विजयादशमी – एकता में शक्ति
सतीश शर्मा 
हमारा देश महान् एवं अति प्राचीन होने के कारण इसके उत्सव भी उतने ही महान् एवं प्राचीन है। अतः कालक्रम से उत्सवों के साथ अनेकों घटनाओं व प्रसंगों का जुड़ जाना स्वाभाविक है। हिन्दू समाज पुरुषार्थ में विश्वास रखता है अतः अंतिम लक्ष्य मोक्ष के रुप में अखण्डानंद की ही प्राप्ति है। हिन्दू-जीवन पद्धति में इसीलिए नित नूतन उत्सवों की मालिका देखने में आती है।
दशहरा को अच्छाई की बुराई पर जीत के लिए मनाया जाता है। इसी दिन भगवान श्री राम जी ने रावण का वध किया था। दशहरा नवरात्रि के नौ दिनों के उपवास और पूजा का समापन भी होता है। इन नौ दिनों में हम देवी दुर्गा के रूपों की पूजा करते हैं और बुराई से लड़ने की शक्ति मांगते हैं।
प्रतिवर्ष आश्विन शुक्लपक्ष दशमी को हिन्दू समाज उत्साह तथा आशा से परिपूर्ण होकर विजयदशमी का पावन पर्व मनाता है। आसुरी शक्ति पर सज्जन शक्ति की विजय के रूप में राम की रावण पर विजय की यह गौरव गाथा विश्व विख्यात है। यह न्याय की अन्याय पर, सदाचार की अनाचार पर सत्य की असल्य पर, धर्म की अधर्म पर तथा सात्विकता की पाशविकता पर विजय गाथा है। साथ ही मां दुर्गा से जुड़ी है, जिसमें देवी दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। देवी दुर्गा ने नौ दिनों तक युद्ध करके उसे पराजित किया। इस महत्व के कारण भी दसवें दिन को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है।
आदि कवि वाल्मीकि ने राम की विजय गाथा को सर्वप्रथम लिखा। इसके पश्चात अनेक कवियों ने राम चरित्र का वर्णन अपने भावनाओं के अनुकूल किया परन्तु सर्वाधिक प्रसिद्ध गोस्वामी तुल्सीदास रचित रामचरितमानस को प्राप्त हुई। महाबलशाली अतुल संपत्ति का स्वामी, पुष्पक विमान सहित अनेकों मन्त्र दीक्षित अस्त्र शास्त्रों से सुसज्जित, साधन संपन्न सेनानायक लंकाधिपति रावण से बडे-बडे बलशाली प्रतापी एवं शूरवीर राजा भी भय खाते थे। परन्तु निरंकुश शक्ति समाज के लिए घातक हो जाती है। आसुरी आचार व्यवहार के साथ संस्कृति का हास होने लगता है। अपनी शक्ति के शिखर पर रावण राज्य में भी यही सब कुछ हो रही था। ऋषि मुनि व तपस्वी अत्याचार के शिकार थे। यज्ञ और धार्मिक कृत्य करना कठिन था। समाज मर्माहत था। ऐसे में ही दशरथ नंदन राम का आविर्भाव हुआ और उन्होंने अयोध्या का राजमहल छोड़कर वन गमन किया। राम ने समाज की सही स्थिति का आंकलन करते हुए वनवास के समय समाज के श्रेष्ठ जनों से विद्वानों से ऋषि मुनियों से संबंध बनाए। इसके साथ ही साथ वनवासी जातिया जैसे वानर भील, निषाद, रीक्ष आदि समुदायों का संगठन खड़ा करने को सफल प्रयास किया। इस संगठित शक्ति के बल पर आसुरी शक्तियों को ध्वस्त किया।यहां एक बात और समझना आवश्यक है हम राम को ईश्वर अवतार मानते हैं ऐसा ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने ग्रंथ रामचरितमानस में कहा है, इसी कारण वनवास के कुछ वर्ष व्यतीत होने के बाद जब राम को लगा कि अब रावण वध का समय आ गया है तब उन्होंने सीता जी को अग्नि प्रवेश करा दिया और छाया सीता को अपने साथ रखा जिसका अपहरण रावण ने किया था। उस छाया सीता को ढूंढते हुए भगवान राम जब घने जंगलो में पहुंचे तब वहां उन्होंने हड्डियों का ढेर देखा। जिसको देखकर उन्होंने वहां के निवासी ऋषि मुनियों से पूछा कि यह हड्डियों का ढेर किसका है। तब उन्हें उत्तर मिला कि यह उन ऋषियों और मुनियों की हड्डियों का ढेर है, जिनको मारकर खाकर हड्डियां राक्षसो ने यहां फेंक दी है। यह उन्ही ऋषियों की हड्डियों का ढेर है। तब राम ने हाथ उठाकर प्रतिज्ञा की थी
