाद डॉक्टर एक नर्स  के साथ मेरे बेड पर आए। डॉक्टर ने मेरी फाइल ली कुछ पढ़ा और मुझे गौर से देखकर हो आश्चर्यचकित होकर  कहा-

“सर …आप यहां..?”

“हां! पर क्या आप मुझे पहचानते है? मैंने डॉक्टर से पूछा।

“हां! पर पर शायद आपने मुझे नहीं पहचाना।”

“बिल्कुल सही है मैंने आपको नहीं पहचाना”

मैं विजय…..वही विजय जिसे आपने आठवीं कक्षा में पढ़ाया था”डॉक्टर ने चरण स्पर्श करते हुए कहा।

“अरे हां।तुम तो विजय हो!, परंतु इस अस्पताल में क्या कर रहे हो?”

“सर मैं यहां पर हार्ट सर्जन हूंऔर मेरी किस्मत बदलने वाले कोई और नहीं बल्कि आप है। कुसंगति में पड़कर मेरा भविष्य तो अंधकारमय हो चला था, परंतु आपके प्रेम और संवेदनाओं ने मेरा जीवन ही बदल दिया। मुझे आपसे ही आत्मविश्वास मिला। मेरी पढ़ने में रुचि बढ़ गई और मैं यहां तक आ पहुंचा। “”अरे वाह….तुमने तो मुझे खुश कर दिया।”विजय मेरी फाइल देख रहा था और अचानक उसका 

 

चेहरा गंभीर हो गया। “मुझे क्या हुआ है! विजय?” “कुछ नहीं सर ,आप जल्दी ही ठीक हो जाएंगे” कहते हुए वह चला गया।

मैं लेटे-लेटे उन दिनों की  स्मृतियों में खोया हुआ था कि मुझे नींद में समझकर  दो नर्स आपस में बातें करने लगी – “पहली बार विजय सर को रोते हुए देखा है,आखिर ऐसी भी क्या बात है?”

” ये अंकल, विजय सर के टीचर है।  इन्हे सीवीयर हार्ट अटैक हुआ है। कल शाम 6 बजे तक कवर कर लिया तो ठीक वरना बचना मुश्किल है”

अपनी स्थिति का यथार्थ मालूम होने पर भी मैं चिंतित नहीं था। रात में मैंने  महसूस किया की कोई  मेरे पैर पकड़े सुबक रहा था। देखा तो यह विजय था। मैंने उसे अपने पास बुलाया। “तू अपना कर्तव्य कर, डॉक्टर के रूप में अपना फर्ज निभा। पर सच तो यह है आज तुझसे मिलने के बाद तुझे इतने बड़े हॉस्पिटल का डॉक्टर बना देखकर मुझे मेरा रिपोर्ट कार्ड मिल गया। अगर भक्ति की परिणीति परम शांति के रूप में होती है तो अब मै पूर्णतया संतुष्ट हूं  एक शिक्षक के रूप में मेरी भक्ति को ईश्वर ने स्वीकार कर लिया। अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।एक तृप्ति दायक और आनंददायक मृत्यु मेरा इंतजार कर रही है । मैं चले भी गया तो मेरे जाने का शोक मत करना…. एक डॉक्टर के रूप में दुखियों की सेवा करना।”मुझे कब नींद लग गई पता नहीं। सुबह होकर खिड़की से मैं अंतिम बार सूर्य के दर्शन किए। शायद सूर्यास्त न देख पाऊं। आज 6 बजने में लगभग 3 घंटे हैं जब मैंने यह पत्र लिखना शुरू किया। मेरा यह पत्र  इस बात की गवाही देने के लिए है कि  सच्चे भाव से की गई सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। मेरा शिक्षक साथियों से यही कहना है कि किस  हीनता में जी रहे हो तुम। अपना महत्व समझो।……  अरे ये डॉक्टर,….इंजीनियर, कलेक्टर,….मंत्री, …संत्री… यह सब तुमने ही तो बनाए हैं। …..तुम ही तो शिल्पकार हो इन सबके।….. अपने गौरव को पहचानो,….उत्तरदायित्व को समझो,….. राष्ट्र के निर्माता हो तुम… … कोई मामूली इंसान नहीं हो तुम। …….वो देखो छुट्टियां खत्म होने वाली है…..वो देखो स्कूल का गेट खुलने वाला है .. शिक्षा के  पवित्र स्थान को बुहार लिया या नहीं तुमने। पूजा की थाल सजाई कि नहीं अब तक …..। तुम्हारा ईश्वर, अल्लाह, जीसस, वाहेगुरु  बस  प्रवेश करने ही वाला है।. अच्छा ..अब…अलविदा…..अलविदा…अलविदा।

पत्र का वाचन समाप्त हुआ। बहुत देर तक सभी खामोश  रहे ।अचानक सभी को ऐसा महसूस हुआ कि जैसे ‘दिनकर सर’ कहीं गए नहीं हैं… यही है जीवित है  हम सबके भीतर …..एक प्रेरणा बनकर…… जी हां …. *एक प्रेरणा बनकर।

 

 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ 

“कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, फलों में कभी नहीं। इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो, और न ही कर्म न करने में तुम्हारी आसक्ति हो।” 

 

     शिक्षा उदय 

सुनिल अग्रहरि ,एल्कोन इंटरनेशन स्कूल मयूर। विहार, दिल्ली 

भारत का नव निर्माण हो ,

विद्या का ऐसा आलय हो, 

मन मस्तिष्क निर्भय हो कर,

शिक्षा पथ आना जाना हो।।

 

किसलय से कोमल ये पल्लव

उर्वरक ज्ञान से पोषित हों,

नई शिक्षा का आधार हो ,

तकनीकी ताना बाना हों ।।

 

नित नए नए से अनुभव हो,

Ai से साक्षात्कार हो ,

उन्नति का मार्ग प्रशस्त करें,

समझना और समझाना हो।।

 

मिट्टी की सुगन्ध बनी रहे,

संस्कृति संस्कार श्रृंगार रहे,

भारतीय मूल्यों की वर्षा से ,

भीगना और भिगाना हो ।

 

जब तक ना हो अंत्योदय ,

तब तक संघर्ष विराम न हो ,

सर्वांगिड़ शिक्षा का अधिकार,

पहुंचना और पहुंचना हो ।।

 

    

जामुन

आजकल बाजार में जामुन फल आए हुए है लेकिन क्या आपको पता है इस फल के नाम पर एक देश का नाम भी है जी हा हमारे भारत को जम्बू द्वीप के नाम से भी जाना जाता है और यह नाम जामुन के वजह से है।आश्चर्य की बात तो है कि किसी फल के वजह से किसी देश का नामकरण किया गया !

दरअसल जामुन के कई नाम है और उन्हीं में से एक नाम है जम्बू ।  भारत में जामुन की बहुतायत रही है । हमारे देश में इसकी पेड़ों की संख्या लाखों-करोड़ों में है और शायद इसी कारण से यह फल हमारे देश का पहचान बन गया।

भारतीय माइथोलॉजी के दो प्रमुख केंद्र रामायण और महाभारत में भी यह विशेष पात्र रहा है।भगवान राम ने अपने 14 वर्ष के वनवास में मुख्य रूप से जामुन का ही सेवन किया था वहीं श्री कृष्णा के शरीर के रंग को ही जामुनी कहा गया है। संस्कृत के श्लोकों में अक्सर इस नाम का उच्चारण आता है।

जामुन विशुद्ध रूप से भारतीय फल है।भारत का हर गली – मोहल्ला ईसके स्वाद से परीचित हैं। जामुन एक मौसमी फल है। खाने में स्वादिष्ट होने के साथ ही इसके कई औषधीय गुण भी हैं। जामुन अम्लीय प्रकृति का फल है पर यह स्वाद में मीठा होता है। जामुन में भरपूर मात्रा में ग्लूकोज और फ्रुक्टोज पाया जाता है. जामुन में लगभग वे सभी जरूरी लवण पाए जाते हैं जिनकी शरीर को आवश्यकता होती है।

जामुन खाने के फायदे:

  1. पाचन क्रिया के लिए जामुन बहुत फायदेमंद होता है. जामुन खाने से पेट से जुड़ी कई तरह की समस्याएं दूर हो जाती हैं.
  2. मधुमेह के रोगियों के लिए जामुन एक रामबाण उपाय है. जामुन के बीज सुखाकर पीस लें. इस पाउडर को खाने से मधुमेह में काफी फायदा होता है.
  3. मधुमेह के अलावा इसमें कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो कैंसर से बचाव में कारगर होते हैं. इसके अलावा पथरी की रोकथाम में भी जामुन खाना फायदेमंद होता है. इसके बीज को बारीक पीसकर 

 

पानी या दही के साथ लेना चाहिए.

  1. अगर किसी को दस्त हो रहे जामुन को सेंधा नमक के साथ खाना फायदेमंद रहता है. खूनी दस्त होने पर भी जामुन के बीज बहुत फायदेमंद साबित होते हैं.
  2. दांत और मसूड़ों से जुड़ी कई समस्याओं के समाधान में जामुन विशेषतौर पर फायदेमंद होता है. इसके बीज को  पीस लीजिए. इससे मंजन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं.

