दरार या बिखराव

 दरार या बिखराव 

सतीश शर्मा

सुबह के साढ़े सात बजे जब सुमन  स्कूल के लिए ‌तैयार हुई तो‌ चुपके से ऊपर मम्मी के बेडरूम में ‌ग‌ई धीरे से डोर सरकाया देखा तो सारा सामान बिखरा पड़ा था। नीचे ड्राइंग रूम में आई तो पापा सोफे पर बेसुध सो रहे थे। अपने रुम में आकर उसने अपनी गुल्लक में से पचास रुपए निकाल कर पॉकेट में रख लिए। बैग उठा कर बस के लिए निकलने लगी तो सविता आई निधि बेटा आलू का परांठा बनाया है खा लो। सुमन ने मायूस नजरों से सविता आंटी को देखा नहीं आंटी भूख नहीं है। सविता ने जबरदस्ती टिफिन उसके बैग में डाला। सुमन स्कूल के ‌लिए निकल गई सविता ‌सोचने लगी बेचारी छोटी बच्ची साहब और मेमसाब के रोज के लडा़ई झगडे से इस तेरह साल की उम्र में ‌कितनी बड़ी हो गई है। सविता पिछले दस सालों से ममता व सुरेश के यहां काम कर रही है। दोनों ‌मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे ‌पदों पर कार्यरत हैं सुमन उनकी इकलौती बेटी है किसी चीज की कोई कमी नहीं है। पर हर समय दोनों एक दूसरे से लड़ते रहते हैं।

सुरेश पिछले कुछ समय से ममता से तलाक चाह रहा है और चाहता है सुमन की जिम्मेदारी ममता उठाए और ममता सुमन की जिम्मेदारी ‌सुरेश को देने के साथ जायदाद में हिस्सा चाहती है। इस कारण दोनों ‌लड़ते रहते हैं। बच्चे की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता इसलिए दोनों एक दूसरे के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल ‌करते हैं बेचारी सुमन ‌स्कूल से घर आकर अपने कमरे में ‌दुबक जाती है केवल सविता आंटी ‌से ही‌‌ बात करती है।रोज‌ की तरह ममता और सुरेश ने नाश्ता ‌अपने अपने कमरे में किया और ऑफिस के लिए निकल गये करीब बारह बजे स्कूल से कॉल आया कि जल्दी हास्पिटल पहुंचो सुमन को चोट‌ आई है। हॉस्पिटल पहुंच कर पता चला कि सुमन बहुत ऊपर से सीढ़ियों से गिर गई है। आईसीयू में रखा गया था। आपरेशन की तैयारी हो रही थी सिर में बहुत गहरी चोट आई थी।ऑपरेशन शुरू हुआ पर जिंदगी ‌मौत से हार गई। ममता और सुरेश स्तब्ध रह गए उन्हें ऐसा झटका लगा था कि अपनी सुध-बुध ही खो बैठे थे। सुमन की दादी ‌भी आ गई थी बेटा बहू को देखकर नफरत से मुंह फेर लिया। पूछताछ हुई टीचर स्टुडेंट्स सभी के बयान लिए गए यही पता चला कि बैलेंस बिगड़ने से नीचे गिर गई। तेरहवां ‌निबटने‌ के बाद सुरेश ने अपनी मां को रोकना चाहा पर उन्होंने आंखों में आंसू भर कर कहा तुम दोनों खूनी हो तुम्हारी जिद मेरी पोती को खा ग‌ई। मैं उसे अपने साथ ले जाना चाहती थी पर तुम दोनों ने उसे अपने अहम का मोहरा बना कर उसकी जान ले ली। मां चली गई। सवितातब से सदमे में थी फिर उसने जैसे तैसे होश संभाला सुरेश और ममता से कहा मेमसाब मैं अब यहां नहीं रह ‌पाऊंगी इस घर की दीवारें मेरी सुमन की सिसकियों से भरी हैं उसे मैंने कभी अपनी गोद में तो कभी छिप कर रोते हुए देखा है।मेरा मन किया कि उसे लेकर भाग जाऊं पर मैं डरपोक थी ऐसा नहीं कर सकी अगर चली जाती तो शायद आज वो जिंदा होती।

