शुभता व उमंग का पर्व मकर संक्रांति
सतीश शर्मा 
हमारी पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग एक वर्ष में पूर्ण करती है। अपने गोलाकार परिपथ में वह प्रतिमास एक राशि के प्रभाव क्षेत्र से गुजरती है। इस प्रकार वर्ष भर में 12 राशियों को वह पार करती है। एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को संक्रमण या संक्रांति कहते हैं। 12 संक्रातियों में से मकर संक्रांति अधिक प्रसिद्ध है। मकर संक्रांति का महत्व सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश (उत्तरायण) के कारण है, जो शुभता, नई ऊर्जा और शुभ कार्यों (विवाह, गृह प्रवेश) की शुरुआत का प्रतीक है इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, तिल-गुड़ का दान, खिचड़ी का भोग और पतंगबाजी होती है, जिससे खरमास समाप्त होता है और पुण्य फल की प्राप्ति होती है। यह पर्व नई फसल, सामाजिक एकता और भीष्म पितामह के देह त्याग से भी जुड़ा है।
काल गणना में ‘सौर वर्ष’ का प्रारम्भ मकर संक्रांति के दिन से ही प्रारम्भ होता है। लगभग एक वर्ष में पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। अतः सौर वर्ष की गणना अँग्रेजी कलैण्डर से मेल खाती है, जिसके कारण मकर संक्रांति प्रति वर्ष एक निश्चित अंग्रेजी तिथि (14 जनवरी) को होती है। जबकि हमारे अन्य उत्सव ‘रक्षा बन्धन, विजय दशमी आदि’ की काल गणना ‘चन्द्र-वर्ष’ (भारतीय पद्धति, जिसमें वर्ष प्रतिपदा से वर्ष प्रारम्भ होता है) के अनुसार की जाती है।
मकर संक्रांति के दिन सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाने का अर्थात् अधिक प्रकाश के प्रारम्भ ( दिन बड़ा होने लगता है और रात्रि छोटी ) का पर्व मनाया जाता है। दक्षिण में इसे पोंगल और कहीं तिलुआ संक्रांति भी कहते हैं। संक्रांति से एक दिन पूर्व यज्ञों की पूर्ण आहूति की जाती है, पंजाब में आज भी इसे लोहड़ी उत्सव के रूप में मनाते हैं। संक्रांति के दिन पवित्र नदी में स्नान एवं तिल-गुड़ के सेवन का विशेष महत्व है। महाराष्ट्र में इस दिन कहते हैं, तिल गुड़ धया आणि गोंठ बोला’ अर्थात् मुझसे तिल गुड़ लो और मीठा बोलो। आयुर्विज्ञान की दृष्टि से इन दिनों तिल तथा खिचड़ी का सेवन अत्यंत लाभकारी है। शरीर की शुष्कता दूर कर स्निग्धता एवं ऊष्णता उत्पन्न करने के लिये तिल को सर्वोत्तम माना गया है।
मकर संक्रांति से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करते हैं, जिसे देवताओं का दिन और शुभ समय माना जाता है, जिससे खरमास समाप्त होता है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनिदेव (जो मकर राशि के स्वामी हैं) से मिलने उनके घर जाते हैं।
मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों (गंगा, यमुना आदि) में स्नान से पापों का नाश होता है और पुण्य लाभ मिलता है। महाभारत युद्ध के समय भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागने के लिए इसी उत्तरायण काल (मकर संक्रांति) का इंतजार किया था क्युकी उत्तरायण मे मरती होने पर मुक्ति मिलती है । इस दिन से शुभ कार्यों का आरंभ जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। मकर संक्रांति नई फसल के आगमन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है, जो लोहड़ी, पोंगल जैसे नामों से भी मनाया जाता है। मकर संक्रांति को तिल, गुड़, वस्त्र, अन्न, खिचड़ी आदि का दान करने से विशेष पुण्य मिलता है।इस दिन तिल के लड्डू, खिचड़ी, गजक, रेवड़ी जैसे पकवान बनाए जाते हैं।
देश कई भागों मे जैसे गुजरात और राजस्थान में पतंग उड़ाना इस पर्व का एक प्रमुख हिस्सा है, जिससे आकाश रंगीन हो जाता है। मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व है की मौसम में बदलाव आता है ओर मकर संक्रांति के बाद से ठंड कम होने लगती है और वातावरण में सकारात्मक बदलाव आते हैं। स्वास्थ्य लाभ तो है ही की तिल और गुड़ से बनी खिचड़ी पाचन और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करती है।
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