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संघ तपस्वी 

संघ विस्तार में ध्येय जीवन समर्पित भावना। दिव्य लक्ष्य तक पहुंचने की अनुपम कामना ।। 1950 में अजमेर संघ शिक्षा वर्ग के बाद प्रांत प्रचारक ने सभी प्रचारकों से कहा कि अब प्रचारक व्यवस्था समाप्त की जा रही है, अतः सब घर वापस लौट जाएँ ! इस सूचना के बाद कुछ प्रचारक गुरूजी से मिले और पूछा कि गुरूजी आप शादी कब कर रहे हैं ? इस प्रश्न से गुरूजी असमंजस में पड गए और बोले कि मैं शादी क्यूं करूँगा भला ? इस पर प्रचारकों ने कहा कि जब आप गृहस्थ नहीं बन सकते तो फिर हमसे यह अपेक्षा क्यों ? सारी स्थिति समझकर गुरूजी ने उन्हें समझाया कि संघ की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह प्रचारकों के प्रवास व्यय को भी वहन कर सके ! इसके बाद निर्णय हुआ कि जो लोग स्वयं व्यवस्था कर संघ कार्य कर सकते हैं, वे रहें , शेष वापस घर जाएँ ! तभी बाबा साहब नातू और राजाभाऊ महाकाल ने सोनकच्छ में चाय की दूकान चलाई और दिगंबर राव तिजारेजी ने उज्जैन के विनोद मिल में स्वीपर की नौकरी की ! वहीं उनका पहला परिचय हुआ – दत्तात्रय गंगाधर कस्तूरे उपाख्य भैयाजी कस्तूरे से ! माता पिता बचपन में ही चल बसे ! इन्हें व बड़े भाई दिगंबर कस्तूरे को चाचा साथ तो ले आये पर निभा नही पाए ! विवश दोनों भाई अनाथ स्थिति में हो गए ! तिजारे जी स्वयं केवल दूसरी कक्षा तक ही पढ़े थे ! किन्तु उन्होंने इन दोनों से कहा कि मैं तो नही पढ़ पाया किन्तु तुम लोग पढ़ो और सुयोग्य बनकर देश की सेवा करो ! तुम्हारा व्ययभार मैं उठाऊंगा ! पढाई पूरीकर दोनों भाई संघ प्रचारक बने ! बड़े दिगंबर तो कुछ समय बाद महामंडलेश्वर अखंडानंद सरस्वती के रूप में परिवर्तित हुए, किन्तु भैयाजी आजीवन प्रचारक रहे ! ऐसे लाखों स्वयंसेवकों के जीवन ही संघ शक्ति के केंद्र है ।

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