 जामुन मधुमेह के रोगियों के लिए रामबाण है। यह पाचनतंत्र को तंदुरुस्त रखता हैं । साथ ही दांत और मसूड़े के लिए बेहद फायदेमंद है ।

जामुन में कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और पोटैशियम होता है।आयुर्वेद में जामुन को खाने के बाद खाने की सलाह दी जाती है। 

जामुन के लकड़ी का भी कोई जबाव नहीं है। एक बेहतरीन इमारती लकड़ी होने के साथ ईसके पानी मे टिके रहने की बाकमाल शक्ति है‌। अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल या हरी काई नहीं जमती सो टंकी को लम्बे समय तक साफ़ नहीं करना पड़ता |प्राचीन समय में जल स्रोतों के किनारे जामुन की बहुतायत होने की यही कारण था इसके पत्ते में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं जो कि पानी को हमेशा साफ रखते हैं। कुए के किनारे अक्सर जामुन के पेड़ लगाए जाते थे।

  नदियों और नहरों के किनारे मिट्टी के क्षरण को रोकने के लिए जामुन का पेड़ काफी उपयोगी है।  अभी तक व्यवसायिक तौर पर योजनाबद्ध तरीके से जामुन की खेती बहुत कम देखने को मिलती हैं। देश के अधिकांश हिस्से में अनियोजित तरीके से ही किसान इसकी खेती करते हैं।अधिकतर किसान जामुन के लाभदायक फल और बाजार के बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं, शायद इसी कारणवश वो जामुन की व्यवसायिक खेती से दूर हैं।जबकि सच्चाई यह है कि जामुन के फलों को अधिकतर लोग पसंद करते हैं और इसके फल को अच्छी कीमत में बेचा जाता है।

जामुन की खेती में लाभ की असीमित संभावनाएं हैं।इसका प्रयोग दवाओं को तैयार करने में किया जाता है, साथ ही जामुन से जेली, मुरब्बा जैसी खाद्य सामग्री तैयार की जाती है।

सबसे खास बात कि जामुन हम भारतीयों की पहचान रही है अतः इस वृक्ष के संरक्षण और संवर्धन में हम सभी को अपना योगदान देना चाहिए।

कभी-कभी इंसानियत भी पंख बन जाती है |

राजस्थान की चिलचिलाती गर्मी में जब एक प्यासा मोर जयपुर की एक गहरी कैनाल में पानी पीने उतरा, तो उसे क्या पता था कि वापस चढ़ पाना इतना मुश्किल होगा। उसने बार-बार उड़ने की कोशिश की, पंख फड़फड़ाए, लेकिन दीवारें इतनी ऊँची थीं कि वो थक कर वहीं बैठ गया।

इसी बीच वहां पहुंचे और 

 

उनकी टीम, जो लगातार वन्य जीवों की रक्षा के लिए काम करते हैं। उन्होंने बिना देर किए मोर की मदद का फैसला किया। बड़ी सावधानी से उन्होंने मोर को पकड़ा, उसके पंखों और शरीर की जांच की — यह सुनिश्चित किया कि उसे कोई चोट न आई हो — और फिर उसे एक सुरक्षित और खुली जगह पर छोड़ दिया।

ये पहली बार नहीं था जब उन्होंने ऐसा किया हो। लखन और उनकी टीम अब तक कई पक्षियों, साँपों और अन्य वन्य प्राणियों को रेस्क्यू कर चुके हैं। वे न सिर्फ उन्हें बचाते हैं, बल्कि पशुओं के लिए मुफ्त चिकित्सा शिविर भी लगाते हैं।

आज जब हम अक्सर खबरों में नकारात्मकता देखते हैं, तो ऐसे लोगों की कहानियाँ दिल को सुकून देती हैं। ये याद दिलाती हैं कि इंसानियत अब भी जिंदा है — और कई बार, वो इंसानियत ही किसी के लिए पंख बन जाती है।

 

पर्यावरण योद्धा जाधव 

वर्ष 1979 में जाधव नाम का यह शख्स अपनी 10 वीं की परीक्षा देने के बाद अपने गाँव में ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़ का पानी उतरने पर इसके बरसाती भीगे रेतीले तट पर घूम रहा था।

तभी इसकी नजर लगभग 100 मृत सांपों के विशाल गुच्छे पर पड़ी। इसके बाद वह आगे बढ़ता गया तो इसने देखा पूरा नदी का किनारा मरे हुए जीव जन्तुओं से अटा पड़ा है एक मरघट का सादृश्य था। 

मृत जीवों के शवों के कारण पैर रखने की जगह नही थी। इस दर्दनाक सामूहिक निर्दोष मौत के दृश्य ने किशोर जाधव के  मन को झकझोर दिया।

हज़ारो की संख्या में निर्जीव जीव जन्तुओ की निस्तेज फटी मुर्दा आँखों ने जाधव को कई रात सोने न दिया। गाँव के ही एक आदमी ने चर्चा के दौरान विचलित जाधव से कहा जब पेड़ पौधे ही नही उग रहे हैं, तो नदी के रेतीले तटों पर जानवरों को बाढ़ से बचने का आश्रय कहाँ मिले? 

जंगल के बिना इन्हें भोजन कैसे मिले?  यह बात जाधव के मन को चीर गई उसने प्रण किया  कि जानवरों को बचाने पेड़ पौधे लगाने होंगे।

50 बीज और 25 बांस के पेड़ लिए 16 साल का जाधव पहुंच गया नदी के रेतीले किनारे पर रोपने। 

ये बात आज से 35 साल पुरानी  है।

 वह दिन का दिन था और आज का दिन। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि इन 35 सालों में जाधव ने 1360 एकड़ भूमि पर एक सघन जंगल बिना किसी सरकारी मदद के खड़ा कर डाला।

क्या हमें भरोसा होगा कि एक अकेले आदमी के लगाये उस जंगल में 

5 बंगाल टाइगर,100 से ज्यादा हिरण, जंगली सुअर, 150 जंगली हाथियों का झुण्ड, गेंडे और अनेक जंगली पशु शांति से घूम रहे हैं, इनमें सांप भी जिनको इस अद्भुत कर्मयौद्धा ने इस जंगल  की शान बनाया।

जंगल का क्षेत्रफल बढ़ाने सुबह 9 बजे से पांच किलोमीटर साईकल से जाकर नदी पार करता और 

 

दूसरी तरफ वृक्षारोपण कर फिर सांझ ढले नदी पार कर साईकल से 

5 किलोमीटर तय कर घर वापिस घर आता।

इनके लगाये इस जंगल में में कटहल, गुलमोहर, अन्नानाश, बांस, साल, सागौन, सीताफल, आम, बरगद, शहतूत, जामुन, आडू और कई औषधिय पौधे हैं। 

 आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इस असम्भव को सत्य कर्म को कर दिखाने वाला यह  साधक  पांच साल पहले तक देश में अनजान था। 

यह कर्मयौद्धा अपनी धुन में अकेला आसाम के जंगल में साइकिल पर पौधो से भरा एक थैला लिए अपने बनाए जंगल में अकेला अपनी धून में  काम कर रहा था। सबसे पहले वर्ष 2010 में देश की नजर में तब आया जब वाइल्ड फोटोग्राफर

 “जीतू कलिता” ने इन पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई “The Molai Forest” 

यह फिल्म देश के नामी विश्वविद्यालयों में दिखाई गयी। दूसरी फिल्म आरती श्रीवास्तव की “Foresting Life” जिसमें जाधव की जिन्दगी के अनछुए पहलुओं और परेशानियों को दिखाया। 

तीसरी फिल्म “Forest Man” जो विदेशी फिल्म महोत्सव में भी काफी सराही गई।

एक अकेले व्यक्ति ने वन विभाग की मदद के बिना, किसी सरकारी आर्थिक सहायता के बगैर  पर्यावरण की रक्षा हेतू ये किया।

जो इतने पिछड़े इलाके था से कि उसके पास पहचान पत्र के रूप में “राशन कार्ड” तक नहीं था, उसने हज़ारों एकड़ में फैला पूरा जंगल खड़ा कर दिया। 

जानने वालों ने उसके इस काम पर उसका सम्मान करते हुए इस जंगल कि नाम उनके नाम पर रखा।

आसाम के इस जंगल को 

“मिशिंग जंगल” कहा जाता हैं ।

(जाधव आसाम की मिशिंग जनजाति से हैं)। जीवन यापन करने के लिए उसने गाय पाल रखी हैं। शेरों द्वारा आजीविका के साधन उनके पालतू पशुओं को खा जाने के बाद भी जंगली जानवरों के प्रति इनकी करुणा कम न हुई। उसका मानना और कहना है कि शेरों ने मेरा नुकसान किया क्योंकि वो अपनी भूख मिटाने के लिए खेती करना नहीं जानते।आप जंगल नष्ट करोगे वो आपको नष्ट करेंगे। एक साल पहले महामहिम “राष्ट्रपति” द्वारा देश के चतुर्थ सर्वोच्च नागरिक सम्मान “पद्मश्री” से अलंकृत होने वाले जाधव आज भी आसाम में बांस के बने एक कमरे के छोटे से कच्चे झोपड़े में रहते हैं और अपनी पुरानी में दिनचर्या लीन हैं। तमाम सरकारी प्रयासों, वृक्षारोपण के नाम पर लाखो रुपये के पौधों की खरीदी करके भी ये पर्यावरण, वन-विभाग वो मुकाम हासिल न कर पाये जो एक अकेले की इच्छाशक्ति ने कर दिखाया। साईकिल पर जंगली पगडंडियों में पौधों से भरे झोले और कुदाल के साथ हरी-भरी प्रकृति की अनवरत साधना में ये निस्वार्थ पुजारी बन अपनी साधना में लीन है।

तो कहा जा सकता है कि कभी कभी “अकेला चणा  भाड़ फोड़  ही नहीं सकता चकनाचूर भी कर सकता है।”हजारो बार नतमस्तक।साभार।

 

जिजीविषा 

नोरिन शर्मा 

 

शहर की चहल पहल के बीच

बेबस मौन 

दर्शक सा

खोजता है 

धड़कन…!!!

