राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पंच मुखी विकास योजना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पंच मुखी विकास योजना  

सतीश शर्मा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सम्पूर्ण भारतीय समाज में आधारभूत परिवर्तन के लिए जिन पांच आयामों को चुना है वे हैं ‘स्व’, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण और नागरिक कर्तव्य।पंच परिवर्तन का यह संकल्प भारत को वैभव सम्पन्न सशक्त राष्ट्र के रूप में विकसित करेगा। इस दृष्टि से शताब्दी वर्ष में संघ ने पंच अमृत धाराओं से समाज को सिंचित करने का संकल्प लिया है। परिवर्तन की साधना चरणबद्ध है। अतः अपेक्षा है कि ये सभी अत्यावश्यक परिवर्तन स्वयं के आचरण का अंग बनने के साथ-साथ परिवार में भी यह अभ्यास स्थायी बनें। इसी के समानांतर अपने कार्यस्थल, पड़ोस और क्रमशः सभी प्रभावक्षेत्रों में पंचपरिवर्तन परिणामकारी होते जाएँ इसका उद्देश्यपूर्ण प्रयास प्रत्येक से अपेक्षित है। इसलिए पहले यह परिवर्तन खुद में व अपने परिवार में करना हैं उसके बाद समाज मे लेकर जाना हैं | इन पंच परिवर्तन के कुछ करने योग्य कार्य नीचे दिए हैं |

पर्यावरण 

 पर्यावरण का हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके बिना मनुष्य एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। हरे-भरे पेड़-पौधे हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश इन पाञ्च तत्वों से ही मनुष्य का जीवन है और जीवन के अंत में भी व्यक्ति को इन्हीं पाञ्च तत्वों में विलीन होना पड़ता है।

प्रदूषण को रोकने के लिए, ये उपाय अपनाए जा सकते हैं – कूड़ा-कचरा उठाकर कूड़ेदान में फेंकें ।  पत्तियों को सड़क पर न उड़ाएं. घास या यार्ड के कचरे को मल्च या खाद में बदलें । फ़र्टिलाइज़र को बारिश से पहले घास पर न डालें | कार या बाहरी उपकरणों को ऐसी जगह धोएं जहां से पानी सड़क पर न बह सके । जल स्त्रोतों में पशुओं को न नहलाए, पूजा के अवशेष फूल इत्यादि नदी, तालाब, झील में डाल कर गंदगी ना करें | कीटनाशियों,कवकनाशियों जैसे निम्नीकरण योग्य पदार्थों का इस्तेमाल करें | खतरनाक कीटनाशियों के इस्तेमाल पर रोक लगाएं | जल स्त्रोतों के पानी को शुद्ध करने पर ध्यान दें | बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में जल शोधन संयंत्र लगाएं | प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करें | पालतू जानवरों के मल को बैग में भरकर कूड़ेदान में डालें | अपने पूल,स्पा या फ़व्वारे के पानी को नाले में न बहाएं बल्कि सिचाई के लिए इस्तेमाल करें | कृषि भूमि पर मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए आवरण फसलों का इस्तेमाल करें | ज़्यादा से ज़्यादा सार्वजनिक परिवहन, साइकिल या पैदल चलें | अगर आप निजी वाहन चलाते हैं, तो कार पूलिंग करें | अगर आपका ऑफ़िस घर से काम करने का विकल्प देता है, तो इसका लाभ उठाएं | बाहर जाने पर पुनः प्रयोज्य वायु मास्क पहनें | घर में तुलसी, एलोवेरा और मनी प्लांट जैसे पौधे लगाएं ये पौधे घर के अंदर की हवा को शुद्ध करते हैं | कुशल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल करें | हमें अपने पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए | आलाव ना जलाये,प्लास्टिक की थैली मे खाना ना रखें |घर के बचे खाने को प्लास्टिक की थैली मे भर कर बाहर ना फेंके गाय प्लास्टिक की थैली समेत  खाती है इससे उसे नुकसान होता है |

