आजाद हिन्द फौज के योद्धा – सरदार गुरबख्श सिंह ढिल्लों
सतीश शर्मा 
गुरबख्श सिंह ढिल्लों, आज़ाद हिन्द फ़ौज का वो योद्धा, जिसने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए
आज़ाद हिन्द फ़ौज,जिसकी कमान भारत की आज़ादी के नायक रहे सुभाषचंद्र बोस के हाथों में थी. शुरुआत में इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को भर्ती किया गया था, जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बनाए गए थे। बाद में इसका विस्तार हुआ. भारत की स्वतंत्रता में INA की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।
18 मार्च 1914. यह वह तारीख है, जब गुरबक्श सिंह ढिल्लों ने अपनी आंखें खोलीं. आम बच्चों की तरह वह बड़े हुए और शुरुआती पढ़ाई के लिए पास के सरकारी प्राथमिक विद्यालय गए. वहां से निकलने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई का सफ़र जारी रखा और ग्रेजुएशन की डिग्री ली. वो हिन्दी के अलावा फारसी, अंग्रेजी, उर्दू जैसी कई अन्य भाषाएं बोल लेते थे.
इसी बीच एक दिन उनसे किसी ने कहा, ढिल्लों तुम सेना में भर्ती क्यों नहीं हो जाते. तुम्हारा शरीर अच्छा हैं. तुम पढ़ने में भी तेज हो. तुम्हारा चयन आसानी से हो सकता है. ढिल्लों के दिमाग में ये बात घर कर गई और उन्होंने सेना में भर्ती होने की तैयारी शुरू कर दी. वह अब तय कर चुके थे कि वो भारतीय सेना का हिस्सा बनेंगे. उन्हें इसमें सफलता भी मिली. साल 1936 के आसपास भारतीय सेना से उनका बुलावा आया. इस तरह अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वो 14 वीं पंजाब रेजिमेंट की प्रथम बटालियन का हिस्सा बनाए गए. विश्व युद्ध में उन्होंने विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब दिया था. हालांकि, अंत में वो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे. बाद में 1942 में भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए आजाद हिन्द फौज का संगठन हुआ तो ढिल्लो, कर्नल प्रेम सहगल, और मेजर जनरल शाह नवाज ख़ान समेत अन्य योद्धाओं के साथ इसके अभिन्न अंग बन गए और अंग्रेजों को खूब छकाया. परिणाम स्वरूप युद्ध समाप्त होने के बाद अंग्रेज सरकार ने मुकद्दमा चलाया. साथ ही उन्हें दोषी ठहराते हुए कोर्ट-मार्शल के बाद सजा भी सुनाई. ‘लाल किला ट्रायल’ के नाम से ढिल्लों पर चलाया गया यह मुकदमा भारत की आजादी की राह आसान करने में मील का एक पत्थर बना. इस ऐतिहासिक मुकदमे के दौरान लोगों के बीच एक नारा गूंजा ‘लाल किले से आई आवाज-सहगल, ढिल्लों, शहनवाज’. जिसने भारत की आजादी के लिए लड़ रहे नौजवानों के बीच ऊर्चा का संचार किया और उन्हें एकता के एक सूत्र में बांधा. लोगों ने ढिल्लों की सजा के विरोध में जगह-जगह गिरफ्तारी दी और अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। अंग्रेज समझ चुके थे कि अगर इनको सजा दी गई तो भारतीय फौज में बगावत हो जाएगी. यही कारण रहा कि उन्हें सहगल, ढिल्लों और शाहनवाज समेत आजाद हिन्द फौज के सैकड़ों सैनिकों को ना सिर्फ़ रिहा करना पड़ा, बल्कि उनके मुकदमे भी खत्म करने पड़े। आगे अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय जलसेना ने भी विद्रोह कर दिया, जिसका खामियाजा अंग्रजों को भुगतना पड़ा. इन छोटी-छोटी कड़ियों से अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया और अंतत: उन्हें भारत छोड़कर जाना पड़ा।
कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों को सन 1998 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया। कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लन ब्रिटिश इंडियन आर्मी में कमीशंड अफ़सर (सीनियरिटी दिनांक 26 जुलाई 1939 से) 14 वीं पंजाब रेजीमेंट की पहली बटालियन (शेर दिल पलटन) में बतौर सैकेंड लेफ्टिनेंट के पद पर थे. उनकी कमीशंड आईडी IC 336 थी. भारत के राष्ट्रपति श्री आर के नारायण ने 12 अप्रेल 1998 को कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों को ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया। इसके पूर्व 1997 में भारतीय डाक विभाग ने कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान की याद में एक डाक टिकट भी जारी की गयी थी।
6 फ़रवरी 2006 को अंतत: आज़ाद हिन्द फौज के इस योद्धा ने मृत्यु को गले लगा लिया था. उनकी जीवन पर एक फ़िल्म भी बनाई गई, जिसे ‘रागदेश’ के नाम से जाना जाता है।
सतीश शर्मा जी द्वारा लेखन संपादन व संकलन
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