रक्षाबंधन का पर्व रक्षा के संकल्प का पर्व है
रक्षा बंधन का वास्तविक अर्थ--वर्षों से चले आ रहे रक्षाबंधन त्योहार को हम मनाते तो आ रहे हैं किंतु हम में से कितने लोग हैं जो उसके वास्तविक स्वरूप और महत्व को जानते हैं।आज इस त्योहार को अधुनिकता के रंग में रंग कर कही हम अपने ही विरासत को भूल तो नही रहे,यह जानने के लिये आइए आज इस कथा को ध्यान से पढ़ें।
येन बद्धो बलि राजा,दान वेंद्रो महाबलः,तेन त्वाम अनुबंधनावमि, रक्षे माचल मा चल।।
इस सूक्ति का अर्थ है जिस से दानवीर महाबलशाली राजा बलि बंधे,उस रक्षा सूत्र से मैं आपको बांध रहा या रही हूं।यह अडिग होकर तुम्हारी रक्षा करे।इस मंत्र के अंतिम भाग में मानवीय संवेदना और आत्मीयता के उच्च शिखर की प्रस्तुति है कि बांधने और बंधने वाले दोनों की रक्षा एवं कल्याण हो फिर चाहे वो कोई बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांध रही है | पुरोहित अपने जजमान को कलावा,दोनों में ही रक्षा एवं कल्याण निहित है। दैत्यराज वैरोचन बलि भगवान विष्णु के भक्त थे । पराक्रमी इतने कि तीनों लोकों पर एक तरह से आधिपत्य स्थापित कर लिया था । गुरु शुक्राचार्य की प्रेरणा से शताश्वमेध यज्ञों की श्रृंखला पूरी करने के क्रम में जब अंतिम अश्वमेध यज्ञ करना शेष रह गया था तो देवताओं ने भगवान विष्णु से याचना कर देवलोक को दैत्यराज के प्रभुत्व से बचा लेने की कामना की । तब भगवान विष्णु ने ‘ वामन रूप ‘ (बौना आकार) धारण कर दैत्यराज बलि से ‘तीन पग’ भूमि दान में मांगी । राजा बलि द्वारा दान दिया जाना स्वीकार कर लेने पर ‘वामनरूप’ भगवान विष्णु ने जब पहले ही पग में पूरा मर्त्य लोक (भूमण्डल), दूसरे पग में पूरा आकाश लोक नाप लिया तो राजा बलि समझ गए कि ये ‘वामनदेव’ कोई और नहीं, स्वयं भगवान विष्णु हैं जो मेरी परीक्षा ले रहे हैं । अतः उन्होंने स्वयं को प्रस्तुत करते हुए तीसरा पग अपने सिर पर रखवा लिया । फिर भगवान से याचना की कि ‘ अब मेरा सब कुछ तो चला ही गया है, प्रभु ! आप मेरी विनती स्वीकारें और मेरे साथ पाताल में चल कर रहें । ‘ भक्त की बात मानकर भगवान विष्णु ‘ बैकुण्ठधाम ‘ छोड़ कर ‘ पाताल लोक ‘ में रहने लगे । लम्बे समय तक बैकुण्ठधाम से भगवान विष्णु को अनुपस्थित पाकर देवी लक्ष्मी को चिन्ता हुई । तदनन्तर नारद जी से भगवान विष्णु के पाताल लोक में होने तथा राजा बलि से शर्तबद्ध होने की सूचना पाकर लक्ष्मी जी ने स्वयं पाताल लोक जाकर भगवान विष्णु को वापस लाने का निश्चय किया । वे एक गरीब महिला का रूप धारण कर राजा बलि के सामने पहुंचीं । राजा बलि ने उन्हें पूरे आदर के साथ अपनी बहन मानते हुए अपने महल में रख लिया । ‘श्रावण पूर्णिमा ‘ के दिन लक्ष्मी जी ने राजा बलि की कलाई में ‘रक्षा-सूत्र ‘ बांधा । राजा बलि द्वारा कुछ देने की इच्छा व्यक्त किये जाने पर लक्ष्मी जी अपने वास्तविक रूप में आ गईं और उन्होंने कहा कि ” यदि आप कुछ देना ही चाहते हैं तो मेरे स्वामी भगवान विष्णु को मुझे दे दीजिए । ” इस पर राजा बलि ने धर्मपथ पर चलते हुए भगवान विष्णु को लक्ष्मी जी के साथ जाने दिया । चलते समय भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान देते हुए कहा कि ” वर्ष में चार माह मैं तुम्हारे साथ पाताल में निवास करूंगा । ” इसी कारण से भगवान विष्णु प्रतिवर्ष चार माह पाताल लोक में निवास करते हैं जिसे ‘चातुर्मास’ के नाम से जाना जाता है, जो आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से प्रारम्भ होकर कार्तिक शुक्ल दशमी तक चलता है तथा इसके अगले दिन यानी कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थान एकादशी) से भगवान विष्णु पुनः अपने बैकुण्ठधाम में विराजमान हो जाते हैं । लक्ष्मी जी द्वारा ‘श्रावण पूर्णिमा’ के दिन राजा बलि को ‘रक्षा-सूत्र’ बांधे जाने के कारण ही इस दिन ” रक्षाबंधन ” का पर्व मनाये जाने की परम्परा है । ‘ रक्षा-सूत्र ‘ बांधने का जो विधान है, उसके अनुसार शुद्ध रेशमी या सूती कपड़े के टुकड़े में अक्षत, रोली, चंदन, केसर व दूब डाल कर इसे कच्चे धागे से बने ‘रक्षा-सूत्र’ में बांध देते हैं तथा इस ‘रक्षा-सूत्र’ (राखी) को “येन बद्धो बलि राजा …” मंत्र के उच्चार के साथ बहनें भाई को रक्षा-सूत्र बांधती हैं । पुरोहित द्वारा यजमान को रक्षा-सूत्र बांधने की भी यही प्रक्रिया है । लेकिन समय की गति के साथ ‘फैशन’ की अंधी दौड़ ने ‘रक्षाबंधन ‘ के इस पवित्र पर्व पर भी अपना प्रभाव डालना शुरू कर दिया और ‘कच्चे