सामाजिक समरसता

जब हम सामाजिक समरसता शब्द का उच्चारण करते हैं तो हमारा सामना भारत की भाषाई विविधता या साम्प्रदायिक विविधता से नहीं, बल्कि जातीय असमानता से होता है। हमारे यहां अनेक जातियां हैं, न केवल जातियां हैं बल्कि जातिगत भेदभाव भी है। वह जातिगत भेदभाव कैसे मिटेगा? सामाजिक समरसता शब्द आते ही हम सोचते हैं कि जातिवाद सुनने को मिलेगा, कुछ कहा जाएगा, ऐसा क्यों? तो इसका कारण यह है कि हमारे यहाँ यह इतिहास है। यदि हम ‘जातिगत भेदभाव और उस पर आधारित असमानता’, ‘भेदभावपूर्ण व्यवहार’, ‘सामाजिक समरसता’ जैसे विषय को ठीक से समझना चाहते हैं तो हमें अंग्रेजी में निगेशन जिसे कहते हैं उसे अपने दिमाग से निकालना होगा। हमारे समाज में ऐसा कोई भेदभाव नहीं था, शायद ही ऐसी कोई असमानता हो, मतभेद तो हैं लेकिन असमानता की ऐसी कोई भावना नहीं थी ।

सामाजिक समरसता का अर्थ है – सभी को अपने समान समझना। जातिगत भेदभाव एवं अस्पृश्यता को दूर करना, लोगों में परस्पर प्रेम एवं सौहार्द बढ़ाना,समाज के सभी वर्गों एवं वर्णों के मध्य एकता स्थापित करना ही सामाजिक समरसता है,दोस्तों, परिवार, भागीदारों और पड़ोसियों से जुड़ने से शुरुआत करें। अपने जीवन में किसी भी तरह की असहमति से निपटने के लिए उदारतापूर्वक, 

दयालु तरीके से और अपने समुदाय के लोगों को वापस मुख्य धारा में लाने  पर ध्यान केंद्रित करें। सुनिश्चित करें कि आप व्यक्तिगत सद्भावना भी बनाए रखें, क्योंकि इससे आपको दूसरों के साथ तालमेल करने में मदद मिलेगी। समाज में सभी को समान अधिकार और अवसर मिलना चाहिए। समाज सेवा का कार्य हमें एकजुट करता है। एक बेहतर समाज की परिकल्पना के लिए संवाद व सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है।

कुटुंब प्रबोधन 

यह हमारा परिवार है, यह भारतीय परिवार है। उसका एक कर्तव्य अपने आप को ठीक चलाना है और ऐसे अनेक कर्तव्य को पार करते करते एक अंतिम कर्तव्य उसका यह है की सम्पूर्ण दुनिया के सामने परिवार कैसा होना चाहिए इसका उदाहरण प्रस्तुत करना है। यह करने के लिए क्या करना चाहिए इसका सारा ज्ञान अपनी हजारों वर्षों की प्राचीन परम्परा में से हम तक अक्षुण्ण चला है। सब प्रकार की परिस्थितियों में हमारे लोगों ने वेदकाल के समय से अभी तक अपने परिवार को चलाकर दिखाया है। आज हम लोग जानते है की परिस्थिति बड़ी कठिन है। लोगों को अच्छा रहना कठिन होते जा रहा है। इतने विपरीत प्रभाव आज की परिस्थिति में चाहे अनचाहे, जाने अनजाने क्यों या हो, लेकिन है। परिस्थिति बिगाड़ने के लिए भी प्रयास चलता है। हम जानते हैं, यह कपोलकल्पित कथाए नहीं है। अनेक दशकों तक गुलाम बनाए रखने के लिए पाश्चात्य देशों ने चीन में अफीम भेज कर वहां की युवा पीढ़ी को नशीली बना दिया और उसके पंगुत्व के भरोसे चीन पर राज किया। हमारे यहां आज यही प्रयोग चलता है।

कुटुंब प्रबोधन पर हम  तीन स्तर पर काम कर सकते है। हफ्ते में कम से कम एक दिन परिवार के साथ बैठकर भोजन करें,अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास पर बात करें । दूसरा स्तर है अपने मित्र व रिश्तेदारों  के परिवारों की बैठ कर भोजन करें  सामूहिक चर्चा करे पर विवादों से बचें । हम सभी अपने आसपास के परिवारों के बीच मेलपिलप करें व  बातचीत करे व उनके सुख दुख मे भागीदारी करें ।

