कर्ता करण ओर कारक – कार्य त्याग के तत्व

 

कर्ता करण ओर कारक – कार्य त्याग के तत्व 

सतीश शर्मा

मनुष्य शरीर वाणी और मन के द्वारा शास्त्र सम्मत अथवा शास्त्र के विरुद्ध जो कुछ भी कार्य आरंभ करता है उसके पांच हेतु होते हैं। अधिष्ठान, कर्ता करण, करणों  की अलग-अलग चेष्टाएं, स्वभाव अथवा अंतकरण के अच्छे बुरे संस्कार क्रिया का वेग और स्वभाव में दोनों एक ही है। परंतु ऐसे पांच हेतु होने के बावजूद भी जो उसे कर्मों के विषय में केवल शुद्ध आत्मा को करता मानता है या देखता है वह व्यक्ति ठीक नहीं है, क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है अर्थात उसने विवेक को महत्व नहीं दिया है।

सब कारकों में कर्ता मुख्य है। कर्ता में चेतन की झलक आती है, अन्य कारकों में नहीं। वास्तव में ‘कर्ता’ नाम चेतनका नहीं है, प्रत्युत चेतन द्वारा जड़से माने हुए सम्बन्धका है-

 प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। 

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।। (गीता ३ । २७)। 

इसलिये भगवान्ने प्रस्तुत श्लोकमें अपने वास्तविक स्वरूप (चेतन)-को कर्ता माननेवालेकी निन्दा की है। स्वरूपमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व – दोनों ही नहीं हैं 

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।

श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥ (गीता १३।३१)। 

मूल में ये नहीं हैं, तभी इनका त्याग होता है। वास्तवमें कर्ता कोई नहीं है। न चेतन कर्ता है, न जड़। यदि किसीको कर्ता मानना ही पड़े तो साधकके लिये यही उचित है कि वह जड़को कर्ता माने। गीता में भगवान्ने कर्मोंके होनेमें पाँच कारण बताये हैं-१-प्रकृति (३।२७, ९३।२९), २-गुण (३।२८, १४।१९), ३-इन्द्रियाँ (५।९), ४-स्वभाव (५।१४, ३।३३), ५- पाँच हेतु (१८।१४)। वास्तवमें कर्मोंके होनेमें मूल कारण एक ‘प्रकृति’ ही है। अतः कर्तृत्व प्रकृतिमें ही है, स्वरूपमें नहीं। साधक खाने-पीने, सोने-जागने आदि लौकिक क्रियाओंको तो विचारद्वारा प्रकृतिमें होनेवाली सुगमतासे मान सकता है, पर वह जप, ध्यान, समाधि आदि पारमार्थिक क्रियाओंको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये मानता है तो यह वास्तवमें साधकके लिये बाधक है। कारण कि ज्ञानयोगकी दृष्टिसे क्रिया चाहे ऊँची-से-ऊँची हो अथवा नीची-से-नीची, वह एक जातिकी (प्राकृत) ही है। लाठी घुमाना और माला फेरना- दोनों क्रियाएँ अलग-अलग होनेपर भी प्रकृतिमें ही हैं। तात्पर्य है कि खाने-पीने, सोने-जागने आदिसे लेकर जप, ध्यान, समाधितक सम्पूर्ण लौकिक-पारमार्थिक क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं। प्रकृतिके सम्बन्धके बिना कोई क्रिया सम्भव ही नहीं है। अतः साधक को चाहिये कि वह पारमार्थिक क्रियाओं का त्याग तो न करे, पर उनमें अपना कर्तृत्व न माने अर्थात् उन्हें अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये न माने। क्रिया चाहे लौकिक हो, चाहे पारमार्थिक हो, उसका महत्त्व वास्तवमें जड़ताका ही महत्त्व है। शास्त्रविहित होनेके कारण पारमार्थिक क्रियाओंका अन्तःकरणमें जो विशेष महत्त्व रहता है, वह भी जड़ताका ही महत्त्व होनेसे साधकके लिये बाधक है। भगवान्‌के लिये की गयी उपासनामें भगवत्कृपाकी प्रधानता

होती है, इसलिये इसमें भी साधकका कर्तृत्व नहीं है। पारमार्थिक क्रियाओंका उद्देश्य परमात्मा होनेसे वे कल्याणकारक हो जाती हैं। ज्यों-ज्यों क्रियाकी गौणता और भगवत्सम्बन्धकी मुख्यता होती है, त्यों-त्यों अधिक लाभ होता है। क्रिया की मुख्यता होने पर वर्षां तक साधन करने पर भी लाभ नहीं होता। अतः क्रिया का महत्त्व न होकर भगवान्में प्रियता होनी चाहिये। प्रियता ही भजन है, क्रिया नहीं।

 

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