स्त्री पुरुष संबंध 

A lone traveler stands on a hilltop, gazing over a vast mountain landscape under a clear blue sky.

स्त्री पुरुष संबंध 

चन्द्र कला

स्त्री का संभोग उसके योनि से नहीं, बल्कि उसके मन से शुरू होता है। वहीं, पुरुष का संभोग उसके मन से नहीं, बल्कि उसके जननांग से शुरू होता है। मेरी सास ने मुझे यह बात सिखाई थी।

सारांश से मेरी शादी फिक्स हुई थी। उनके परिवार के लोग मुझे देखने मेरे घर के पास वाले मंदिर आए थे। मैं एक ऐसी लड़की थी, जो ज्यादा बाहर नहीं जाती थी और मेरी सहेलियों का भी कोई गोल नहीं था।

सारांश ने अपने माता-पिता से कह दिया था कि अगर उन्हें लड़की ठीक लगे तो वे शादी के लिए हां कर दें। मैंने भी अपने माता-पिता पर सब छोड़ दिया।

तीन महीने बाद हमारा रोका हुआ। सारांश ने अपना फोन नंबर दिया, और हमने बात करनी शुरू की। बातों के दौरान हमारी चर्चा कब शारीरिक सुख तक पहुंच गई, मुझे पता ही नहीं चला।

शादी के बाद सुहागरात वाले दिन सारांश ने मुझे छूना शुरू किया, लेकिन मैं इसके लिए तैयार नहीं थी। मैंने उनसे कहा कि मुझे थोड़ा समय चाहिए। यह मेरे लिए भी शर्मिंदगी की बात थी, लेकिन मैं बिना आंतरिक मन के कुछ भी नहीं करना चाहती थी।

एक सप्ताह ऐसे ही बीत गया और सारांश का स्वभाव मेरे प्रति रूखा हो गया। मुझे पता था कि इसका कारण क्या है, लेकिन समझ नहीं पा रही थी कि इसे कैसे ठीक करूं। एक दिन मेरी सास ने मुझसे पूछा कि सब ठीक है या नहीं। पहले तो मैंने मना कर दिया, लेकिन फिर अपने आंसू रोक नहीं पाई और उन्हें सब बता दिया। उन्होंने मुझे समझाया, “बहू, एक लड़के के लिए सेक्स बहुत जरूरी है। यह उसे विश्वास दिलाता है कि तुम पूरी तरह उसकी हो। जबरदस्ती मत करो, लेकिन अच्छे वैवाहिक संबंध में शारीरिक सुख का बहुत योगदान होता है।”

इसके बाद मेरी ननद और जीजा ने सारांश को समझाया कि स्त्री के लिए संभोग नीचे से नहीं, बल्कि मन से शुरू होता है। उन्होंने सारांश से कहा कि मुझ पर दबाव डालने के बजाय वे मेरे साथ ज्यादा समय बिताएं और दोस्त बनने की कोशिश करें।

धीरे-धीरे सारांश मेरा ध्यान रखने लगे। छोटी-छोटी बातों में उनका प्यार झलकने लगा। बदले में, मैं उनके करीब आने लगी। कब हम दोनों 2 जिस्म एक जान बन गए, पता ही नहीं चला।

सारांश को भी यह समझ में आया कि एक स्त्री के लिए संभोग सिर्फ शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह उसके मन से होकर गुजरता है।

अगर मेरी सास, ननद और जीजा न होते, तो शायद मेरी शादी दो महीने भी नहीं चल पाती। उनके सहयोग और समझ ने मेरी शादी को बचाया।

आजकल लोग ऐसे लड़के ढूंढते हैं, जो अपने माता-पिता से अलग रहते हों। लेकिन सच्चाई यह है कि परिवार में साथ रहना कई समस्याओं का हल बन सकता है। परिवार में कुछ बंदिशें जरूर होती हैं, लेकिन उनके फायदे अनगिनत होते हैं, जो इन बंदिशों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

 

मातृशक्ति 

 मधु सिंह

मैंने एक दिन अपनी पत्नी से पूछा – क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता कि मैं बार-बार तुमको कुछ भी बोल देता हूँ, और डाँटता भी रहता हूँ, फिर भी तुम पति भक्ति में ही लगी रहती हो, जबकि मैं कभी पत्नी भक्त बनने का प्रयास नहीं करता..?

