करवा चौथ की कथा व भारतीय संस्कृति में सोलह श्रृंगार की महिमा

करवा चौथ

सतीश शर्मा

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करवा चौथ व्रत को पति की लंबी आयु, सुहाग की रक्षा और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए रखा जाता है। करवा चौथ की कहानी एक वीरवती नाम की पत्नी की है, जिसने अपने पति की लंबी आयु के लिए कार्तिक मास की चतुर्थी पर व्रत किया था। एक अन्य कथा के अनुसार, करवा नाम की एक महिला ने मगरमच्छ से अपने पति को बचाया था और यमराज से उन्हें जीवनदान दिलाया, जिससे करवा चौथ व्रत का प्रचलन हुआ। 

साहूकार की बेटी और करवा चौथ की कथा – बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहां तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी।शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्य देकर ही खासकती है। चूंकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चांद उदित हो रहा हो।इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चांद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चांद को देखती है, उसे अर्घ्य देकर खाना खाने बैठ जाती है।वह पहला टुकड़ा मुंह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तोउसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुंह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है।उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गएहैं और उन्होंने ऐसा किया है।सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व सेउन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है।एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियां करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियां उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वहप्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है।इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभीउसे बताती है कि चूंकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नीमें ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना औरजब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कहकर वह चली जाती है।सबसे अंत में छोटी भाभी आती है।करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करनेके लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिनकरवानहीं छोड़ती है।अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अंगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुंह में डाल देती है।करवाका पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा सेउसकी छोटी भाभी के माध्यम सेकरवाको अपना सुहाग वापस मिलजाता है।हे श्री गणेश-मां गौरी जिस प्रकारकरवाको चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

एक अन्य कहानी के अनुसार, करवा नाम की एक देवी थी, जिन्होंने अपने पति के प्राण यमराज से बचाए थे। एक बार करवा का पति नदी किनारे गया था, तो एक मगरमच्छ ने उसे पकड़ लिया था। 

करवा ने मगर को कच्चे धागे से बांधा और यमराज से अपने पति को जीवनदान देने की प्रार्थना की। 

करवा के दृढ़ निश्चय और पति के प्रति अटूट प्रेम को देखकर यमराज ने मगर को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को लंबी आयु का वरदान दिया। तभी से करवा चौथ का व्रत पति की लंबी आयु और अखण्ड सुहाग के लिए किया जाता है। 

ऐसी मान्यता है कि करवा चौथ पर महिलाओं को 16 श्रृंगार करना चाहिए।  इससे घर में सुख और समृद्ध‍ि आ‍ती है और अखंड सौभाग्य का वरदान भी मिलता है। यही वजह है कि भारतीय संस्कृति में सोलह श्रृंगार को जीवन का अहम और अभिन्न अंग माना गया है । करवा चौथ पर आप ये सोलह श्रृंगार जरूर करें।  जानिये 16 श्रृंगार में कौन-कौन से श्रृंगार आते हैं. ऋग्वेद में भी सौभाग्य के लिए सोलह श्रृंगारों का महत्व बताया गया है । 

