कूष्माण्डा माता की कथा
सतीश शर्मा 
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
माँ दुर्गाजीके चौथे स्वरूपका नाम कूष्माण्डा है। अपनी मन्द, हलकी हँसीद्वारा अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्डको उत्पन्न करनेके कारण इन्हें कूष्माण्डा देवीके नामसे अभिहित किया गया है।
जब सृष्टिका अस्तित्व नहीं था, चारों ओर अन्धकार-ही-अन्धकार परिव्याप्त था, तब इन्हीं देवीने अपने ‘ईषत्’ हास्यसे ब्रह्माण्डकी रचना की थी। अतः यही सृष्टिकी आदि-स्वरूपा, आदि शक्ति हैं। इनके पूर्व ब्रह्माण्डका अस्तित्व था ही नहीं।
इनका निवास सूर्यमण्डलके भीतरके लोकमें है। सूर्यलोकमें निवास कर सकनेकी क्षमता और शक्ति केवल इन्हींमें है। इनके शरीरकी कान्ति और प्रभा भी सूर्यके समान ही देदीप्यमान और भास्वर है। इनके तेजकी तुलना इन्हींसे की जा सकती है। अन्य कोई भी देवी-देवता इनके तेज और प्रभावकी समता नहीं कर सकते। इन्हींके तेज और प्रकाशसे दसों दिशाएँ प्रकाशित हो रही हैं। ब्रह्माण्डकी सभी वस्तुओं और प्राणियोंमें अवस्थित तेज इन्हींकी छाया है।
इनकी आठ भुजाएँ हैं। अतः ये अष्टभुजा देवीके नामसे भी विख्यात हैं। इनके सात हाथोंमें क्रमशः कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथमें सभी सिद्धियों और निधियोंको देनेवाली जपमाला है। इनका वाहन सिंह है। संस्कृत भाषामें कूष्माण्ड कुम्हड़ेको कहते हैं। बलियोंमें कुम्हड़ेकी बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारणसे भी ये कूष्माण्डा कही जाती हैं।
नवरात्र-पूजनके चौथे दिन कूष्माण्डा देवीके स्वरूपकी ही उपासना की जाती है। इस दिन साधकका मन ‘अनाहत’ चक्रमें अवस्थित होता है। अतः इस दिन उसे अत्यन्त पवित्र और अचञ्चल मनसे कूष्माण्डा देवीके स्वरूपको ध्यान में रखकर पूजा-उपासनाके कार्यमें लगना चाहिये। माँ कूष्माण्डाकी उपासनासे भक्तोंके समस्त रोग-शोक विनष्ट हो जाते हैं। इनकी भक्तिसे आयु, यश, बल और आरोग्यकी वृद्धि होती है। माँ कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्तिसे भी प्रसन्न होनेवाली हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदयसे इनका शरणागत बन जाय तो फिर उसे अत्यन्त सुगमतासे परम पदकी प्राप्ति हो सकती है।
हमें चाहिये कि हम शास्त्रों-पुराणोंमें वर्णित विधि-विधानके अनुसार माँ दुर्गाकी उपासना और भक्तिके मार्गपर अहर्निश अग्रसर हों। माँके भक्ति मार्गपर कुछ ही कदम आगे बढ़नेपर भक्त साधकको उनकी कृपाका सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। यह दुःख-स्वरूप संसार उसके लिये अत्यन्त सुखद और सुगम बन जाता है। माँकी उपासना मनुष्यको सहज भावसे भवसागरसे पार उतारनेके लिये सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है।
माँ कूष्माण्डाकी उपासना मनुष्यको आधियों-व्याधियोंसे सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नतिकी ओर ले जानेवाली है। अतः अपनी लौकिक-पारलौकिक उन्नति चाहनेवालोंको इनकी उपासनामें सदैव तत्पर रहना चाहिये।
सतीश शर्मा जी द्वारा लेखन ,संकलन व सम्पादन