धागे’ का ये बन्धन अपना स्वरूप बदलता हुआ तरह-तरह की माॅडर्न फैशनेबल राखियों के रूप में बाजार में छा गया । ‘सांस्कृतिक मूल्यों’ पर ‘बाजार की संस्कृति’ हावी होती चली गई । ‘धार्मिक विधान’ किनारे कर किसके हाथ पर कितनी सुंदर व कितनी महंगी राखी है, बड़प्पन मापने का यह पैमाना होता चला गया और इसी उपभोक्तावादी संस्कृति का लाभ उठाकर विदेशी, खासकर चाइनीज़ कम्पनियां हावी होती चली गईं और इनके माल (राखी व अन्य उपहार सामग्रियाँ) से भारतीय बाजार पट गए । बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रही, रक्षाबंधन की ‘मूल भावना’ में भी परिवर्तन आता गया । कभी राखी बांधने तथा बंधवाए जाने की सोच का जो निहितार्थ एक-दूसरे की रक्षा की भावना हुआ करता था, अब राखी के बदले दिए जाने वाले ‘उपहार’ तथा उसकी ‘कीमत’ के रूप में देखा जाने लगा । कौन अपनी बहन को कितने ज्यादा रुपए या कितना कीमती उपहार देता है, इससे उसकी हैसियत मापी जाने लगी । बहनें भी मूल्यवान उपहार पाने की अपेक्षा करने लगीं तथा सहेलियों के बीच यह बात वार्तालाप का विषय होने लग गया कि किसके भाई ने अपनी बहन को क्या दिया । सच मानिये, हम रक्षाबंधन पर्व की मूल भावना से ही भटक गए। तो आइए, हम संकल्प लें कि इस रक्षाबंधन से हम पुनः अपनी भारतीय परम्परा व संस्कृति के अनुसार पूरे उल्लास व उमंग के साथ ‘कच्चे धागों की राखी’ को धर्मसम्मत विधान के अनुरूप बांधना / बंधवाया जाना शुरू करेंगे तथा एक-दूसरे की रक्षा का संकल्प लेते हुए अपनी गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ायेंगे। मन से एक दूसरे की रक्षा का संकल्प भी ले और उस में सहायक भी सिद्ध हों।
इस मंत्र का सामान्यत: यह अर्थ लिया जाता है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। धर्मशास्त्र के विद्वानों के अनुसार इसका अर्थ यह है कि रक्षा सूत्र बांधते समय ब्राह्मण या पुरोहत अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं। इसके बाद पुरोहित रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना। इस प्रकार रक्षा सूत्र का उद्देश्य ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को धर्म के लिए प्रेरित एवं प्रयुक्त करना है।” रक्षाबंधन का पर्व रक्षा के संकल्प का पर्व है, जिसमें भाई बहन से राखी बंधवाते समय उसकी रक्षा करने का संकल्प लेता है. लेकिन सिर्फ भाई को ही नहीं, बल्कि बहन को भी भाई की रक्षा करने का संकल्प लेना चाहिए। उसे भी भाई के लिए कठिन समय में उसकी रक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए । कहा जाता है कि युद्ध के लिए जाने से पहले रक्षा के लिए राजा और उनके सैनिकों के हाथों में उनकी पत्नी और बहनें अनिवार्य रूप से राखी बांधा करती थी। ऐसी मान्यता है कि राखी बांधने से भाइयों के उपर आने वाला संकट टल जाता है। जैसा कि आप जानते हैं कि सावन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है.है कि युद्ध के लिए जाने से पहले रक्षा के लिए राजा और उनके सैनिकों के हाथों में उनकी पत्नी और बहनें अनिवार्य रूप से राखी बांधा करती थी. ऐसी मान्यता है कि राखी बांधने से भाइयों के उपर आने वाला संकट टल जाता है।
.एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा खून की धार बह निकली। यह सब द्रौपदी से नहीं देखा गया और उसने तत्काल अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण के हाथ में बांध दिया फलस्वरूप खून बहना बंद हो गया। कुछ समय पश्चात जब दुःशासन ने द्रौपदी की चीरहरण किया तब श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ाकर इस बंधन का उपकार चुकाया। हिन्दू धर्म के अनुसार दाहिने हाथ से किए गए दान, धर्म को भगवान स्वीकार करते हैं इसलिए दायीं कलाई में राखी बांधने की परंपरा,रक्षाबंधन से संबंधित अनेक कथाएं हैं। रक्षा बंधन के दिन सुबह भाई-बहन स्नान करके भगवान की पूजा करते हैं। इसके बाद रोली, अक्षत, कुमकुम एवं दीप जलकर थाल सजाते हैं। इस थाल में रंग-बिरंगी राखियों को रखकर उसकी पूजा करते हैं फिर बहनें भाइयों के माथे पर कुमकुम, रोली एवं अक्षत से तिलक करती हैं व रक्षा सूत्र बांधती है।
रक्षाबंधन
30-08-2022
चौघड़िया मुहर्त – 10-45 से 12-21 तक सबेरे
राहू काल 12-21 से 13-57 तक
प्रयास करे की 18-00 से 21-05 तक इस समय मे राखी न बांधे,
21-05 से अगले दिन तक रक्षा सूत्र हम कभी भी बांध सकते है।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी
9312002527