अपनों के आधे अधूरे से स्पर्श

जो

चुप्पी के आग़ोश में

सिसकते

बूढ़े हाथों को थामने

फिसलते जाते हैं 

न जाने कौन से सुख की 

अबूझी प्यास में…!

खामोश सन्नाटा

हसरतों को लीलता

देख रहा था

बेदम टखनों की ललक को

जो दौड़ने की आस में

हांफते कंकाल से जिस्म के

हर ख़्वाब को 

फिर से सहेजने जी आस में

जीभर जीने की

नाकाम कोशिश कर रहा था।

आज कह दो 

कह दो

उस

खालीपन की गोद में

सहमे सन्नाटे से….

साँसों की सरगम

थमने तक

अभी

इंतज़ार करे

अभी

और इंतज़ार करे।।।

 

एक मरता समाज

गुरुग्राम में जिम से लौट रहे एक इंजीनियर की स्ट्रीट लाइट के खंभे से करंट लगने से मौत हो गई। कल गुजरात में एक पुल अचानक बीच में टूट जाने से 13 लोग मारे गए। मरने वालों में एक दो साल का बच्चा और उसकी बहन भी शामिल थीं। कल ही नोएडा में पार्क में पानी से भरे गड्ढे में गिरने से एक बच्चे की मौत हो गई।

कुछ देर पहले एक वीडियो सामने आया, जिसमें एक ग़रीब आदमी का मोबाइल पानी से लबालब भरी सड़क में गिर जाता है। वह इधर-उधर हाथ मारता हुआ मोबाइल ढूंढ़ रहा है। जब मोबाइल नहीं मिलता, तो वह वहीं सड़क के किनारे बैठकर रोने लगता है। शायद उसने बड़ी मुश्किल से आठ-दस हज़ार का ये मोबाइल ख़रीदा होगा और ये सोचकर उसको रोना आ गया होगा कि वो फिर से इतने पैसे कहां से लाएगा!

एक और वीडियो में, एक चार साल का बच्चा जैसे ही अपने घर के दरवाज़े से बाहर निकलता है, तीन-चार कुत्ते उस पर हमला कर देते हैं। बच्चा वहीं गिर जाता है। उसके बाद क्या हुआ, ये देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई।

कुछ दिन पहले एक ख़बर पढ़ी थी कि एक मज़दूर थक-हारकर सड़क किनारे सो रहा था। तभी कुछ लोग वहां कचरे से भरी ट्रॉली खाली कर देते हैं। वहीं सोया मज़दूर नींद में ही मारा जाता है। दुनिया में इससे बुरी मौत और क्या होगी? एक तो इंसान अपनी नियति से ग़रीब पैदा हो। फिर जैसे-तैसे मज़दूरी करके अपना पेट भरे। मज़दूरी करके जब थक जाए, तो सड़क किनारे ही सो जाए। और वह नींद में ही कोई उस पर कचरे की ट्रॉली उलट दे और वह वहीं मारा जाए! क्या इससे ज़्यादा गरिमाहीन मौत कोई हो सकती है? न ज़िंदगी में सम्मान मिला, न मौत में।

ये ज़्यादातर ख़बरें सिर्फ एक-आध दिन की हैं। ये सारी घटनाएं हिला देने वाली हैं। इनमें से हर एक पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। आख़िर किसी भी देश में इंसानी जान इतनी सस्ती कैसे हो सकती है? मगर यहां ऐसी किसी ख़बर पर चर्चा नहीं होती। पता नहीं क्यों, हमने इसे अपनी नियति मान लिया है।

पूरे देश में ‘सिस्टम’ नाम की कोई चीज़ नहीं बची है। कहीं किसी की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। इसीलिए, मौक़ा मिलते ही लोग पहली फ़ुर्सत में देश से निकल जाते हैं।

किसी भी राजनीतिक पार्टी में न तो कोई राष्ट्रबोध है, न कोई संवेदनशीलता। टीवी पर दिनभर ऐसे घटिया विषयों पर चर्चाएं होती हैं, जिनका देश से कोई लेना-देना नहीं होता। दिनभर राजनीतिक पार्टियां खुद को मसीहा बताते हुए एक-दूसरे को गालियाँ देती हैं। समस्या कोई एक राजनीतिक पार्टी नहीं है। समस्या पूरी की पूरी राजनीति है, जिसमें यह बोध ही नहीं है कि दुनिया कहां की कहां चली गई और हम अब भी हर मामले में पाकिस्तान से अपनी तुलना कर खुश होते रहते हैं। हर वक़्त आंकड़ों की बाज़ीगरी करके अपना दिन बहलाते रहते हैं—”हम इतने ट्रिलियन डॉलर की इकॉनॉमी हो 

 

गए”, “हमने उसकी बोलती बंद कर दी।”

अरे भाई, हमारी हवा सांस लेने लायक नहीं है। दूध, पनीर, फल-सब्ज़ी—हर चीज़ मिलावटी है। ज़रा-सी बारिश में पूरा सिस्टम जाम हो जाता है। सरकारी स्कूल इस लायक नहीं कि कोई अपने बच्चे को वहां पढ़ा सके। सरकारी अस्पताल इस योग्य नहीं कि कोई अपना वहां इलाज करा सके। पुलिस से लेकर अदालतों तक सब आकंठ भ्रष्ट हैं। 

चीन से लेकर अमेरिका तक, सारी दुनिया हम पर चढ़ने के लिए तैयार बैठी है और हम एक-दूसरे को इसलिए पीट रहे हैं क्योंकि उसे मराठी नहीं आती। पीटे कोई, पिटे कोई—लेकिन ज़लील पूरा देश हो रहा है। और ज़लालत की कोई भाषा नहीं होती—वह बस हर जगह दिखती है। और उसे पढ़ने के लिए किसी subtitle की ज़रूरत नहीं होती। ये इस देश के माथे पर लिखा है।r

सर्पंच  की बेटी और होटल का दरवाज़ा

बिहार के एक छोटे से गांव गंगापुर में रामप्रसाद चौधरी सर्पंच था। ईमानदार, सीधा-सच्चा और गांव की भलाई में दिन-रात लगा रहने वाला इंसान। उसकी एक ही संतान थी — रूपा। बचपन से ही रूपा तेज, सुंदर और होशियार थी। रामप्रसाद का सपना था कि उसकी बेटी पढ़-लिखकर अफसर बने, गांव का नाम रोशन करे।

गांव की कच्ची गलियों से निकलकर रूपा को शहर भेजा गया — इंटर में एडमिशन दिलवाया, होस्टल में जगह दिलवाई और जरूरत की हर चीज़ मुहैया करवाई। कई लोगों ने कहा — “सर्पंच जी, लड़की है, ज़माना अच्छा नहीं है।”

लेकिन रामप्रसाद ने जवाब दिया —

“बेटियां कमजोर नहीं होतीं, बस उन्हें भरोसा चाहिए, और मैंने उसे वो दिया है।”

हर महीने पैसे भेजना, कॉल पर हालचाल लेना, रिजल्ट की चिंता करना — सब कुछ करते हुए वो बस इस उम्मीद में जी रहा था कि एक दिन उसकी बेटी शान से बोलेगी — “मैं सर्पंच की नहीं, खुद की पहचान हूं।”

लेकिन किस्मत ने ऐसा तमाचा मारा कि उस भरोसे की नींव ही हिल गई।

एक दिन रामप्रसाद को गांव का ही एक लड़का संदीप मिला, जो उसी शहर में नौकरी करता था। वो थोड़ा झिझकते हुए बोला —

“चाचा, बुरा मत मानिएगा… कल मैंने रूपा दीदी को एक लड़के के साथ  होटल में जाते देखा। बहुत पास से देखा… शक की कोई गुंजाइश नहीं थी।”

सुनते ही रामप्रसाद के पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक गई।

