द बंगाल फाइलस

द बंगाल फाइलस  

मिथलेश कुमार

कल एक विशेष प्रीमियर में यह फिल्म देखी… यह झकझोर देने वाली फिल्म है। इसका प्रस्तुतीकरण सचमुच स्तब्ध कर देने वाला है।  

फिल्म के प्रीमियर पर निर्माता निर्देशक ने बताया “यह फिल्म हिंदू जनसंहार (Hindu Genocide) पर आधारित है। विश्व इतिहास में यह अपने आप में एक अद्वितीय उदाहरण है, जहाँ लगभग 1200 वर्षों तक एक समुदाय, जिसे आज बहुसंख्यक माना जाता है, लगातार उत्पीड़न और दमन का शिकार रहा। विशेष बात यह है कि यह उत्पीड़न तथाकथित “अल्पसंख्यकों” (Minorities) के हाथों हुआ।” फिर भी, इस ऐतिहासिक सच्चाई को वह स्वर और पहचान कभी नहीं मिल पाई, जिसकी यह हक़दार थी। पश्चिमी दुनिया (Western World) हिंदुओं के जनसंहार को मान्यता नहीं देती, क्योंकि उनके बौद्धिक ढांचे (conceptual framework) में यह कल्पना ही मौजूद नहीं है कि किसी “अल्पसंख्यक” समुदाय द्वारा “बहुसंख्यक” समुदाय का दमन या उत्पीड़न किया जा सकता है। उनके लिए यह हमेशा एकतरफ़ा परिभाषा है—बहुसंख्यक ही अल्पसंख्यक को दबाता है। इसी कारण पश्चिमी अकादमिक और राजनीतिक विमर्श नए-नए नैरेटिव गढ़ता है—जैसे Islamophobia या Dismantling Hindutva—ताकि वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं से ध्यान हटाया जा सके। जस्टिस जी. डी. खोसला की पुस्तक “Stern Reality”, जिसे सच्चिदानंद चतुर्वेदी ने हिंदी में “देश विभाजन का खूनी इतिहास” नाम से अनूवादित किया है, लगभग 15–20 वर्ष पहले पढ़ी थी। उस पुस्तक को पढ़कर मैं अत्यंत विचलित हो गया था।  

1947 में (आज के बांग्लादेश) नोआखली का कत्लेआम, कोलकाता के डायरेक्ट एक्शन डे से कहीं अधिक भीषण था। वहाँ लगभग सभी हिंदुओं को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य किया गया। जिन्होंने धर्म परिवर्तन स्वीकार नहीं किया, उन्हें नृशंस रूप से मौत के घाट उतार दिया गया। कोई भी हिंदू स्त्री बलात्कार की भयावहता से बची नहीं। हज़ारों स्त्रियों को बलात्कार के बाद भी निर्दयतापूर्वक मार डाला गया। पतियों, पिताओं और बेटों के सामने ही महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किए गए। छोटे-छोटे बच्चों तक पर ऐसे अमानवीय अत्याचार ढाए गए कि उन्हें शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।  

नोआखली नरसंहार का मुख्य सरगना गुलाम सरवर था, जो पाँच वक्त का नमाज़ी था। मुस्लिम नेशनल गार्ड के गुंडे हिंदुओं के कटे हुए सिर उसे भेंट स्वरूप प्रस्तुत किया करते थे। कुएँ, नाले और गलियाँ हिंदुओं के सड़े-गले शरीर और अंगों से भर गई थीं। पूरे नोआखली क्षेत्र में बिखरे शवों की दुर्गंध महीनों तक फैली रही। इन सड़ते शवों पर गिद्ध, चील और कुत्ते लंबे समय तक दावत उड़ाते रहे।  

भारत विभाजन पर लिखी अनेक पुस्तकों में मैंने नोआखली नरसंहार से संबंधित घटनाएँ पढ़ीं। किन्तु राजेंद्र लाल रायचौधरी के परिवार के साथ जो कुछ घटा, उसका हृदयविदारक विवरण जस्टिस खोसला ने एक प्रत्यक्षदर्शी की गवाही के आधार पर लिखा है। वह दृश्य शब्दों और चित्रण से परे है, परंतु निर्देशक ने उसे फिल्म में दर्शाने का साहसिक प्रयास किया है।  

नोआखली नरसंहार के समय शरद पूर्णिमा की रात, राजेंद्र लाल रायचौधरी के घर पर गुलाम सरबर का आक्रमण और उनका निर्मम संघर्ष – इन दृश्यों की पृष्ठभूमि में बजता प्रसिद्ध बंगला गीत “धन्य धान्ये पुष्पे भरा….!” वातावरण को और भी अधिक स्तब्धकारी और रोमांचक बना देता है।  

फिल्म का कथानक और निर्देशन अत्यंत प्रभावशाली है। केंद्रीय पात्र “भारती बनर्जी” के माध्यम से पूरी कथा आगे बढ़ती है।  

– मिथुन चक्रवर्ती और पल्लवी जोशी की अभिनय-क्षमता अनुपम है, उनका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं।  

– परंतु कुछ अन्य कलाकार भी अपने पात्रों से गहरी छाप छोड़ते हैं –  

  1. देवेंदु भट्टाचार्य – राजेंद्र लाल रायचौधरी  
  2. सस्वता चटर्जी – सरदार हुसैनी  
  3. प्रियांशु चटर्जी – जस्टिस बनर्जी  
  4. नमाशी चक्रवर्ती – गुलाम सरवर  

इन सभी कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों को चौंकाया और फिल्म को बेहद प्रबल बनाया है।  

Vivek Ranjan Agnihotri जी निरंतर ऐसी विचारोत्तेजक फिल्में बनाकर समाज के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं—वे वास्तव में सराहना और बधाई के पात्र हैं।  

यह फिल्म केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। हर भारतीय को इसे अवश्य देखना चाहिए।

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