आओ नवयुग की प्रतिमा में करें प्रतिष्ठा प्राण की।
सतीश शर्मा, संयोजक भारतीय इतिहास व ज्योतिष अनुसंधान संस्थान
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः । सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥
तेरा तेरा मेरा मेरा तू मर जाए सारा मेरा, कौवा कौवा स्याही ला दो आने की स्याही ला आधी तेरी आधी मेरी, तू मर जाए सारी मेरी। कब तक इस प्रकार के विमर्श में हम उलझते रहेंगे, तू तेरा कर मैं मेरा कर रहा हूं हम सब इस भावना के साथ, हम क्यों नहीं आगे बढ़ सकते। आओ नवयुग के प्रतिमा में करें प्रतिष्ठा प्राण की। हम सब मिलकर विश्व बंधुत्व की तरफ एक कदम आगे बढ़े। सहजता सरलता और समानता के साथ जब हम आगे बढ़ेंगे तो विश्व में विकास की एक नई उम्मीद जागेगी, गरीबी और भेदभाव जैसे अनेकों अवगुण जड़ मूल से नष्ट हो जाएंगे।
कुछ शब्दों के अर्थ हमे एक बार दोबारा से खोजने पड़ेंगे और उनको सबको समझना पड़ेगा |
धर्म,पंथ,गुटनिरपेक्षता,धर्मनिरपेक्षता,पंथनिरपेक्षता,राजनीतिक, आध्यात्मिक,सामाजिक ऐसे अनेकों शब्द है जो हम सब अपने-अपनी सुविधा के अनुसार उनका प्रयोग करते हैं उस कारण से समाज में एक भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है और कभी-कभी तो लगता है कि हम जानबूझकर के उन शब्दों का प्रयोग इस तरह करते हैं कि समाज में भ्रम बना रहे। कुछ और शब्द हैं जिनके हम अर्थ अपने हिसाब से और परिस्थिति और देशकाल के हिसाब से करते हैं जैसे पर्यावरण, आधुनिकता, विकास, नव निर्माण, अंधविश्वास, लिखित, अलिखित, ऐतिहासिक इत्यादि | हम समाज के पुनर्जागरण की दिशा में कदम उठाए। हिंदू समाज की पहचान, अधिकार और धरोहर की रक्षा केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अखंडता और इतिहास की सुरक्षा की दृष्टि से भी आवश्यक है। मंदिरों का संरक्षण और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा का मतलब केवल अतीत की ओर देखना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक मजबूत नींव रखना भी है। हमारी संस्कृति और परंपराएं हमारी एकता एवं अखंडता का आधार हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति हजारों वर्ष पुरानी है, यह दुनिया की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। उपरोक्त शब्दों के अर्थ इसी संदर्भ में खोजने होंगे। तभी हम भारत में और विश्व में सभ्यता को जीवित रख सकेंगे । सुखद बात यह है कि हाल के वर्षों में समाज अपने अधिकारों और संस्कृत धरोहरों की रक्षा करने के प्रति अधिक जागरूक हुआ है विविधता को पोषण करने वाली हमारी संस्कृति और हमार विचार कहीं तुष्टिकरण में आकर उलझ तो नहीं गया, हमारे तत्कालीन राजनेता कहीं दिशा भ्रम तो नहीं हो गए थे | इस पर भी हमको विचार करना पड़ेगा,यह एक गंभीर विषय है अगर वास्तव में विश्व में “ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः । सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥ ” का संदेश देना है तो हम सबको मिलकर उपरोक्त विषयों पर काम करना पड़ेगा |
,, क्रमशः,,,,,,,
कृपया अपने सुझाव व विचार कमेंट्स बॉक्स में लिखे-






विरासत और धरोहरों के प्रति किशोर वर्ग और युवा वर्ग का आकर्षण बढ़े, स्वाध्याय की आदत विकसित हो उस दिशा में हम सबको जुटने की आवश्यकता है …..कुम्भ जैसे महापर्व का सदुपयोग इस दृष्टि से हो ही रहा है।
अपनी सभ्यता संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन हेतु आपका प्रयास प्रेरक है भाईसाहब।