वाग्देवी सरस्वती के आशीर्वाद का पर्व है बसंत पंचमी
सतीश शर्मा 
या देवी सर्वभूतेषु विद्या-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
जो देवी सभी प्राणियों में विद्या (ज्ञान) के रूप में स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।
बसंत पंचमी या श्री पंचमी ज्ञान का त्यौहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती, कामदेव और विष्णु की पूजा की जाती है। माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी को बसंत पंचमी मनाई जाती है। बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी को कहते है। इस दिन भगवान विष्णु व सरस्वती की पूजा कर जल, मोली, रोली, चावल, पीला फूल, अबीर, गुलाल, फल, दक्षिणा चढ़ायें। धूप दीया जलाकर आरती कर प्रसाद लगायें। बसंत पंचमी को चासनी का केसरिया भात बनायें। भगवान को पीले रंग के वस्त्र पहनायें। अपने पति को हाथ से खाना खिलाएं तो पति का कष्ट कटता है और उमर बढ़ती है। इस दिन पीले वस्त्र धारण करते हैं। सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके प्रकटोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है –
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है।
वसन्त पंचमी कथा – उपनिषदों की कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभिक काल में ब्रह्मा ने जीवों रचना की। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। तब ब्रह्मा जी ने इस समस्या के निवारण के लिए अपने कमण्डल से जल अपने हथेली में लेकर संकल्प स्वरूप उस जल को छिड़कर भगवान श्री विष्णु की स्तुति करनी आरम्भ की। ब्रम्हा जी के किये स्तुति को सुन कर भगवान विष्णु उनके सम्मुख प्रकट हो गए और भगवान विष्णु ने आदिशक्ति दुर्गा माता का आव्हान किया। विष्णु जी के द्वारा आव्हान होने के कारण भगवती दुर्गा वहां तुरंत ही प्रकट हो गयीं तब ब्रम्हा एवं विष्णु जी ने उन्हें इस संकट को दूर करने का निवेदन किया।
ब्रम्हा जी तथा विष्णु जी बातों को सुनने के बाद उसी क्षण आदिशक्ति दुर्गा माता के शरीर से स्वेत रंग का एक भारी तेज पुंज उत्पन्न हुआ जो एक दिव्य नारी के रूप में बदल गया। जो एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिनके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ में वर मुद्रा थे । अन्य हाथों में पुस्तक एवं माला थी। आदिशक्ति श्री दुर्गा के शरीर से उत्पन्न तेज से प्रकट होते ही उन देवी ने वीणा पर मधुरनाद किया जिससे संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। तब सभी देवताओं ने शब्द और रस का संचार कर देने वाली उन देवी को वाणी की अधिष्ठात्री देवी “सरस्वती” कहा।
फिर आदिशक्ति भगवती दुर्गा ने ब्रम्हा जी से कहा कि मेरे तेज से उत्पन्न हुई ये देवी सरस्वती आपकी पत्नी बनेंगी, जैसे लक्ष्मी श्री विष्णु की शक्ति हैं, पार्वती महादेव शिव की शक्ति हैं उसी प्रकार ये सरस्वती देवी ही आपकी शक्ति होंगी। ऐसा कह कर आदिशक्ति श्री दुर्गा सब देवताओं के देखते – देखते वहीं अंतर्धान हो गयीं। इसके बाद सभी देवता सृष्टि के संचालन में संलग्न हो गए।
भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और तभी से इस वरदान के फलस्वरूप भारत देश में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है। वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। वसंत सबका अति प्रिय मौसम है । जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का फूल ऐसे चमकते है मानो सोना बिखरा हो, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ रंग-बिरंगी तितलियाँ व भँवरे दिखने लगते ।
वसंत पंचमी को ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का प्रकट दिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं।