मैं भारतीय संस्कृति के तहत वेद का विद्यार्थी रहा पत्नी विज्ञान की, परन्तु उसकी आध्यात्मिक शक्तियाँ मुझसे कई गुना ज्यादा हैं, क्योकि मैं केवल पढता हूँ और वो जीवन में उसका अक्षरतः पालन भी करती है।

मेरे प्रश्न पर जरा वह हँसी और गिलास में पानी देते हुए बोली- यह बताइए कि एक पुत्र यदि माता की भक्ति करता है तो उसे मातृ भक्त कहा जाता है, परन्तु माता यदि पुत्र की कितनी भी सेवा करे उसे पुत्र भक्त तो नहीं कहा जा सकता ना!

मैं सोच रहा था, आज पुनः ये मुझे निरुत्तर करेगी। मैंने फिर प्रश्न किया कि ये बताओ, जब जीवन का प्रारम्भ हुआ तो पुरुष और स्त्री समान थे, फिर पुरुष बड़ा कैसे हो गया, जबकि स्त्री तो शक्ति का स्वरूप होती है..?

मुस्कुरातें हुए उसने कहा- आपको थोड़ी विज्ञान भी पढ़नी चाहिए थी…

मैं झेंप गया और उसने कहना प्रारम्भ किया…दुनिया मात्र दो वस्तु से निर्मित है…ऊर्जा और पदार्थ।

पुरुष ऊर्जा का प्रतीक है और स्त्री पदार्थ की। पदार्थ को यदि विकसित होना हो तो वह ऊर्जा का आधान करता है, ना की ऊर्जा पदार्थ का। ठीक इसी प्रकार जब एक स्त्री एक पुरुष का आधान करती है तो शक्ति स्वरूप हो जाती है और आने वाले पीढ़ियों अर्थात् अपने संतानों के लिए प्रथम पूज्या हो जाती है, क्योंकि वह पदार्थ और ऊर्जा दोनों की स्वामिनी होती है जबकि पुरुष मात्र ऊर्जा का ही अंश रह जाता है।

मैंने पुनः कहा- तब तो तुम मेरी भी पूज्य हो गई ना, क्योंकि तुम तो ऊर्जा और पदार्थ दोनों की स्वामिनी हो..?

अब उसने झेंपते हुए कहा- आप भी पढ़े लिखे मूर्खो जैसे बात करते हैं। आपकी ऊर्जा का अंश मैंने ग्रहण किया और शक्तिशाली हो गई तो क्या उस शक्ति का प्रयोग आप पर ही करूँ…..ये तो सम्पूर्णतया कृतघ्नता हो जाएगी।

मैंने कहा- मैं तो तुम पर शक्ति का प्रयोग करता हूँ फिर तुम क्यों नहीं….?

उसका उत्तर सुन मेरे आँखों में आँसू आ गए…उसने कहा- जिसके साथ संसर्ग करने मात्र से मुझमें जीवन उत्पन्न करने की क्षमता आ गई और ईश्वर से भी ऊँचा जो पद आपने मुझे प्रदान किया जिसे माता कहते हैं, उसके साथ मैं विद्रोह नहीं कर सकती। फिर मुझे चिढ़ाते हुए उसने कहा कि यदि शक्ति प्रयोग करना भी होगा तो मुझे क्या आवश्यकता… मैं तो माता सीता की भाँति लव-कुश तैयार कर दूँगी, जो आपसे मेरा हिसाब किताब कर लेंगे।

*सहस्त्रों नमन है सभी मातृ शक्तियों को, जिन्होंने अपने प्रेम और मर्यादा में समस्त सृष्टि को बाँध रखा है…

 

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