उसने सोचा — “नहीं, मेरी बेटी ऐसा नहीं कर सकती… जिसने इतने सपने देखे, जो मेरी इज्ज़त है, वो भला कैसे…”

लेकिन संदेह की आग ने उसे चैन से बैठने नहीं दिया। अगली सुबह वो बिना कुछ कहे शहर चला गया। वहां जाकर बेटी के कॉलेज के बाहर खड़ा हुआ — और फिर देखा…

रूपा एक लड़के के साथ हँसते हुए आ रही थी, और फिर दोनों एक टैक्सी में बैठकर  होटल की ओर चले गए।

रामप्रसाद ने खुद से लड़ते हुए, कांपते कदमों से होटल तक पीछा किया… और जब रिसेप्शन पर रजिस्टर में उसकी बेटी का नाम देखा —

“रूपा चौधरी – साथ में: रोहित वर्मा (बॉयफ्रेंड)”

तो उसका सीना चीर सा गया।

वो कमरे तक नहीं गया… वो चिल्लाया भी नहीं… वो बस चुपचाप वहां से निकल पड़ा। स्टेशन पर बैठकर उसने सिर्फ एक फोटो देखी — अपनी बेटी की बचपन की तस्वीर, जिसमें उसने उसकी ऊंगली पकड़ रखी थी और मुस्कुरा रही थी।

उसकी आंखों से आंसू बहते रहे, और दिल सिर्फ़ एक सवाल पूछता रहा —

“क्या मैंने उसे आज़ादी दी थी या बर्बादी का रास्ता?”

गांव लौटकर रामप्रसाद ने कुछ नहीं कहा। लोगों ने पूछा —

“कैसी रही शहर की यात्रा?”

वो सिर्फ़ मुस्कुरा कर बोला —

“बेटी बड़ी हो गई है… अब खुद के फैसले लेती है।”

लेकिन उस मुस्कान के पीछे, एक बाप का टूटा हुआ सपना छिपा था, एक भरोसे की लाश पड़ी थी।

अगर इस कहानी ने आपकी आंखों को नम कर दिया हो, तो इसे जरूर साझा करें… ताकि हर पिता और हर बेटी समझ सकें कि आज़ादी ज़िम्मेदारी के साथ आती है, और एक कोई  दरवाज़ा कभी किसी पिता की आंखों का सपना नहीं होना चाहिए। 

बस अब ओर क्या चाहिए

सुबह पांच बजे अलार्म बजा, सुभी आज बेमन से उठी| अंग-अंग दर्द कर रहा था, दो मिनट और लेट जाती हूं| उसमें ही दस मिनट निकल गये| आखिर सवा पांच पर तो उठना ही पड़ा

अलसाई आंखों को खोला और बाथरूम में जाकर मुंह धो आई। फिर फटाफट किचन में गई, एक बर्नर पर पानी चढ़ाया, सास को गर्म पानी दिया फिर सब्जीयों को फ्रिज से निकाला।

क्या बनाऊं, कल इसके लिए सोच नहीं पाई थी| कल अचानक से पास में रह रहा बुआ सास का परिवार आ गया, डिनर भी यहीं था| रात को वो देर तक बैठे फिर उनके जाने‌ में देर हो गई फिर सोने में और सुबह आंख खुलने में।

भिंडी बना लेती हूं। ये सोचते ही लग गई भिंडी काटने में, सास आराम से गर्म पानी घूंट घूंट कर पी रही थी। मन में तो आया कह दे, मांजी आप सब्जी काट दें तो मेरी मदद हो जायेगी| पर हिम्मत नहीं हुई, रोज सोचती है पर कह नहीं पाती।

शादी को दस साल होने को जा रहे हैं, पर आज तक कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। सुभी के आते ही सास ने किचन से सन्यास ले लिया।

फटाफट सुभी ने भिंडी काटकर छौंक दी, इतने में बच्चों को उठाने का वक्त हो गया। एक तरफ सब्जी, दूसरे बर्नर पर चाय, तीसरे पर दूध चढ़ाकर बच्चों को उठाने चल दी।

छोटे बच्चों को उठाओ, सहलाओ, लाड़ लड़ाओ, गोदी में बिठाकर पुचकारो तब जाकर उठते हैं| उसमें भी दस से पन्द्रह मिनट लग जाते हैं।

“मम्मी आज दूध नहीं पीना, आप पिला दो तो पी लूंगी।”

मन तो करता है अपने बच्चों को अपने हाथों से खिलाऊं, पर उसी वक्त गैस पर रखी सब्जी हिलानी थी, नहीं तो जल जाती। “छोटी अपने आप पियो मुझे और भी काम हैं।” सुभी ने यूं ही बनावटी गुस्से में कहा।

कभी कभी लगता है मैं अपने बच्चों को टाइम नहीं दे पाती, अब क्या करूं?

शिखा ने फटाफट परांठे सेंके और दोनों बच्चों को तैयार करके टिफिन पैक कर दिया| “अरे! मम्मी पानी की बोतल?”

“हां वो तो यही रह गई।” हड़बड़ी में सुभी ने वो भी भरी। दो मिनट भी देर हो जाये तो बस रूकती नहीं है, फिर बच्चो को स्कूटी से इतना दूर छोड़ने जाओं।

“सुभी चाय” ससुर जी अखबार का पन्ना पलटते हुए बोले। जैसे तैसे चाय दी और बैग लेकर दौड़ी।

बच्चों को बस में बैठाकर बोझिल कदमों से घर आते हुए पार्क में टहल रही औरतों को देखकर उसका भी मन हुआ कि वो भी सुबह की ताज़ा हवा में टहले पर अभी उसे नैतिक का टिफिन पैक करना था, नाश्ता बनाना था। घर आकर उसने रोज की तरह सास, ससुर, पति के लिए नाश्ता बनाया, फिर सारे बिस्तर समेटे, यहां-वहां पड़े कपड़े उठाये, वाशिंग मशीन में कपड़े लगाये| किचन के दूध, दही के बर्तनों को खाली किया।

उसने तसल्ली से बैठकर चाय भी नहीं पी कि तभी खबर मिली कि आज मेड नहीं आयेगी, उसके पांव में चोट लगी है।

घर का काम निपटाने में वक्त लग गया, लंच बनाया, लंच का काम निपटा था कि बच्चों को लाने का वक्त हो गया, छोटी एक बजे स्कूल से आती है। उसे लेकर आई, उसका खाना पीना किया, कपड़े बदले, बड़ी मुश्किल से उसे सुलाया था कि तभी बड़े बेटे को लाने का टाइम हो गया। सुभी का मन कर रहा था कि वो भी एक झपकी ले ले, पर फिर स्कूटी स्टार्ट की और बेटे को तीन बजे बस स्टॉप से लेकर आई। दोनों बच्चों के आने का अलग वक्त है, दो बार चक्कर हो जाते हैं।

ससुर जी टीवी देख रहे थे, वो भी ला सकते थे, पर ये भी सुभी का काम था।

सोनू की स्कूल की बातें सुनने में लीन थी, उसे खाना दिया था कि छोटी शोर शराबे से उठ गई। फिर उसे बहलाने में लग गई। सुभी, चार बज गए, चाय का टाइम हो गया, बना दो। सुभी की सास पलंग पर करवट बदलते हुए बोली।

सुभी तेज कदमों से किचन में दौड़ी और चाय चढ़ा दी। अपनी भी चाय का कप लेकर कमरे में आई। 

 

दोनों बच्चों की डायरी चैक की, उन्हें होमवर्क करवाया, छोटी का डिक्टेशन था, उसे स्पेलिंग याद करवाई, सोनू के कल मैथ्स का टेस्ट था, उसे समझाया। इसी में छह बज गये, सास-ससुर जल्दी खाना खा लेते हैं, एक बर्नर पर सब्जी चढ़ाई तो दूसरे पर बच्चों के लिए दूध। सीटी बजते ही आटा मला, बच्चों को दूध देकर तैयार किया और दोनों को ड्राइंग क्लास छोड़कर आई।

आकर सास-ससुर को खाना खिलाया फिर बच्चो को लाने का वक्त हो गया। शाम को पार्क में चहलकदमी करती औरतों को देखकर उसका भी मन करता वो भी कुछ देर यहां रूके, सबसे बात करे।

लेकिन नैतिक के ऑफिस से आने का वक्त हो जाता है, जाते ही चाय चढ़ा दी| तभी नैतिक के चिल्लाने की आवाज आई, सुभी मेरा टॉवल कहां है? कितनी बार बोला है मुझे बाथरूम में चाहिए, मुंह हाथ धोने के बाद चाहिए होता है। वो मैंने धो दिया था, बाहर सूख रहा है अभी लाती हूं| सुभी जैसे ही टॉवल लेकर आई।

नैतिक के मम्मी-पापा कह रहे थे कि “पता नहीं सारा दिन करती क्या है? घर में ही तो रहती है” ये सुनकर सुभी कड़वे घूंट पीकर रह गई।

