पापमोचनी एकादशी
सतीश शर्मा 
यह व्रत चैत्र मास की कृष्ण पक्ष एकादशी का किया जाता है। इसदिन भगवान विष्णु को अर्घ्यदान आदि देकर षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा, फलाहार या निर्जला व्रत करें। अगले दिन (द्वादशी) शुभ समय में पारण करें। पापमोचनी एकादशी का व्रत आत्मशुद्धि और भगवान विष्णु की कृपा पाने का एक विशेष अवसर है।
पापमोचनी एकादशी व्रत की कथा – प्राचीन समय में चैत्ररथ वन नामक अति रमणीय वन था। इसी वन में देवराज इंद्र गंधर्व कन्याओं तथा देवताओं सहित स्वच्छंद विहार करते थे।
प्राचीन काल में में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी नामक ऋषि भी यहां तपस्या करते थे। ऋषि शिवोपासक तथा अप्सराएं शिवद्रोहिणी अनंग दासी (अनुचरी) थीं। एक समय का प्रसंग है कि रति नाथ कामदेव ने इंद्र की आज्ञा से मेधावी मुनि की तपस्या भंग करने के लिए मंजुघोषा नामक अप्सरा को नृत्य गान करने के लिए उनके सम्मुख भेजा। युवावस्था वाले ऋषि अप्सरा के हाव भाव, नृत्य, गीत तथा कटाक्षों पर काम से मोहित हो गए। रति क्रीड़ा करते हुए 57 वर्ष बीत गए। मंजुघोषा ने एक दिन अपने स्थान पर जाने की आज्ञा मांगी। आज्ञा मांगने पर मेघावी मुनि के कानों पर कुछ आवाज आई तथा उन्हें आत्मज्ञान हुआ। अपने को रसातल में पहुंचने का एकमात्र कारण अप्सरा मंजुघोषा को समझकर मुनि ने उसे पिशाचिनी होने का शाप दे दिया। च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि अपने पिता च्यवन के आश्रम में गए। शाप की बात सुनकर च्यवन ऋषि ने पुत्र की घोर निदां की तथा उन्हें चैत्र मास की पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की आज्ञा दी। इधर शाप सुनकर मंजुघोष ने वायु द्वारा प्रताड़ित कदली वृक्ष की भांति कांपते हुए मुक्ति का उपाय पूछा। तब मुनि ने चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसे पापमोचनी एकादशी कहा जाता है, का व्रत करने की सलाह दी। ऋषि ने स्वयं भी इस व्रत का पालन किया, जिससे उनके पाप नष्ट हो गए। वहीं, अप्सरा मंजूघोषा ने भी पूरी श्रद्धा से व्रत किया, जिससे वह पिशाच योनि से मुक्त होकर पुनः देवलोक लौट गई। यह व्रत ब्रह्महत्या, स्वर्ण चोरी, सुरापान और अनैतिक संबंधों जैसे महापापों से भी मुक्ति दिलाता है। एकादशी के दिन इस कथा को सुनने से एक हजार गौदान के बराबर पुण्य मिलता है।
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