महात्मा गांधी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 

महात्मा गांधी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ   

महात्मा गांधी सन् 1934 में वर्धा में आयोजित संघ शिविर में 

सतीश शर्मा

यह बात सन् 1934 में वर्धा में आयोजित संघ शिविर की है।  इस शिविर-स्थान के पास ही महात्मा गांधी जी का उस काल का सत्याग्रह आश्रम था।  नित्य प्रातः घूमने के लिए जाते समय इन्हें शिविर की व्यवस्था में संलग्न स्वयंसेवक दिखाई देते थे।  उनके मन में सहज ही उत्सुकता हुई कि यहां कौन सी परिषद् या सम्मेलन होने वाला है।  22 दिसम्बर को शिविर का उद्घाटन हुआ।  शिविर में गणवेशधारी स्वयंसेवकों के कार्यक्रम हुए, घोष की गर्जना होने लगी, महात्मा जी ने अपने बंगले पर से इन सब कार्यक्रमों को देखा, उन्होंने शिविर देखने की इच्छा प्रकट करते हुए अपने सहयोगी महादेव भाई देसाई द्वारा शिविर के मुख्य संचालक को संदेश भिजवाया।  संदेश मिलते ही शिविर के संचालक अप्पाजी जोशी आश्रम में गए और महात्मा जी से कहा ‘आप अपनी सुविधा के अनुसार समय बता दीजिए, हम उसी समय आपका स्वागत करेंगे’।  महात्मा जी का उस दिन मौनव्रत था. अतः उन्होंने लिखकर बताया ‘मैं कल प्रातः 6 बजे शिविर में आ सकूंगा, वहां डेढ़ घंटा व्यतीत करूंगा’। 

दूसरे दिन प्रातः ठीक 6 बजे महात्मा जी शिविर में आए, उस समय सभी स्वयंसेवकों ने अनुशासनपूर्वक उनकी मान वंदना की. महात्मा जी के साथ महादेव भाई देसाई, मीराबेन तथा आश्रम के अन्य व्यक्ति भी थे।  उस भव्य दृश्य को देखकर महात्मा जी ने अप्पाजी जोशी के कंधे पर हाथ रखकर कहा ‘मैं सचमुच प्रसन्न हूं, सम्पूर्ण देश में इतना प्रभावी दृश्य अभी तक मैंने नहीं देखा’।  इसके बाद गांधी जी ने पाकशाला का निरीक्षण किया. उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि 1500 स्वयंसेवकों का भोजन 1 घंटे में बिना किसी गड़बड़ के तैयार हो जाता है, 1 रुपया तथा थोड़े से अनाज में दो समय का भोजन दिया जाता है और घाटा हुआ तो स्वयंसेवक ही उसे पूरा कर देते हैं। 

इसके उपरांत उन्होंने रुग्णालय तथा स्वयंसेवकों के निवास भी देखे। रुग्णालय में रोगियों के हालचाल पूछते हुए उन्हें यह भी पता चला कि संघ में गांव के किसान तथा मजदूर वर्ग के स्वयंसेवक भी हैं। 

ब्राह्मण, म्हार, मराठा आदि सभी जातियों के स्वयंसेवक एक साथ घुलमिल कर रहते हैं और एक ही पंक्ति में भोजन करते हैं। यह जानकर उन्होंने तथ्यों की जांच पड़ताल करने के उद्देश्य से कुछ स्वयंसेवकों से प्रश्न भी किए. स्वयंसेवकों के उत्तर में उन्हें यही मिला कि ‘ब्राह्मण, मराठा, दर्जी आदि भेद हम संघ में नहीं मानते, अपने पड़ोस में किस जाति का स्वयंसेवक है, इसका हमें पता भी नहीं चलता तथा यह जानने की हमारी इच्छा भी नहीं होती।  हम सब हिन्दू हैं और इसीलिए भाई है। परिणामस्वरूप व्यवहार में ऊंच-नीच मानने की कल्पना ही हमें समझ में नहीं आती’। 

इस पर महात्मा जी ने अप्पाजी जोशी से प्रश्न किया ‘आपने जाति भेद की भावना कैसे मिटा दी? इसके लिए हम लोग तथा अन्य कई संस्थाएं जी जान से प्रयत्न कर रहे हैं, परन्तु लोग भेद-भाव नहीं भूलते, आप तो जानते ही हैं कि अस्पृश्यता नष्ट करना कितना कठिन है, यह होते हुए भी आपने संघ में इस कठिन कार्य को कैसे सिद्ध कर लिया? इस पर अप्पाजी जोशी का उत्तर था ‘सब हिन्दुओं में भाई-भाई का सम्बन्ध है, यह भाव जागृत होने से सब भेदभाव नष्ट हो जाते हैं। भ्रातृभाव शब्दों में नहीं आचरण में आने पर ही यह जादू होता है। इसका सम्पूर्ण श्रेय संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार को है’। इसी समय घोष वादन हुआ और सभी स्वयंसेवक सीधे ‘दक्ष’ में खड़े हो गए और ध्वजारोहण हुआ।  ध्वजारोहण होने पर अप्पाजी के साथ महात्मा जी ने भी ध्वज को प्रणाम किया। 

महात्मा जी शिविर के अंतर्गत प्रायः सभी विभागों में गए और सारे कार्य की जानकारी प्राप्त की । 

शेष अगले अंक में ,,,,,

( साभार विश्व संवाद केंद्र भारत )

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