सुरेश और ममता के पास अब शायद कहने को कुछ नहीं था। जैसे जैसे दिन बीत रहे थे उनका लडा़ई झगड़ा एक अजीब सी बर्फ में में तब्दील हो चुका था।उनकी सारी भावनाएं अंदर ‌ही अंदर एक खामोशी अख्तियार कर चुकी थी। संडे का दिन था बड़ी मुश्किल से ममता ने सुमन के रूम में जाने की हिम्मत जुटाई थी महीनों दोनों उसके कमरे में कदम नहीं रखते थे कैसे मां बाप थे वो दोनों। उसका रूम उसका बेड तकिया उसकी किताबें उसकी पेंसिल पैन स्कूल बैग सब वैसे ही रखा था। अलमारी खोली तो उसके कपड़े नीचे गिर पड़े उसका हल्का ब्लू नाइट सूट जिसे वह अक्सर पहना करती थी। ममता रोते हुए उसमें से सामान निकालने लगी। तभी उसके‌ हाथ एक ब्लू कलर की डायरी लगी। उसने कांपते हाथों से उसे खोला आगे के कुछ पेज फटे हुए थे। पेज दर पेज टूटे‌ दिल की दास्तां छोटे छोटे टुकड़ों में दर्ज थी–

मम्मी पापा मैं आपको डियर नहीं ‌लिखूंगी । क्योंकि डियर का मीनिंग प्यारा होता है। पापा आप मम्मी को कहते हो कि तुम्हारी बेटी। और मम्मी आप पापा को कहते हो तुम्हारी बेटी आप दोनों ये क्यों नहीं कहते कि ‌हमारी‌ बेटी। अगले पेज पर था पता है जब मैं मामा जी के घर ‌जाती हूं मामा मामी ‌मुझे बहुत प्यार‌ करते हैं मामी अंशुल को जब प्यार से मेरा बच्चा कहती हैं तो मुझे लगता है कि मैं प्यारी बच्ची नहीं हूं मम्मा मैं तो ‌आपका सारा कहना मानती हूं फिर भी आपने मुझे कभी मेरा बच्चा नहीं कहा।

एक पेज पर लिखा था‌ मम्मी मैं जब बुआ के घर जाती हूं तो वो भी मुझे बहुत प्यार करती हैं। पर खाना हमेशा नानू की पंसद‌ का बनाती हैं। मम्मा मुझे राजमा बहुत पसंद है मैंने आपको बनाने को कहा था पर आपने कहा मुझे परेशान मत करो। जो खाना है सविता आंटी को बोला करो वो बना देंगी।मम्मा मैंने राजमा खाना छोड़ दिया है अब अच्छा नहीं लगता। पापा मुझे आपके चिल्लाने से बहुत डर लगता है। पापा मैं आपके साथ आइसक्रीम खाने जाना चाहती हूं। आप कहते हैं कि आपके पास फालतू चीजों के लिए ‌टाइम नहीं है। पापा जब मीनू  मासी और मौसा जी मुझे और कानू को आइसक्रीम खिलाने ले जाते हैं तो वो कभी ऐसा नहीं कहते। पता है मम्मी मैं अपने घर से दूर जाना चाहती हूं जहां मुझे ये न सुनाई दे कि सुमन को ‌मैं नहीं रखूंगी। जहां पापा के चिल्लाने की आवाज न सुनाई दे। पापा अगर मैं बड़ी होती तो मैं आप दोनों को कभी परेशान नहीं करती मैं खुद ही चली जाती। मैं आप दोनों से बहुत प्यार करती हूं। आप दोनों ‌मुझे प्यार क्यों नहीं करते। एक पेज पर था–आइलव यू सविता आंटी मुझे प्यार करने के लिए। जब मुझे डर लगता है अपने पास सुलाने के लिए।मेरी हर बात सुनने के लिए।

अंतिम पेज पर था दादी आई लव यू आप मुझे यहां से ‌ले ‌जाओ आई प्रॉमिस कभी तंग नहीं करूंगी। ममता डायरी को सीने से लगा कर जोर जोर से रो पड़ी। सुरेश भी उसके रोने की आवाज सुनकर आ गया था नेहा ने डायरी उसे पकड़ा दी।

पेज दर पेज पलटते हुए उसके चेहरे के भाव बदलते जा रहे थे। वह ‌खुद को संभाल नहीं पाया ‌जमीन पर बैठ गया।

ममता रोते हुए बोली सुरेश  पता है वो एक्सीडेंट नहीं आत्महत्या थी। सुसाइड था। जिस रिश्ते को हम बोझ समझते थे हमारी सुमन ने उससे ‌हमें आजाद कर‌ दिया। सुरेश हम दोनों ने अपनी बच्ची ‌का खून किया है। सुरेश फूट-फूट कर रो पड़ा।

ये कहानी हर उस घर की है जहां मां-बाप बच्चों के ‌सामने लड़ते हैं या घर टूट कर बिखरते हैं और उन टूटते रिश्तों का सबसे बड़ा खामियाजा बच्चे भरते हैं।

अगर आप अच्छी परवरिश नहीं दे सकते तो आपको बच्चे को जन्म देने का कोई अधिकार नहीं है। अच्छी परवरिश का‌ मतलब रूपए पैसे सुख सुविधाओं का होना नहीं है। इसका मतलब है कि आप बच्चे को जब जरूरत है उसके कितने करीब हैं।

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