सदा से औरतों के घरेलू कामों को कम आंका जाता रहा है| वो कितना भी कर लें, सुबह से रात तक लगी रहती हैं ,घर के लिए अपनी नींद, चैन, सेहत, करियर तक त्याग देती हैं, फिर भी यही सुनने को मिलता है कि घर पर ही तो रहती है , कुछ नहीं करती।

ये उसके रोज के दिन में सी एक था लेकिन आज कुछ अलग हुआ सुभी का दिल आहत हो गया था क्योकि नैतिक ने भी सहमति के साथ सुना था सब कुछ देखते जानते हुए भी उसके लिए एक शब्द भी नही बोला एक औरत को पति से ही उम्मीद होती है, जब वो भी टूट जाय तो अस्तित्व ही नही रहता खुद का,येसा लगता हैं।

सुभी दूसरे दिन उठी यथावत काम किया , उसके बाद अपने और बेटी के कपड़े पैक किये , नैतिक को फोन किया।

“मै कुछ दिन के लिए मायके जा रही हु, माँ ने बुलाया है 1 साल हो रहा है उनको देखा नही है।”

“अरे ऐसे कैसे अचानक “

और माँ को ही देखना है तो में दिखा लाऊंगा रुकने की क्या जरूरत है।

मेरी भी तबियत ठीक नही है , आराम कर लूंगी कुछ दिन वहां सुभी ने कहा

अरे वो तो यहां भी कर सकती हो और करती ही हो नैतिक ने खीजते हुए कहा,

हां तो आराम ही तो करती हु यहां की जगह वहां कर लूँगी।

अब तो नैतिक आगबबूला हो गया ठीक है जाओ बच्चों को भी ले जाना ,हो गई उनकी तो पढ़ाईं ।

गुड़िया को ले जा रही हु स्कूल में बात कर ली है,सोनू के स्पोर्ट्स चल रहे है तो यहीं रहेगा। कहकर फोन काट दिया।

 

जाते समय सास ससुर के पैर छुए और निकल गई, उन्होंने पूछना भी जरूरी नही समझा बेटे से बात हो गई थी सायद तो गुस्से में देख रहे थे, पिछले 10 सालों में कभी कोई कसर नही छोड़ी थी घर के काम में सभी की सेवा खुशामद करने में,लेकिन कभी प्यार के 2 बोल सुनने नही मिले, कभी पलट के नही बोला ना आज हिम्मत थी सो चुपचाप चली गई।

इधर फिर सुबह हुई , नैतिक लेट उठा बेटे का भी स्कूल छूट गया , किचिन में आया तो माँ ने चाय बड़ी मुश्किल से बनाई , नास्ता बाहर किया और घर में भी सबको दे गया।

जैसे तैसे सुबह का निपटा तो दोपहर के खाने की चिंता सास को सताने लगी कहां तो मुँह सी निकलते ही हर चीज हाजिर हो जाती थी और अब दाल रोटी भी नही बन पा रही । दाल चावल बना लिए , वो ही सबने खाय ।

साम को चाय फिर डिनर सो हालात खराब हो गई सासु माँ की

उस पर कपड़े साफ सफाई सी लेके हजारों काम घर में दिखने लगे उसी घर में जिसमे कोई काम नही था सुभी के लिए।

दूसरे दिन ससुर को छोड़ने जाना था बेटे को स्कूल और फिर लेने जो उनको पहाड़ सा काम लग रहा था ,

बात बात पर सुभी का नाम चिल्लाते सभी फिर शांत हो जाते।

2 दिन बीत चुके थे तीसरे दिन नैतिक शाम को लोटा तो मम्मी पापा के ही पास बैठ गया,

पापा ने कहा “क्या हुआ बेटा “

कोई काम ठीक से नही हो रहा है, ना टाइम सी उठ पा रहा ना सो पा रहा ना ही पेट भर खा पा रहा हु।

ऑफिस का काम भी पेंडिंग है।

उधर बेटे के स्कूल सी नोटिस आया है, होमवर्क नही हुआ है।

हमारा भी यहीं हाल है “ना जाने बहु कब आएगी”

सुभी के 2 दिन ना रहने से हमारी ये हालत हो गई है, ओर हम कहते है “वो करती क्या हैं ” नैतिक की आँखे भर आई थी हां बेटा बहु ने घर ऐसे संभाला था जैसे लगता था अपने आप हि सब हो रहा है , काम का बोझ उसी को समझ आता है जो ढोता है , करवाने बाले को जब समझ आता है जब वो करता है। हम सबने अपनी जिम्मेदारी उसके उपर हि छोड़ दी इसलिए काम की आदत हि छूट गई वो हमारे हिस्से का भी काम कर रही थी बिना किसी शिकायत के . जा बेटा उसे ले आ।

दूसरे दिन नैतिक सुभी को ले आया वो भी आ गई बिना कुछ कहे क्योकि घर की हालत क्या होगी उसको अंदाजा था। और नैतिक का लेने जाना भी गवाही दे ही रहा था।

दूसरे दिन सुभी उठी तो नैतिक उठ चुका था बच्चों को को तैयार कर रहा था, सुभी हड़बड़ा सी गई कैसे आँख नही खुली तुरंत बाथरूम में गई, आकर सीधा किचिन में जाने लगी तो नैतिक ने बोला।

तुम चाय बना लाओ हम साथ में पियेंगे।

 

वो किचिन में गई तो सासु माँ पहले से थी बोली चाय ले जाओ बहु मेने बना दी है, हम लोगों ने पी ली है नास्ते के लिए सब्जी काट दी है आकर बना लेना।

आज पहली बार सुकून से नैतिक के साथ चाय पी थी सुभी ने फिर किचिन में आके नास्ता बनाया बच्चों को रखा और जैसे ही स्कूटी की चाभी उठाई , ससुर बोले लाओ बहु में छोड़ आऊ बच्चों को थोड़ी हवा भी लग जायगी सुबह की इतने सरलता से सरा काम हो गया था। सुभी आकर शांत बैठ गई। सासु माँ आई नैतिक भी सासु माँ बोली बहु हमे समझ आ गया है, वो जो तु बताना चाहती थी अब से हम सब तुम्हारे साथ काम में हाथ बटायेंगे, हम भूल गये थे की एक बहु के आने से हमारी जिम्मेदारियाँ बट जाति है , खत्म नही होती तू नौकरानी नही बहुरानी है।

नैतिक ने कहा कई बार हमने बोला हे तुमको ” तुम करती क्या हो”

आज समझ आ गया है, ये घर सूचारु रूप से सिर्फ तुम्हारी बदौलत ही चलता है।

तभी ससुर जी आ गये बोले बहु आज हम सब अपनी जिम्मेदारी समझेंगे जो बन सकेगा तुम्हारी हेल्प करेंगे। नैतिक ने सुभी से पूछा बताओ तुम्हे क्या चाहिए। सुभी ने कहा “बस अब और क्या चाहिए “

सुभी रो रही थी सबकी आँखों में आँसू थे लेकिन ये खुशी के आँसू थे घर में सब समय रहते सब समझ गये गए लेकिन बहुदा ऐसा नहीं होता लेकिन उम्मीद करती हु, जैसे इस कहानी में घर के सभी सदस्य एक गृहिणी की अहमियत समझ गए इस तरह अगर हर घर में समझ जाए तो एक औरत भी अपने जीवन को शांति से इज्जत से जी सकें, अपने हाउसवाइफ होने पर खुश हो सकें।

चिड़ियाँ चुग गयी खेत

45 वर्षीय दीवान की नौकरी छुट गई थी,बॉस ने जलील करके ऑफिस से निकाल दिया था।

पिछले बारह महीनों में तीसरी बार उसे नौकरी से निकाला गया था रात हो चुकी थी। वह बाजार मे पेड़ के नीचे रखी एक बेंच पर बैठा था।

घर जाने का उसका जरा भी मन नही था। बेंच पर बैठा वह अपने दोस्तों को बार बार फोन मिला रहा था। उनसे रिक्वेस्ट कर रहा था कि कही जगह खाली हो तो बता दे उसे तुरंत नौकरी की जरूरत है।

दीवान कामचोर नही था। मगर बढ़ते कम्प्युटर के इस्तेमाल ने उसे कमजोर बना दिया था।

हालांकि उसने कम्प्युटर चलाना भी सीख लिया था मगर नये लड़कों जितना कम्प्युटर उसे नही चलाना आता था। इस कारण उससे गलतियाँ हो जाती थी।

रात के दस बजे वह हताश और निराश सा घर पहुंचा। अंदर प्रवेश करते ही बीवी चिल्लाई “कहाँ थे इतनी रात तक? किस औरत के साथ गुलछर्रे उड़ा रहे थे? तुमको शर्म भी नही आती क्या? घर मे जवान बेटा और बेटी बैठे हैं। उनकी शादी की उम्र निकलती जा रही है। कब होश आयेगा तुम्हे? अगर इनकी जिम्मेदारी नही निभानी थी तो पैदा ही क्यों किया था? “

दीवान कुछ भी नही बोला। पत्नी की रोज रोज की चिक चिक का उसने जवाब देना छोड़ दिया था। 

 

