परिवर्तनी एकादशी की कथा

परिवर्तनी एकादशी

सतीश शर्मा

परिवर्तनी एकादशी को प‌द्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह श्रीलक्ष्मी जी का परम आह्लादकारी व्रत है। यह भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषशैय्या पर शयन करे हुए करवट बदलते हैं। इसीलिये इसे करवटनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा करना उत्तम माना जाता है, क्योंकि देवताओं ने अपने राज्य को फिर से पाने के लिये महालक्ष्मी का ही पूजन किया अर्चना की थी।

परिवर्तनी एकादशी वाले दिन क्या दान करें

अनाज और भोजन – परिवर्तिनी एकादशी के दिन अनाज और भोजन का दान करना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन कराने या चावल, दाल, और गेहूं आदि चीजों का दान करने से भगवान विष्णु खुश होते हैं और घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती।

पीले वस्त्र – भगवान विष्णु को पीला रंग बहुत प्रिय है। इसलिए परिवर्तिनी एकादशी के दिन पीले वस्त्रों का दान करना बहुत अच्छा होता है। ऐसा करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता आती है और आर्थिक संकट दूर होते हैं।

फल – इस दिन मौसमी फल का दान करना भी बहुत लाभकारी होता है। इस दान से अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि का वरदान मिलता है।

तिल – तिल का दान करने से शनि दोष से मुक्ति मिलती है और जीवन में स्थिरता आती है। यह दान आध्यात्मिक और भौतिक सुखों को बढ़ाता है।

गाय – गाय का दान, जिसे गो-दान भी कहते हैं, सभी दानों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। अगर आप गाय का दान नहीं कर सकते, तो गाय को चारा खिलाने जैसे अच्छे काम कर सकते हैं।

घी और शहद – परिवर्तिनी एकादशी पर घी और शहद का दान करने से घर में खुशहाली आती है और जीवन में मिठास बनी रहती है।

परिवर्तनी एकादशी की कथा

त्रेता युग में प्रहलाद का पौत्र राजा राज्य करता था। वह ब्राह्मणों का सेवक तथा भगवान विष्णु का उपासक था और इन्द्र आदि सभी देवताओं का शत्रु था। अपने बल के कारण उसने देवताओं पर विजय प्राप्त करली और इन्द्र से इन्द्रासन छीन कर देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। देवताओं को दुखी देखकर भगवान ने बामन का वेष धारण करके बलि के द्वार पर आकर भिक्षा मांगते हुए कहा- “हे राजन मुझे केवल तीन पग भूमि का दान चाहिए।” राजा बलि ने उत्तर दिया- “मैं आपको तीन लोक दे सकता हूँ, विराट रूप धारण करके नाप लो।” बामन (भगवान) ने विराट रूप धारण किया और दो पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया। जब उन्होंने तीसरा पग उठाया तो बलि ने सिर नीचे धर दिया। प्रभु ने चरण धरकर दबाया तो बलि पाताल लोक में जा पहुंचा। जब भगवान चरण उठाने लगे तो बलि ने हाथ पकड़कर कहा- “मै इन्हें मन्दिर में रखूंगा।” भगवन बोले- “यदि तुम बामन एकादशी का पूर्ण विधि पूर्वक व्रत करो तो मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा और मैं तुम्हारे द्वार पर कुटिया बनाकर रहूँगा।” आज्ञानुसार राजा बलि ने बामन एकादशी का व्रत विधि पूर्वक किया। और तभी से भगवान की एक प्रतिमा द्वारपाल बनकर पाताल में और एक क्षीरसागर में निवास करने लगे।

 

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