गुरू रामसिंह कूका जिनका जन्म 1816 ई. में वसंत पंचमी पर लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। वे महाराजा रणजीत सिंह की सेना में थे,पर आध्यात्मिक प्रवृत्ति होने के कारण घर आकर खेतीबाड़ी में लग गये, आध्यात्मिक प्रवृत्ति होने के कारण वे प्रवचन देने लगे इनके प्रवचन लोग सुनने लगे । धीरे-धीरे इनके शिष्यों का एक अलग पंथ ही बन गया, जो कूका पंथ कहलाया। गुरू रामसिंह ने गोरक्षा, स्वदेशी, नारी उद्धार, अन्तरजातीय विवाह, सामूहिक विवाह आदि पर बहुत कार्य किया । आपने सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिष्कार कर अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी। प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर भैणी गांव में मेला लगता था। 1872 में मेले में आते समय उनके एक शिष्य को अंग्रेजो ने घेर लिया ये सुनकर गुरू रामसिंह के शिष्य भड़क गये। उन्होंने उस गांव पर हमला बोल दिया, पर दूसरी ओर से अंग्रेज सेना आ गयी। अतः युद्ध का पासा पलट गया। दो दिन बाद गुरू रामसिंह को भी पकड़कर बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। 14 साल तक वहां कठोर अत्याचार सहकर 1885 ई. में उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।
वसंत पंचमी को राजा भोज का जन्म हुआ था । राजा भोज इस दिन एक बड़ा उत्सव करते जिसमें पूरी प्रजा के लिए एक बड़ा प्रीतिभोज रखा जाता था जो चालीस दिन तक चलता था।
माता सरस्वती मंत्र
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमाम् आद्यां जगद्व्यापिनीं। वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्॥
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्। वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥
जो कुन्द (एक सफेद फूल) के फूल, चंद्रमा, बर्फ़ और मोतियों के हार के समान श्वेत (उज्ज्वल) हैं,
जो श्वेत (सफेद) वस्त्रों से ढकी हुई हैं,जिनके हाथ वीणा के श्रेष्ठ दण्ड से सुशोभित हैं,जो श्वेत कमल पर विराजमान हैं,जो ब्रह्मा, विष्णु और शंकर आदि देवताओं द्वारा सदा पूजी जाती हैं, वही भगवती सरस्वती माँ मेरी संपूर्ण जड़ता (अज्ञानता) को दूर करें, मेरी रक्षा करें। मैं उस परमेश्वरी, बुद्धि देने वाली, शारदा (सरस्वती) देवी की वंदना करती हूँ, जो श्वेत हैं, ब्रह्म के विचार के सार (परम सत्य) स्वरूप हैं, जो आद्या (मूल) और जगत् में फैली हुई हैं, वीणा और पुस्तक धारण किए हुए हैं, अभय (निर्भयता) प्रदान करती हैं, और अज्ञान के अंधकार को हरने वाली हैं, जिनके हाथों में स्फटिक की माला है और जो पद्मासन (कमल के आसन) पर विराजमान हैं।
भगवान विष्णु मंत्र –
शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्ण शुभांगम् ।
लक्ष्मीकांत कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं,वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्व लौकेक नाथम् ॥
हे समस्त देवों के देव, जिनके नाभि में पद्म हैं, शांत आकार के, नाग पर शयन करने वाले, विश्व के आधार, आकाश जैसे विशाल, मेघों सा रंग वाले, लक्ष्मी के पती, कमल से नयन वाले, योगियों जैसे ध्यान मगन, समस्त लोकों के नाथ, सबका संसार भय नाश करने वाले विष्णू आपका (हम) वंदन करते हैं।
कामदेव गायत्री मंत्र – ॐ क्लीं कामदेवाय विद्महे पुष्प बाणाये धीमहि तन्नो अनंग प्रचोदयात!!
कामदेव वशीकरण मंत्र – ऊँ नमो भगवते कामदेवाय, यस्य यस्य दृश्यो भवामि यस्य यस्य मम मुखं पश्यति तं तं मोहयतु स्वाहा।
संकलन ,लेखन व सम्पादन सतीश शर्मा ,आपके सुझाव व संशोधन स्वीकार्य व आमंत्रित है। ।। ॐ श्री श्याम देवाय नमः ।।
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