  1. बिंदी – संस्कृत भाषा के बिंदु शब्द से बिंदी की उत्पत्ति हुई है।  भवों के बीच रंग या कुमकुम से लगाई जाने वाली बिंदी भगवान शिव के तीसरे नेत्र का प्रतीक मानी जाती है।  सुहागिन स्त्रियां कुमकुम या सिंदूर से अपने ललाट पर लाल बिंदी लगाना जरूरी समझती हैं। इसे परिवार की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
    2. सिंदूर – उत्तर भारत में लगभग सभी प्रांतों में सिंदूर को स्त्रियों का सुहाग चिन्ह माना जाता है और विवाह के अवसर पर पति अपनी पत्नी के मांग में सिंदूर भर कर जीवन भर उसका साथ निभाने का वचन देता है।
    3. काजल – काजल आंखों का श्रृंगार है, इससे आंखों की सुन्दरता तो बढ़ती ही है, काजल दुल्हन और उसके परिवार को लोगों की बुरी नजर से भी बचाता है।
    4. मेहंदी – मेहंदी के बिना सुहागन का श्रृंगार अधूरा माना जाता है. शादी के वक्त दुल्हन और शादी में शामिल होने वाली परिवार की सुहागिन स्त्रियां अपने पैरों और हाथों में मेहंदी रचाती हैं, नववधू के हाथों में मेहंदी जितनी गाढ़ी रचती है, उसका पति उसे उतना ही ज्यादा प्यार करता है।
    5. लाल जोड़ा – उत्तर भारत में आमतौर से शादी के वक्त दुल्हन को शादी का लाल जोड़ा पहनाया जाता है, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में फेरों के वक्त दुल्हन को पीले और लाल रंग की साड़ी पहनाई जाती है, महाराष्ट्र में हरा रंग शुभ माना जाता है और वहां शादी के वक्त दुल्हन हरे रंग की साड़ी मराठी शैली में बांधती हैं, करवा चौथ पर भी सुहागिनों को लाल जोड़ा या शादी का जोड़ा पहनने का रिवाज है।
    6. गजरा – दुल्हन के जूड़े में जब तक सुगंधित फूलों का गजरा न लगा हो तब तक उसका श्रृंगार फीका सा लगता है. दक्षिण भारत में तो सुहागिन स्त्रियां प्रतिदिन अपने बालों में हरसिंगार के फूलों का गजरा लगाती है,करवा चौथ पर किए जाने वाले 16 श्रृंगार में से एक गजरा भी है।
    7.मांग टीका – सिंदूर के साथ पहना जाने वाला मांग टीका जहां एक ओर सुंदरता बढ़ाता है, वहीं वह सौभाग्य का भी प्रतीक माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि नववधू को मांग टीका सिर के ठीक बीचों-बीच इसलिए पहनाया जाता है कि वह शादी के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले और वह बिना किसी पक्षपात के सही निर्णय ले सके।
    8. नथ – ऐसी मान्यता है कि सुहागिन स्त्री के नथ पहनने से पति के स्वास्थ्य और धन-धान्य में वृद्धि होती है, इसलिए करवा चौथ के अवसर पर नथ पहनना न भूलें।
    9. कर्णफूल या कान की बालियां – सोलह श्रृंगार में एक आभूषण कान का भी है, करवा चौथ पर अपना कान सूना ना रखें. उसमें सोने की बालियां जरूर पहनें।
    10. हार या मंगलसूत्र – दसवां श्रृंगार है मंगलसूत्र या हार, सुहागिनों के लिए मंगलसूत्र और हार को वचनबद्धता का प्रतीक माना जाता है. सौभाग्य का भी प्रतीक माना जाता है।
    11. आलता – नई दुल्हनों के पैरों में आलता देखा होगा आपने. इसका खास महत्व है।  16 श्रृंगार में एक ये श्रृंगार भी जरूरी है करवा चौथ के दिन।
    12. चूड़ियां – सुहागिनों के लिए सिंदूर की तरह ही चूड़ियों का भी महत्व है।
    13. अंगूठी – अंगूठी को 16 श्रृंगार का अभिन्न हिस्सा माना गया है।
    14. कमरबंद – कमरबंद इस बात का प्रतीक है कि सुहागन अब अपने घर की स्वामिनी है।
    15. बिछुआ – पैरों के अंगूठे में रिंग की तरह पहने जाने वाले इस आभूषण को अरसी या अंगूठा कहा जाता है और दूसरी उंगलियों में पहने जाने वाले रिंग को बिछुआ।
    16. पायल – माना जाता है कि सुहागिनों का पैर खाली नहीं होना चाहिए। उन्हें पैरों में पायल जरूर पहनना चाहिए

 

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