आश्विन मास
सतीश शर्मा 
सनातन परंपरा में आश्विन मास का विशेष महत्व है। धर्म शास्त्रों के अनुसार आश्विन मास का प्रत्येक दिन अपने आप में काफी विशेष होता है। आश्विन मास में जहां 15 दिन पितृ पक्ष चलता है वहीं 9 दिन शारदीय नवरात्रि की धूम रहती है। इस माह में नवरात्रि, दशहरा जैसे कई पवित्र व्रत और त्योहार आते हैं। इन व्रत त्योहारों में भक्त श्रद्धापूर्वक ढंग से पूजा और अर्चना करते हैं। इसके अलावा अपने पितरों की आत्मा की शांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए लोग कई तरह के उपाय इस माह में करते हैं। इस मास में मां दुर्गा को समर्पित है। इस महीने में देव पूजन भी किया जाता है। इस महीने से सूर्य देव धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं। इस साल आश्विन मास 8 सितंबर से शुरू हुआ है और 6 अक्टूबर तक रहेगा।
अश्विन मास का महत्व – अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितृ पक्ष होता है, जिसमें पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। मान्यता है कि इस दौरान पितर धरती पर आते हैं और अपने परिजनों से प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं । अश्विन मास के शुक्ल पक्ष में शारदीय नवरात्रि मनाई जाती है, जिसमें मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा धरती पर आती हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देती हैं अश्विन मास में दशहरा, शरद पूर्णिमा जैसे अन्य महत्वपूर्ण त्योहार भी मनाए जाते हैं. अश्विन मास में दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इस महीने में ब्राह्मणों, गरीबों और जरूरतमंदों को दान देने से शुभ फल की प्राप्ति होती है. अश्विन मास में शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि वर्जित माने जाते हैं, लेकिन पितृ पक्ष और नवरात्रि में पितरों और देवी-देवताओं की पूजा करना शुभ माना जाता है.
नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करें और व्रत रखें. गरीबों और जरूरतमंदों को दान दें.
इस महीने में नकारात्मक विचारों से बचें और सकारात्मक रहें. गंगा स्नान करना भी शुभ माना जाता है,
इस महीने में धूप में ज्यादा घूमने से बचना चाहिए.इस महीने में शरीर को ढककर रखना चाहिए.
अश्विन मास एक महत्वपूर्ण महीना है, जिसमें पितरों और देवी-देवताओं की पूजा का विशेष महत्व है। इस महीने में दान-पुण्य करने और सकारात्मक रहने से शुभ फल की प्राप्ति होती है ।
आश्विन मास हिन्दू पंचांग का सातवाँ मास है। यह मास प्रायः सितंबर–अक्टूबर के बीच आता है। इसका नामकरण नक्षत्रों से हुआ है – इस मास की पूर्णिमा को अश्विनी नक्षत्र रहता है, इसलिए इसे आश्विन मास कहा गया। आश्विन मास में वर्षा ऋतु का अंत और शरद ऋतु का आरंभ होता है। मौसम सुहावना और स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है। आश्विन मास को अत्यंत पवित्र और धार्मिक दृष्टि से फलदायी माना गया है। पितृपक्ष/महालय – पितरों की स्मृति और तर्पण का विशेष काल आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। इस मास में तप, दान और श्रद्धा से किए गए कार्यों का विशेष पुण्य मिलता है। ऋषि-मुनियों ने कहा है कि आश्विन मास में की गई साधना से मन की शुद्धि और शक्ति की प्राप्ति होती है।
इस मास में प्रमुख व्रत, पर्व और उत्सव होते हैं – शारदीय नवरात्रि – माँ दुर्गा की उपासना का महान पर्व। दुर्गाष्टमी और महानवमी। विजयादशमी (दशहरा) – असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक। शरद पूर्णिमा – इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ पूर्ण होता है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है। लोक परंपरा के अनुसार इस मास को शक्ति आराधना और आरोग्य की वृद्धि का काल कहा गया है।आकाश में चंद्रमा की चाँदनी विशेष रूप से शीतल और मनोहारी प्रतीत होती है।






जय माता दी
जय जय श्रीराम
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