छठ पूजा का महत्व व कथा

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छठ पूजा का महत्व व कथा 

सतीश शर्मा

सुहाग संतान व समृद्धि  के लिए पूजे  जाने वाला पर्व है छठ पूजा,छठ पूजा को समाजिक समरसता, सद्भाव व  लोक आस्था  का महापर्व कहते है। सूर्य देव और छठी माता की आराधना का पर्व है। यह पर्व चार दिन तक चलता है और इसमें श्रद्धालु न केवल सूर्य देवता की पूजा करते हैं, बल्कि अपर्णा या छठी माता की भी आराधना करते हैं। कहा जाता है की ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना करते समय खुद को दो भागों में बांटा था. एक भाग पुरुष और दूसरा भाग प्रकृति के रूप में था,प्रकृति ने खुद को छह हिस्सों में बांटा था, इनमें छठे भाग को मातृ देवी कहा जाता है,देवी दुर्गा के छठे स्वरूप कात्यायनी को भी छठ माता कहते हैं | कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ का व्रत किया जाता है | 

हमारे समाज  में आज भी बच्चे के जन्म के छठे दिन बाद  छठी पूजा की जाती  है | मान्यता है कि जिस पर छठी मैया की कृपा होती है, तो उस बच्चे के सारे संकट दूर हो जाते हैं | छठी मइया के पति का नाम ‘कार्तिकेय’ है. कार्तिकेय जो भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं और भगवान गणेश के भाई भी हैं | छठ माता का  वाहन बिल्ली है | मान्यता है कि यह पर्व भगवान सूर्य और उनकी पत्नी प्रथा की आराधना के लिए मनाया जाता है। 

वैसे तो छठ माता की बहुत सारी कथाएं हैं पर कुछ कथाओं का वर्णन नीचे दे रहें हैं |  

कहते है की  जब महाराज श्रेयांस ने अपनी पत्नी के गर्भवती होने की ख़ुशी मनाई, तब उनकी पत्नी ने भगवान सूर्य से प्रार्थना की कि उनके पुत्र में बुद्धिमत्ता और शक्ति हो। भगवान सूर्य ने उन्हें छठी माता के माध्यम से आशीर्वाद दिया।

कहा जाता है कि जब एक बार इंद्रदेव ने गर्व से अपने बल का प्रदर्शन किया, तो सूर्य देव ने इसे चुनौती दी। इससे नाराज होकर इंद्र ने सूखे की स्थिति उत्पन्न कर दी। इससे परेशान होकर देवताओं ने छठी माता से मदद मांगी। छठी माता ने न केवल इंद्र का गर्व चूर किया, बल्कि पृथ्वी पर बारिश लाने में भी मदद की। इस घटना के बाद से छठ पूजा का आयोजन शुरू हुआ।

जब पांडव सारा राजपाठ जुए में हार गए, तब द्रोपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को सब कुछ वापस मिल गया। छठ पूजा से जुड़ी एक और कहानी यह है कि राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी. उनकी पत्नी मालिनी इस बात से बहुत दुखी रहती थीं. एक दिन वे कश्यप ऋषि के पास पहुंचे और अपने मन की व्यथा बताई. तब उन्होंने राजा प्रियंवद को पुत्र सुख पाने के लिए एक यज्ञ करने को कहा |लेकिन छठ महाव्रत तब तक अधूरा है जब तक इससे जुड़ी कथा नहीं सुनी या पढ़ी नहीं जाती। ऐसे में आइए जानते हैं छठ पूजा की कथा के बारे में-छठ माता, भगवान सूर्य की बहन और ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं. इन्हें षष्ठी देवी या कात्यायनी के नाम से भी जाना जाता है. छठ माता को संतान प्राप्ति की देवी माना जाता है. छठ पूजा में सूर्य देव के साथ-साथ छठ मैया की भी पूजा  जाता  है | 

पुराणों के अनुसार, राजा प्रियंवद नामक राजा हुआ करते थे जिनकी कोई संतान नहीं थी। तब महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए राजा के यहां यज्ञ का आयोजन किया। महर्षि ने यज्ञ आहुति के लिए बनाई गई गई खीर को प्रियंवद की पत्नी मालिनी को खाने के लिए कहा। खीर के प्रभाव से रजा और रानी को पुत्र तो हुआ किन्तु वह मृत था। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी समय भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं।उन्होंने राजा से कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। माता ने राजा को अपने पूजन का आदेश दिया और दूसरों को भी यह पूजन करने के लिए प्रेरित करने को कहा। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें शीघ्र ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिस दिन राजा ने यह व्रत किया था उस दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि थी। तभी से छठी मैय्या के पूजे जाने की परंपरा आरंभ हुई।