अभी वह बाहर रखी टंकी से लगे नल से हाथ मुँह धो रहा था कि बेटी दौड़ते उसके पास आई आते ही बोली ” पापा आप मेरे लिए मोबाइल लाए क्या? दीवान ने बेटी को भी कोई जवाब नही दिया। “

बेटी फिर से बोली ” पापा आप जवाब क्यों नही देते ? सुबह तो आप पक्का प्रोमिस करके गए थे कि रात को लौटते समय मेरे लिए मोबाइल लेकर ही आएंगे।” दीवान चुप ही रहा।

वह जवाब देता तो क्या देता? बेटी के मोबाइल के लिए एडवांस मांगने पर ही बॉस ने उसे नौकरी से निकाल दिया था।

बेटी अपने हाथ मे पकड़े पुराने फोन को दिखाते हुए बोली “आपको क्या लगता है पापा? मै झूठ बोल रही हूँ? देखो ये मोबाइल सचमुच खराब हो गया है। ऑन करते ही हैंग हो जाता है।”

दीवान चुप था। वह अपनी नौकरी जाने की खबर भी किसी को नही बताना चाहता था। क्योंकि वह जानता था अगर ये बात बताई तो बेटा, बेटी और पत्नी सभी उसके पीछे पड़ जाएंगे। उसे कोसने लगेंगें कि वह ढंग से काम नही करता । इसीलिए हर चौथे महीने नौकरी से निकाल दिया जाता है।

हाथ मुँह धोने के बाद वह सीधा अपने कमरे मे गया। जहाँ बैड पर पसरी पत्नी मोबाइल चला रही थी।

जिसकी आँखे मोबाइल स्क्रीन पर थी और कान घर मे हो रही बातों को सुन रहे थे। ज्यों ही दीवान ने कमरे मे कदम रखा वह चिल्लाई “जवाब क्यों नही देते?

बहरे हो गए क्या? बेटी को मोबाइल क्यों नही लाकर दिया? “

वह दबी दबी आवाज मे बोला ” पैसे हाथ मे नही आये। जब पैसे मिलेंगे तब ला दूंगा? पत्नी बोली ” हाथ मे नही थे तो किसी से उधार ले लेते? तुम जानते हो ना वह कम्पिटिशन की तैयारी कर रही है। बिना मोबाइल के कैसे पढेगी? ” ” दीवान के पास जवाब देने को बहुत कुछ था। मगर अब उसने चुप रहना सीख लिया था। वह रसोई मे चला आया। खुद ही थाली निकाली। फिर खाना खाने लगा।

दिवान की बेटी 22 साल की हो चुकी थी। बेटा 24 साल का हो चुका था। दोनों पढाई मे कम और सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताते थे। इस कारण कम्पिटिशन मे निकलने का सवाल ही पैदा नही होता था। अभी दीवान ने खाना खत्म नही किया था कि उसका बेटा घर से बाहर से गाना गुनगुनाता हुआ सीधा रसोई मे आया। मगर दीवान को वहाँ खाना खाते देखकर अपने कमरे मे चला गया। दीवान ने नोटिस किया कि उसके कदम बहक रहे थे। जरूर यार दोस्तों के साथ बैठ कर पीकर आया था। शुरू शुरू मे जब बेटा पीकर घर आता था। तब दीवान उसे बहुत डांटा करता था। मगर एक दिन बेटा सामने बोल गया। दीवान को ज्यादा गुस्सा आ गया था। इस कारण उसने बेटे को थप्पड़ लगाना चाहा। तब बेटे ने उसका हाथ पकड़ लिया था और गुस्से मे उसे आँख दिखाने लगा था। उस दिन के बाद दीवान ने बेटे से कुछ भी कहना छोड़ दिया था। वह खाना खाकर वापस कमरे मे आया तब पत्नी की किच पिच फिर से शुरू हो गई थी। मगर वह चुपचाप सो गया। सुबह जलदी उठकर वह काम की तलाश मे निकल गया।

वह जानता था बिना काम किये सबकुछ बिखर जाएगा। घर खर्च चलाना था। बच्चों की पढाई की जरूरते पूरी करनी थी। उनकी शादी भी करनी थी। शाम तक वह भूखा प्यासा दफ्तरों के चक्कर 

 

लगाता रहा। खाना न खाने से शरीर की शुगर लो हो गई थी। शरीर मे सुन्न सी आई हुई थी। वह सोचते हुए चल रहा था। पता नही कब चलते चलते वह फुटपाथ से मुख्य सड़क पर आ गया। तेज दौड़ता हुआ ट्रोला उसके ऊपर से निकल गया। दीवान को तड़पने का मौका भी नही मिला। सड़क पर ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए। दीवान के बेटे- बेटी और पत्नी ने रोते बिलखते हुए उसका अंतिम संस्कार किया।

उसके जाने के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था। जिन लोगों से उधार पैसे ले रखे थे वे रोज घर का चक्कर लगाने लगे थे। रिश्तेदारों ने फोन उठाने बन्द कर दिये थे। घर का वाईफाई का कनेक्शन कट चुका था। अचानक से घर मे नेट चलना बंद हो गया था। बेटी और बेटा अब खाने मे कमी नही निकालते थे। जो भी मिल जाता खाकर पानी पी लेते थे। बेटे की आजादी खत्म हो गई थी।

अब वह एक कपड़े की दुकान मे 7 हजार रुपये महीने की नौकरी करने लगा था। बेटी भी एक प्राइवेट स्कूल मे 5000 हजार रुपये महीने की नौकरी करने लगी। पत्नी के लिए सबकुछ बदल चुका था। माथे का सिंदूर मिटते ही उससे सजने संवरने का अधिकार छीन लिया गया था। अब वह घंटो शीशे के सामने खड़ी नही होती थी। पति को देखते ही किच किच शुरू कर दिया करती थी। अब उसकी आवाज सुनने को तरस गई थी। पति जब जिंदा था वह निश्चिंत होकर सोया करती थी। मगर उसके गुजरने के बाद एक छोटी सी आवाज भी उसे डरा देती थी। रात भर नींद के लिए तरसती रहती थी।

उसके गुजरने के बाद पूरे परिवार को पता चल गया था कि वो उनके लिए बहुत कुछ था। वो सुख चैन था। वो नींद था। वो रोटी था, कपड़ा था, मकान था। वो पूरा बाजार था। वो ख्वाहिशों का आधार था मगर उसकी वैल्यू उसके जीते जी उन्हे पता नही थी।

अब घर में पैसा तो था पर सूकून नहीं। रात को सब खाना खाने के बाद सब अपने बिस्तर पर लेटे लेटे सोचते काश उन्होंने अपने पिता की भावनाएं समझी होती, उनकी इज्जत की होती पर अब पर अब पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गयी खेत।

विधवा औरत

विधवा औरत को हुआ कुंवारे लड़के से प्यार… जब रिश्ता सम्भोग तक पहुंचा तो हो गया विवाद 

ये कहानी है कमला की — उम्र 34 साल, विधवा, सुंदर, शांत स्वभाव की।

उसका पति रामू ट्रक एक्सीडेंट में चल बसा था। पीछे छूटे दो छोटे बच्चे और टूटा हुआ घर।

कमला ने रिश्तेदारों से मदद मांगी, समाज से सहारा मांगा… लेकिन हर दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद होता चला गया। काम करने के लिए वो गांव के ही स्कूल में सफाई का काम करने लगी।

वहीं उसकी मुलाकात हुई आकाश से — 24 साल का युवक, बेरोज़गार, लेकिन समझदार और संवेदनशील। वो रोज़ काम के बाद कमला से बातें करता, उसकी मदद करता, और उसकी आंखों में छुपी तकलीफ को पढ़ लेता। धीरे-धीरे कमला को वो सुकून आकाश की बातों में मिला, जो उसे बरसों 

 

से किसी ने नहीं दिया था। वो सिर्फ़ हंसता नहीं था — उसके आंसुओं के पीछे की खामोशी को भी समझता था। और फिर… एक दिन, अकेलेपन की उस लंबी रात में जब कमला टूट गई,तो आकाश ने उसके कांपते हाथों को थामा…और उनके बीच एक गहरा, आत्मीय रिश्ता बन गया — जिसमें सिर्फ़ संभोग नहीं, सहारा, अपनापन और छांव भी थी। वो रिश्ता छुपा रहा कुछ समय…लेकिन गांव की दीवारों के कान होते हैं। एक दिन किसी ने दोनों को साथ देख लिया, और अगले ही दिन गांव की चौपाल में चर्चा शुरू हो गई: “विधवा होकर जवान लड़कों को फंसा रही है…” “बेशर्म औरत, अब क्या इज्ज़त सिखाएगी बच्चों को…” गांववालों ने उसके घर पत्थर फेंके, पंचायत बुलाई गई। कमला को पंचायत के सामने लाया गया — जहां बैठे थे वही लोग,जो उसके पति की मौत पर चुप रहे थे,जो कभी एक रोटी तक नहीं दे सके उसके बच्चों के लिए।

पंचायत में एक बुज़ुर्ग बोला —”एक विधवा और जवान कुंवारा… ये रिश्ता समाज के खिलाफ़ है!” कमला ने सिर उठाकर पहली बार बोला: “समाज ने मुझे कब अपनाया जो मैं उसके खिलाफ गई?