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह ।।
अर्थात राम कहते हैं कि वे इस पृथ्वी को राक्षसो से रहित कर देंगे। इससे स्पष्ट है कि रावण का वध तो होना ही था, सीताहरण तो एक बहाना था।
साथ ही यदि राम चाहते तो वह और लक्ष्मण बिना किसी अन्य की सहायता के ही रावण का वध कर सकते थे और सीता को छुड़ा सकते थे। जटायु ने राम को बात ही दिया था की सीता को रावण हरण करके दक्षिण दिशा की ओर ले गया है। ऋषियों से राम को पता चल ही सकता था की रावण का निवास कहां है और वह अकेले जाकर समुद्र को पार करके युद्ध में रावण को परास्त करके सीता को छुड़ा सकते थे। परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उनका मानना था की आसुरी शक्तियों से युद्ध करना पूरे समाज का कर्तव्य है। पूरे समाज को दुष्ट शक्तियों से युद्ध करने के लिए संगठित होना जरूरी है। इस कारण उन्होंने वानरों और अन्य जातियों का एक अद्भुत संगठन खड़ा किया जिसमें हनुमान, अंगद, सुग्रीव और जामवंत जैसे जैसे महा बलशाली भी थे। यह सज्जन शक्ति का एक अजेय संगठन था। भगवान श्रीराम का स्पष्ट सन्देश है, कि न्याय की अन्याय पर सदाचार की अत्याचार पर सत्य की असत्य पर धर्म की अधर्म पर विजय के लिये सज्जन शक्ति का संगठित होना आवश्यक है।
यह एक शक्तिशाली संगठन होना चाहिए। और एक बात, धर्मयुद्ध में भाग लेने का कर्तव्य केवल जन्म से क्षत्रियो का ही नहीं परन्तु समाज के सभी वगों का दायित्व है।
राम का जीवन सामाजिक समरसता के के रूप में भी अनुकरणीय है। वह एक और जहां भारद्वाज और वाल्मीकि के आश्रम में गए दूसरी ओर शबरी के आश्रम में जाकर उनके झूठे बेर खाने में संकोच नहीं किया। वह निषाद राज को भी गले लगाते हैं और उनका आतिथ्य स्वीकार करते हैं। राम के इस व्यवहार के ही परिणाम को गोस्वामी जी ने निम्न चौपाई में प्रकट किया है –
करि के हरि कपि कोल कुरंगा। बिगत बैर विचरहिं सब संगा ।।
इसका भावार्थ है की हाथी शेर, वानर कोल और अन्य जातियों के सभी लोग आपस में वैर भाव को भूलकर एक साथ विचरण करते हैं। अर्थात उन्होंने समाज में सब प्रकार के लोगों को संगठन में सम्मिलित किया।
शान्ति के समय मे भी ऐसा संगठन आवश्यक सज्जन शक्ति का संगठन मात्र युद्ध के लिए ही आवश्यक नहीं है परन्तु शान्ति के समय में भी शक्तिशाली होना आवश्यक है। प्रत्येक शान्ति प्रेमी अगर शक्तिशाली नहीं होगा तो आसुरी शक्तियां उसकी शान्ति को भंग कर देगी। इसका सबसे बड़ा प्रमाण हमे विगत अनेक वर्षों पूर्व की घटना से मिलता है। जब रूस ने आणविक हथियार क्यूबा में लगा दिए थे। तब अमेरिका के राष्ट्रपति ने चेतावनी दी थी कि, अगर रूस ने इन इन आणविक हथियारो को नहीं हटाया तो अमेरिका रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर देगा। इससे घबरा कर रूस ने