प्राचीन काल में विन्दुसार तीर्थ में एक महीपाल नामक वणिक रहता था। वह धर्म-कर्म तथा देवता विरोधी था। एक बार उसने सूर्य भगवान की प्रतिमा के सामने मल मूत्र का त्याग किया। परिणामस्वरूप उसकी आंखों की ज्योति जाती रही। इसके बाद वह अपने जीवन से ऊबकर गंगाजी में डूबकर मर जाने को चल दिया। रास्ते में उसकी भेंट महर्षि नारदजी से हो गई। नारद जी उससे पूछने लगे महाश्य! जल्दी जल्दी किधर जा रहे हो? महीपाल रोते रोत बोला-मेरा जीवन दूभर हो गया है। मैं अपनी जान देने हेतु गंगा में कूदने जा रहा हूं। मुनि बोले-मूर्ख प्राणी! तेरी यह दशा भगवान सूर्य देव के कारण हुई है। इसलिए कार्तिक मास की सूर्य षष्ठी का व्रत रख। तेरे सब कष्ट दूर हो जायेंगे। वणिक ने ऐसा ही किया तथा सुख समृद्धिपूर्ण दिव्य ज्योति प्राप्त कर स्वर्ग का अधिकारी बन गया।

लोक परंपरा के अनुसार, सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। त्यौहार के अनुष्ठान कठोर हैं। यह पर्व चार दिनों की अवधि में मनाए जाता हैं। इनमें पवित्र स्नान, उपवास और पीने के पानी (वृत्ता) से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना, और प्रसाद (प्रार्थना प्रसाद) और अर्घ्य देना शामिल है। परवातिन नामक मुख्य उपासक (संस्कृत पार्व से, जिसका मतलब ‘अवसर’ या ‘त्यौहार’) आमतौर पर महिलाएं होती हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में पुरुष इस उत्सव का भी पालन करते हैं। छठ महापर्व के व्रत को स्त्री – पुरुष – बुढ़े – जवान सभी लोग करते हैं।

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के साथ छठ पूजा शुरू हो जाती है। वहीं, षष्ठी तिथि को शाम के समय सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

छठ व्रत के नियमों में पवित्रता, संयम और अनुशासन का विशेष महत्व है। इस दौरान लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। व्रती को शुद्ध और सात्विक भोजन करना चाहिए, नए या साफ़ कपड़े पहनने चाहिए और जमीन पर चटाई बिछाकर सोना चाहिए। पूजा में बांस की टोकरी (सूप) का इस्तेमाल करें और प्रसाद बनाते समय बातचीत न करें। 

घर और पूजा स्थल की पूरी तरह से साफ-सफाई रखें। पूजा सामग्री भी शुद्ध होनी चाहिए। व्रत के दिनों में लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा का सेवन सख्त वर्जित है। घर में भी ये चीजें नहीं होनी चाहिए। 

आहार: व्रती को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रत के दौरान पलंग या चारपाई पर नहीं सोना चाहिए, जमीन पर चटाई बिछाकर ही सोना चाहिए। पूजा में कांच, प्लास्टिक और लोहे की वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। चमड़े की चीजों से भी बचें। प्रसाद बनाते समय साफ और शुद्ध वस्त्र पहनें। बातचीत न करें क्योंकि मुंह से कण प्रसाद को झूठा कर सकते हैं। इस दौरान किसी भी तरह के वाद-विवाद से बचना चाहिए और अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 

 छठ व्रत में महिलाएं 36 घंटे तक निर्जला (बिना पानी पिए) व्रत करती हैं। पहले दिन नहाए-खाय होता है, जिसमें सात्विक भोजन किया जाता है। दूसरे दिन खरना पूजा होती है। इस दिन गुड़ की खीर बनाई जाती है और प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके बाद व्रती निर्जला व्रत शुरू करते हैं। तीसरे दिन शाम को डूबते सूर्य को और चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रत का पारण उषा अर्घ्य के बाद ही करना चाहिए। अर्घ्य देते समय सूर्य मंत्र का जाप करें और मन को शांत रखें। पूजा के दौरान पहने गए वस्त्र अखंडित होने चाहिए। महिलाओं को फॉल वाली साड़ी या सिलाई वाले कपड़े पहनने से बचना चाहिए। पूजा में उपयोग होने वाले बर्तन शुद्ध और साफ होने चाहिए, कोशिश करें कि लकड़ी या उपले का चूल्हा इस्तेमाल करें। पूजा सामग्री बांस की सूप या टोकरी में रखी जाती है। 

उपरोक्त सभी जानकारी श्रद्धालुओं से बातचीत के आधार पर है । संशोधन स्वीकार्य है । सतीश शर्मा 

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