स्व का बोध  

हमारे सभी व्यवहार स्व-आधारित होने चाहिए। आत्म-आधारित जीवन का अर्थ है जीवन उपभोग के लिए नहीं है। समृद्धि आवश्यक है लेकिन भ्रष्टाचार नहीं। 

स्वदेशी का मतलब विदेशी सामान इस्तेमाल न करना, इतना आसान नहीं है। विनोबाजी कहते हैं स्वदेशी का अर्थ है आत्मनिर्भरता और अहिंसा। संघ ने इसमें एक चीज़ जोड़ी है: आत्मनिर्भरता, अहिंसा और सादगी। मितव्ययिता से जियो, कंजूसी से नहीं।

अपने व्यवहार,दृष्टिकोण,ताकत,और कमज़ोरियों के बारे में जानकारी होना । इससे दूसरों के प्रति अपने दृष्टिकोण का अनुमान लगाता है । 

आत्म-बोध में आत्म-सम्मान, आत्म-मूल्य, पहचान, और आत्म-छवि शामिल है |आत्म-बोध, मनोविज्ञान के प्रमुख लक्ष्यों में से एक है | दूसरों के साथ बातचीत भी आत्म-बोध को आकार देती है । आत्म-बोध को विकसित करने में अनुभव और दूसरों के साथ बातचीत का इस्तेमाल किया जा सकता है । आत्म-बोध अपनी  विकासशील पहचान से जुड़ा हुआ है | बच्चों को स्वयं के बारे में सकारात्मक भावना विकसित करने में मदद करना,भाषा भोजन व वेश स्वदेशी होनी चाहिए,अपने देश मे निर्मित समान का उपयोग करे | शादी व मांगलिक उत्सव के समय अपनी भाषा में निमंत्रण पत्र छपवाए,अपने मे व मित्रों से अपनी भाषा में बात करें,हॅलो की जगह अपनी मातृ भाषा का उपयोग करें राम-राम,नमस्ते इत्यादि ।

नागरिक कर्तव्य

नागरिक एवं सामाजिक अनुशासन का पालन करना ही स्वतंत्र देश में प्रतिदिन प्रकट होने वाली देशभक्ति है। जब हम स्वतंत्र नहीं थे तो विदेशियों के विरुद्ध आंदोलन करना, उन्हें येनकेन प्रकारेण देश से बाहर निकालने का प्रयास करना, वह देशभक्ति थी। वह तब आवश्यक थी और हमने यह किया। अब देश आजाद हो गया है, अब क्या करें? अब कोई दुश्मन नहीं, सब अपने है। इसलिए स्नेह के आधार पर आपसी व्यवहार और स्वतंत्र देश के संविधान में निर्धारित अनुशासन का पालन किया जाना चाहिए। स्वतन्त्रता-पूर्व युग में देशभक्ति का अर्थ स्वतन्त्रता के लिए सभी प्रकार के आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी था। लेकिन आज देशभक्ति नागरिकों के नागरिक अनुशासन के माध्यम से व्यक्त की जाती है। नागरिक कर्तव्यों का पालन सच्ची देशभक्ति है, क्योंकि यह देश की सुरक्षा, स्थिरता और प्रगति के लिए आवश्यक है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता – कानूनों का पालन करना और राष्ट्रीय सुरक्षा नागरिक कर्तव्य बोध का मतलब है कि नागरिकों को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना चाहिए और उन्हें पूरा करने के लिए ज़िम्मेदार होना चाहिए । नागरिक कर्तव्यों को पूरा करना, सरकार और नागरिकों के बीच होने वाले अनुबंध का सम्मान करना है।

नागरिकों के कर्तव्य कानून द्वारा अनिवार्य नहीं होते, लेकिन इन्हें सामाजिक रूप से अच्छा माना जाता है । इनका उलेख राज्य के नीति निर्देशक तत्व के द्वारा संविधान में है । 

चुनाव में मतदान करना,सामुदायिक सेवा परियोजनाओं में भाग लेना,करों का भुगतान करना,अदालत में गवाह के तौर पर सेवा करना,नियमों का पालन करना,हेलमेट पहनना,कार मे सीट बेल्ट बांधना,सरकारी व सामाजिक संसाधनों व सीमित उपभोग करना ।   

(लेखक जानकारी काल पत्रिका के संपादक व विद्या भारती प्रचार विभाग मेरठ प्रांत के संरक्षक हैं)

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