आणविक हथियार वहां से हटा लिए थे। सोचिए अगर उस समय अमेरिका रूस से अधिक शक्तिशाली नहीं होता तो क्या रूस वहां से आणविक हथियार हटाता और क्या हमेशा के लिए अमेरिका आणविक हथियारों के आक्रमण के भय में नहीं जीता नहीं रहता। अभी हाल मैं अमेरिका द्वारा भारत पर टैरिफ बढ़ाना ऐसे अनेकों उदाहरण है। शक्ति हो तो राम मंदिर बन जाता है, शक्ति हो तो धारा 370 है जाती है और अगर शक्ति हो तो ऑपरेशन सिंदूर हो जाता है इसलिए शक्ति का संचय और संगठन जरूरी है ।
यही सन्देश हमे त्रेता युग की घटना से भी मिलता है, जब राम ने समुद्र से सागर पार जाने का मार्ग देने का आग्रह किया। परन्तु समुद्र लंका जाने का मार्ग बताने के लिए तैयार नहीं हुआ। राम तीन दिन तक अनुनय करते रहे। इस घटना को गोस्वामी तुलसीदास जी ने निम्नलिखित चौपाई में वर्णित किया है
विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीत। बोले राम सकोप तब भय बिन होय न प्रीत।।
तब राम ने समुद्र को सुखाने हेतु धनुष पर अग्निबाण का संघान किया। और समुद्र ने घबराकर डर कर राम को सागर पर जाने के लिए सेतु निर्माण की प्रक्रिया बता दी। सोचिये अगर श्री राम मे समुद्र सुखा देने की शक्ति न होती तो क्या समुद्र सेतु बंधन का तरीका बताता।
विजयदशमी का पर्व शस्त्र पूजन की परम्परा का भी स्मरण करवाता है शास्त्र और शास्त्र दोनों में निपुणता के बिना कोई भी राष्ट्र अपनी उन्नति नहीं कर सकता यह ध्रुव सत्य है।
धर्मादर्थः प्रभावति धर्मात्प्रभवते सुखम्। धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥
धर्म से ही धन, सुख और सब कुछ प्राप्त होता है। इस संसार में धर्म ही सार वस्तु है।
अपनी यह मातृभूमि है, हम उसके पुत्र हैं, और हजारों वर्षों से हम यहां एक साथ रहते आये हैं। इस दीर्घ कालखण्ड में हमने भूतकाल का उज्ज्वल इतिहास निर्माण किया है, यह भावनात्मक अधार तो होगा ही, किन्तु क्या यही पर्याप्त है ? क्या इस भावना के साथ ही कोई व्यावहारिक पक्ष होना आवश्यक नहीं ? सब लोगों को ‘हम सभी एक हैं’ का भावनात्मक बोध होना आवश्यक है, वैसा ही प्रत्यक्ष व्यवहार में भी इस एकता का अनुभव सदा सहज रूप से होना चाहिये। अपने दैनंदिन व्यवहार में जब तक हम सभी को अपनी इस ‘एकता’ की अनुभूति नहीं होती, तब तक एकता की नींव मजबूत और चिरस्थायी नहीं हो सकती। यदि आप ऐसा समझते हैं, और मुझे विश्वास है कि आप भी ऐसा ही सोचते हैं, तो फिर इस दृष्टि से हममें क्या कमी है, इसका विचार करना भी आवश्यक हो जाता है।
संघ शताब्दी के इस आनंद और उत्साह से भरे पुण्य अवसर पर, हर्षोल्लासपूर्वक विभिन्न आयोजनों को संपन्न करने के साथ ही हमको अंतर्मुख होकर यह विचार भी करना चाहिए कि हमारे कार्य का प्रयोजन यदि भारत के जीवन में स्व की अभिव्यक्ति से होने वाला है, तो वह भारत का स्व क्या है? विश्व जीवन में भारत के योगदान के उस प्रयोजन को सिद्ध करने के लिए हमको भारत को किस प्रकार शक्तिशाली बनाना होगा? इन कार्यों को संपन्न करने के लिए हमारे कर्तव्य क्या हैं? उसका निर्वाह करने के लिए समाज को कैसे तैयार किया जाए? वह कार्य पूर्ण करने हेतु यह चिंतन तथा हम सबके कर्तव्य के दिशा की स्पष्टता आवश्यक है।