जब मेरी कोख भूखी थी, तब कोई सामने नहीं आया…अब जब किसी ने मेरा आंसू पोंछा, तो आपको मेरी आंखें जलती लगने लगीं?” सब चुप थे। तभी आकाश खड़ा हुआ और कहा — “मैंने कमला को सिर्फ़ एक औरत नहीं, एक इंसान समझा। उसके शरीर से नहीं, उसकी मजबूरी से रिश्ता बनाया।

अगर ये गुनाह है, तो मैं हर बार यही गुनाह करूंगा।” गांव दो हिस्सों में बंट गया — एक वो जो सिर्फ़ बदन देखते थे, और दूसरे जो दिल की आवाज़ सुन पाए।

कुछ दिन बाद…

कमला ने गांव छोड़ दिया। आज वो शहर में एक स्कूल में काम करती है। आकाश उसके साथ है, उसके दोनों बच्चों को पिता का नाम मिला है। और जब कोई पूछता है — “क्या तुम विधवा हो?”

तो वो मुस्कुराकर कहती है — “नहीं… मैं इंसान हूं — जिसे प्यार मिला, तो जी उठी।”  अगर इस कहानी ने आपकी आंखें नम कर दी हों, तो इसे ज़रूर साझा करें… ताकि समाज समझ सके कि विधवा औरत को प्यार करने का हक है — और प्यार सिर्फ़ जवां दिलों का नहीं, टूटी रूहों का भी होता है। 

 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ 

हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म का ह्रास होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (ईश्वर) स्वयं को प्रकट करता हूँ। मैं साधुओं (सज्जनों) की रक्षा करने, दुष्टों का विनाश करने और धर्म की स्थापना करने के लिए युग-युग में प्रकट होता हूँ। 

 

अगस्त 2025 के महत्वपूर्ण दिवस 

 

1 अगस्त – यॉर्कशायर दिवस

1 अगस्त- विश्व फेफड़े के कैंसर दिवस

1 अगस्त- विश्व व्यापी वेब दिवस

3 अगस्त: राष्ट्रीय मैत्री दिवस

3 अगस्त- राष्ट्रीय तरबूज दिवस

3 अगस्त- लौंग सिंड्रोम जागरूकता दिवस

4 अगस्त- सहायक कुत्ता दिवस

4 अगस्त – अमेरिकी तट रक्षक दिवस

4 अगस्त (अगस्त का पहला रविवार) – फ्रेंडशिप डे

6 अगस्त – हिरोशिमा दिवस 

6 अगस्त: हिरोशिमा दिवस

7 अगस्त – राष्ट्रीय हथकरघा दिवस

7 अगस्त- हरियाली तीज

8 अगस्त: पूर्णिमा

9 अगस्त: रक्षा बंधन

9 अगस्त – भारत छोड़ो आंदोलन दिवस

9 अगस्त – नागासाकी दिवस

9 अगस्त – विश्व के स्वदेशी लोगों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस 

9 अगस्त- राष्ट्रीय पुस्तक प्रेमी दिवस

09 अगस्त- नाग पंचमी

10 अगस्त – विश्व शेर दिवस

10 अगस्त – विश्व जैव ईंधन दिवस

12 अगस्त – अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस

12 अगस्त: विश्व हाथी दिवस

12 अगस्त: अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस

12 अगस्त: अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस

13 अगस्त – अंतर्राष्ट्रीय लेफ्टहैंडर्स दिवस

13 अगस्त – विश्व अंग दान दिवस 

14 अगस्त – यौम-ए-आज़ादी (पाकिस्तान स्वतंत्रता दिवस)

14 अगस्त- मलयालम नव वर्ष

15 अगस्त – राष्ट्रीय शोक दिवस (बांग्लादेश)

15 अगस्त – भारत में स्वतंत्रता दिवस

15 अगस्त: स्वतंत्रता दिवस

15 अगस्त – वर्जिन मैरी की मान्यता का दिन

16 अगस्त – बेनिंगटन युद्ध दिवस

16 अगस्त: जन्माष्टमी, दही हांडी

17 अगस्त: सिंह संक्रांति

17 अगस्त – इंडोनेशियाई स्वतंत्रता दिवस

17 अगस्त- गैबॉन स्वतंत्रता दिवस

17 अगस्त- अफ़गानिस्तान स्वतंत्रता दिवस

19 अगस्त – विश्व फोटोग्राफी दिवस

19 अगस्त – विश्व मानवतावादी दिवस

19 अगस्त – रक्षाबंधन

19 अगस्त- संस्कृत दिवस

19 अगस्त – नारली पूर्णिमा 

19 अगस्त: विश्व फोटोग्राफी दिवस, विश्व मानवतावादी दिवस, राष्ट्रीय विमानन दिवस, अजा एकादशी

20 अगस्त – विश्व मच्छर दिवस

20 अगस्त – सद्भावना दिवस

20 अगस्त – भारतीय अक्षय ऊर्जा दिवस

23 अगस्त – दास व्यापार और उसके उन्मूलन की याद के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस

23 अगस्त – स्टालिनवाद और नाज़ीवाद के पीड़ितों के लिए यूरोपीय स्मरण दिवस

23 अगस्त- इसरो दिवस

26 अगस्त – महिला समानता दिवस

26 अगस्त: अंतर्राष्ट्रीय कुत्ता दिवस

26 अगस्त: राष्ट्रीय कुत्ता दिवस

26 अगस्त- मदर टेरेसा जयंती

27 अगस्त: राष्ट्रीय न्याय दिवस

28 अगस्त: हरतालिका तीज

29 अगस्त – राष्ट्रीय खेल दिवस

30 अगस्त – लघु उद्योग दिवस

31 अगस्त: राधाष्टमी

31 अगस्त – हरि मर्डेका (मलेशिया राष्ट्रीय दिवस)

 

अगस्त मास 2025 का पंचांग 

भारतीय व्रतोत्सव अगस्त-2025

 भारतीय व्रतोत्सव – दि. 1- दुर्गाष्टमी, मेला नयना देवी व चिंतपूर्णी (हि.प्र.),दि. 5- पवित्रा एकादशी व्रत,दि. 6- प्रदोष व्रत,दि. 8- सत्य व्रत,दि. 9-रक्षा बंधन, अमरनाथ यात्रा, ऋषि तर्पण, गायत्री जयंती, हयग्रीव जयंती,दि, 12- कज्जली तीज, गणेश चतुर्थी व्रत, बहुला चौथ,दि. 14- हल छठ, चंद्र छठ,दि. 16- श्री कृष्ण जन्माष्टमी, कालाष्टमी,दि. 17- संक्रांति पुण्य, गोगा नवमी, नन्द महोत,दि. 19- अजा एकादशी व्रत,दि.20- वत्स द्वादशी,प्रदोष व्रत,दि.21-मास,शिवरात्रि,दि.23-शनैश्वरी-कुशोत्पाटिनी-

पिठौरी अमावस्या, दि. 25- वाराह जयंती,दि. 26-हरितालिका तीज, दि. 27- श्री गणेश जन्मोत्सव, कलंक चतुर्थी, चंद्रदर्शन निषेध, सिद्धि विनायक व्रत, दि. 29- सूर्य 6, बलदेव 6, मेला बृज मण्डल,दि. 30- ज्येष्ठा गौरी आवाहन,दि. 30- संतान सप्तमी, मुक्ताभरण 7, दि. 31- दुर्गाष्टमी, राधाष्टमी, भागवत सप्ताह प्रारम्भ, महालक्ष्मी व्रत प्रारम्भ

 

मूल विचार अगस्त -2025

मूल विचार – दि. 4  को 2-11  से दि.06  को 12-59  तक, दि. 13  को 10-32  से दि. 15  को 07-35  तक, दि. 22  को 00–08  से दि. 24  को 00-54 31 को 17-27 से मासांत  तक गण्ड मूल नक्षत्र हैं।

 

ग्रह स्थिति अगस्त -2025 

ग्रह स्थिति – दि. 8 बुधोदय पूर्व,दि. 11 मार्गी बुध,दि. 16 सिंह में सूर्य,दि. 20 कर्क में शुक्र,दि. 30 बुध सिंह में

पंचक विचार अगस्त -2025  

पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा  पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है, दि.10 को 02-11 से दि. 14 को 09-05 बजे तक पंचक हैं।

 अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी – 9312002527,9560518227

 

भद्रा विचार अगस्त -2025 

भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार – भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना,स्नान करना,अस्त्र शस्त्र का प्रयोग,ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना,अग्नि लगाना,किसी वस्तु को काटना,भैस,घोड़ा व ऊंट संबंधी कार्य प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अतिआवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख छोड़कर कर भद्रा पुच्छ में शुभ कार्य कर सकते है

दि. 1 को 4/58 से 18/11 तक, दि. 5 का 0/26 से 13/12 तक, दि. 8 को 14/12 से दि. 9 को 1/48 तक, दि. 11 को 21/37 से दि. 12 को 8/45 तक, दि. 15 को 2/07 से 12/58 तक, दि. 18 को 6/22 से 17/22 उक, दि. 21 को 12/45 से दि. 22 को 0/24 तक, दि. 27 का 2/49 से 15/44 तक, दि. 30 को 22/46 से दि. 31 को 11/54 बजे तक भद्रा है।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी – 9312002527,9560518227

सर्वार्थ सिद्धि योग अगस्त -2025  

दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी  शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु  को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक  है| 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी – 9312002527,9560518227

दिनांक प्रारंभ दिनांक समाप्त
04 05-48 04 09-12
08 14-22 09 14-23
12 11-51 13 05-53
14 05-53 15 07-35
17 04-38 17 05-55
18 05-55 19 02-05
21 05-57 22 00-08
25 02-05 25 05-29

 

चौघड़िया मुहूर्त 

चौघड़िया मुहूर्त देखकर कार्य या यात्रा करना उत्तम होता है। एक तिथि के लिये दिवस और रात्रि के आठ-आठ भाग का एक चौघड़िया निश्चित है। इस प्रकार से 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात मानें तो प्रत्येक में 90 मिनट यानि 1.30 घण्टे का एक चौघड़िया होता है जो सूर्योदय से प्रारंभ होता है|

सुर्य उदय- सुर्य अस्त अगस्त -2025  

 

दिनांक  01  05  10  15 20  25  30
उदय  05-43  05-46  05-48  05-51  05-54  05-56  05-59
अस्त  19-09  19-06  19-02  18-57  18-52  18-47  18-42

 

 राहू काल 

 राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |

संक्रांति विचार

इस मास की संक्रान्ति सिंह भाद्रपद कृष्ण अष्टमी शनिवार दि. 16/17 अगस्त को रात्रि के तीसरे पहर में 25/51 बजे 30 मु. सूती धापी उत्तर गमन ईशान दृष्टि किये अग्नि मण्डल में प्रवेश करेगी। गतवार 4, गतनक्षत्र 5, वार नाम राक्षसी, चाण्डाल सुखी, नक्षत्र नाम मिश्रा, पशु सुखी। शनिवार में संक्रान्ति होने से सभी प्रकार के तिलहन पदार्थ, अनाज, ईख, शर्करा, मिष्ठान, रस पदार्थ, गुड़, खाण्ड, सोना आदि में तेजी रहने की सम्भावना है।

आकाश लक्षण

इस मास ग्रहचाल व नाड़ी परिवर्तन, बुधोदय, बुध मार्गी, बुधास्त से बहुत-से स्थानों पर वर्षा होगी। कहीं अधिक वर्षा से हानि होगी। बहुत-से स्थानों पर पानी की कमी भी रहेगी। पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटने से स्थिति गम्भीर बनेगी। गुरु के आगे सूर्य रहने से गुरु-शुक्र की युति से अच्छी वर्षा होगी। कर्क राशि में बुध-शुक्र की युति से भी रिमझिम वर्षा होना सम्भव है।

  मांगलिक दोष विचार परिहार

वर अथवा कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में 1,4,7,8 व 12 भाव में मंगल होने से ये मांगलिक माने जाते हैं,मंगली से मंगली के विवाह में दोष न होते हुए भी जन्म पत्रिका के अनुसार गुणों को मिलाना ही चाहिए यदि मंगल के साथ शनि अथवा राहु केतु भी हो तो प्रबल मंगली डबल मंगली योग होता है | इसी प्रकार गुरु अथवा चंद्रमा केंद्र हो तो दोष का परिहार भी हो जाता है |इसके अतिरिक्त मेष वृश्चिक मकर का मंगल होने से भी दोष नष्ट हो जाता है | इसी प्रकार यदि वर या कन्या किसी भी कुंडली में 1,4,7,9,12 स्थानों में शनि हो केंद्र त्रिकोण भावो में शुभ ग्रह, 3,6,11 भावो में पाप ग्रह हों तो भी मंगलीक दोष का आंशिक परिहार होता है, सप्तम ग्रह में यदि सप्तमेश हो तो भी दोष निवृत्त होता है |

स्वयं सिद्ध मुहूर्त

 स्वयं सिद्ध मुहूर्त चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया आश्विन शुक्ल दशमी विजयदशमी दीपावली के प्रदोष काल का आधा भाग भारत में से इसके अतिरिक्त लोकाचार और देश आचार्य के अनुसार निम्नलिखित कृतियों को भी स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना जाता है बडावली नामी देव प्रबोधिनी एकादशी बसंत पंचमी फुलेरा दूज इन में से किसी भी कार्य को करने के लिए पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है परंतु विवाह आदि में तो पंचांग में दिए गए मुहूर्त व कार्य करना श्रेष्ठ रहता है।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी – 9312002527,9560518227

पुत्रदा एकादशी

यह एकादशी श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के नाम पर व्रत रखकर पूजा की जाती है। इसके पश्चात् वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराके दान देकर आर्शीवाद लेना चाहिए। सारा दिन भगवान की वंदना-कीर्तन करें और रात में भगवान की मूर्ति के पास ही सोना चाहिए। इस व्रत को रखने वाले निःसन्तान व्यक्ति को पुत्र-रत्न की प्राप्ति होती है।

पुत्रदा एकादशी व्रत की कथा

एक समय की बात है महिष्मती नगर में महीजित नाम का राजा राज करता था। वह बड़ा ही धर्मात्मा, शान्तिप्रिय और दानी था। परन्तु उसके कोई सन्तान नहीं थी। यही सोच-सोचकर राजा बहुत ही दुःखी रहता था।. एक बार राजा ने अपने राज्य के समस्त ऋषियों और महात्माओं को बुलाया और संतान प्राप्त करने के उपाय पूछे। इस पर परम ज्ञानी लोमश ऋषि ने बताया कि आपने पिछले जन्म में श्रावण मास की एकादशी को अपने तालाब से प्यासी गाय को पानी नहीं पीने दिया था और उसे हटा दिया था। उसी श्राप के कारण आपके कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई है। इसलिये आप श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी का नियमपूर्वक व्रत रखिये तथा रात्रि जागरण कीजिये,

आपको पुत्र अवश्य प्राप्त होगा। ऋषि की आज्ञानुसार राजा ने एकादशी का व्रत किया। और जिससे उसे पुत्र की प्राप्ति हुई।

 

अजा (प्रबोधिनी) एकादशी

 

प्रबोधिनी एकादशी भाद्रपद मास में कृष्णपक्ष की एकादशी को मनायी जाती है। इस एकादशी को कई नामों से पुकारा जाता है। जैसे-प्रबोधिनी, जया, कामिनी और अजा। इस दिन विष्णु भगवान की उपासना की जाती है। रात में जागरण करने और व्रत रखने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

अजा एकादशी की कथा

एक बार सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने स्वप्न में ऋषि विश्वामित्र को अपना राज्य दान कर दिया। अगले दिन ऋषि विश्वामित्र दरबार में गये तो राजा ने सचमुच में अपना सारा राजपाट सौंप दिया। ऋषि ने उनसे दक्षिणा की पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ और मांगीं। दक्षिणां चुकाने के लिये राजा को अपनी पत्नी, पुत्र और खुद को बेचना पड़ा। राजा हरिश्चन्द्र को एक डोम ने खरीदा था। डोम ने राजा को हरिश्चन्द्र को शमशान में नियुक्त किया। और उन्हें यह कार्य सौंपा कि वह मृतकों के सम्बन्धियों से कर लेकर शवदाह करें। उन्हें यह कार्य करते हुए जब अधिक वर्ष बीत गये, तब अचानक ही उनकी भेंट गौतम ऋषि से हुई। राजा ने गौतम ऋषि को अपनी सारी आपबीत सुनाई। तब मुनि ने उन्हें इसी अजा एकादशी का व्रत करने की सलह दी थी। राजा ने यह व्रत करना आरम्भ कर दिया। इसीबीच उनके पुत्र रोहताश का सर्प के डसने से स्वर्गवास हो गया। जब उसकी माता अपने पुत्र को अन्तिम संस्कार हेतु शमशान पर लेकर आयी तो राजा हरिश्चन्द्र ने उससे शमशान का कर मांगा। परन्तु उसके पास शमशान का कर चुकाने के लिये कुछ भी नहीं था। उसने अपनी चुन्दरी का आधा भाग देकर शमशान का कर चुकाया। तत्काल आकाश में बिजली चमकी और प्रभु प्रकट होकर बोले- “महाराज ! तुमने सत्य को जीवन में धारण करके उच्चतम आदर्श प्रस्तुत किया हैं। अतः तुम्हारी कर्तव्यनिष्ठा धन्य है। तुम इतिहास में सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के नाम से अमर रहोगे।” भगवत्कृपा से रोहित जीवित हो गया। तीनों प्राणी चिरकाल तक सुख भोगकर अन्त में स्वर्ग को चले गये।

 

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