निजी विद्यालयों की बढ़ती मनमानी

निजी विद्यालयों की बढ़ती मनमानी

ललित शंकर हरिद्वार

भारतीय परंपरा में विद्यायलों को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है।सभी विद्यायलों का समाज मे अत्याधिक सम्मान भी है।लेकिन निजी स्कूलों की मनमानी के कारण धीरे धीरे शिक्षा के मंदिरों का सम्मान कम होता जा रहा है।शिक्षा मन्दिर कंही न कंही अब व्यवसायिक स्थान बन गए हैं।अभी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने निजी स्कूलों द्वारा छात्रों और अभिभावकों पर निजी प्रकाशकों की ही पुस्तकों को खरीदने का दबाव डालने की शिकायत का संज्ञान लिया है।आयोग ने राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशो को नोटिस भेजकर स्कूल बैग नीति और शिक्षा अधिकार अधिकार अधिनियम की धारा 29 के अनुपालन करने को कहा है।आयोग ने 30 दिन के अंदर विस्तृत कार्यवाही रिपोर्ट भी मांगी है। कोई भी  स्कूल किसी भी निजी प्रकाशकों की पुस्तकों को खरीदने का दबाव बनाते  तो वह सीधे सीधे अधिनियम धारा 29 का उलंघन कर रहे हैं।आयोग ने आदेश भी दिया है कि सिर्फ एनसीईआरटी या एससीईआरटी की पुस्तकों को ही प्राथमिकता पर रखे।लेकिन धरातल पर ऐसा कुछ नजर नही आता।शिक्षा के मंदिर अब केवल धन कमाने का एक अड्डा बन गए हैं।पहले देखने मे आता था कि निश्चित पुस्तक स्कूलों में लगाई जाती थी।जो कीमत में भी सामान्य होती थी।तथा पिछली कक्षा उत्तीर्ण करने वाला शिक्षार्थी आगामी कक्षा में आकर पुरानी पुस्तको को लेकर शिक्षा ग्रहण कर लेता था।आजकल निजी विद्यायल हर वर्ष नई नई व महंगी पुस्तकें लगाते  हैं। निजी विद्यायलों के संचालक निश्चित प्रकाशक से अपना प्रतिशत तय करके अभिभावकों का शोषण ही करते हैं।अत्याधिक राशि देकर खरीदी गई एक वर्ष ज्ञान देने वाली पुस्तक अगले वर्ष रद्दी बनकर दुकानों पर या फिर कचरे में पड़ी मिलती गया।वर्तमान समय मे सामान्य से निचले स्तर के परिवारों  को निजी स्कूलों में पढ़ाना कठिन हो गया है।क्योंकि निजी स्कूलों में लगातार पुस्तकों के नाम पर अत्याधिक राशि ली जा रही है।पुस्तको के अतिरिक्त अन्य कई प्रकार के शुल्क भी निजी विद्यायल अपनी मनमानी से लगा रहे हैं।हर वर्ष एडमिशन फीस,स्कूल ड्रेस भी विद्यालयों ने स्वयं तय मूल्य पर देनी शुरू कर दी है।परीक्षा फीस भी काफी हद तक बड़ा दी है। विद्यायलों  में कार्यक्रमों के नाम पर शुल्क रखा जाता है।सोचनीयत बात ये है कि अभिभावकों द्वारा इतनी बड़ी राशि विद्यालयों को देने के बाद भी ट्यूशन लगाने का दबाव बनाकर ट्यूशन  लगवाया ही जाता है।इन सबके बाद बच्चे की जबाबदेही भी अभिभावकों की होती है,विद्यालय की नही।इतने खर्च के बाद बच्चा पढ़ने में कमजोर रहता है तो विद्यायल प्रसाशन अभिभावकों को उसका जिम्मेदारी बताकर पेरेंट मीटिंग के माध्यम से उनको ही सुनाते हैं।जबकि पेरेंट्स मीटिंग में अभिभावकों को नही विद्यायल की जबावदेही होनी चाहिए।केंद्र सरकार तथा राज्यों की सरकारों को निजी विद्यालयों की मनमानी पर रोक लगाते हुए कठोर कानून बनाने चाहिए।जिससे गरीब व्यक्ति भी अपने बच्चों को सही तरह से पढ़ाया सके।आर्थिक अभाव में पिछड़कर पढ़ने वाला बालक कभी पूर्ण रूप से तैयार नही हो पाता।निजी स्कूलों में अत्याधिक खर्चे को देखकर सामान्य से नीचे वाला परिवार अपने बच्चों को पढा भी नही पाता।इन सबके पीछे बड़ा कारण है सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर बहुत कम होना भी है।सरकारी विद्यालयों की स्थिति जगजाहिर है।सरकार अगर सरकारी विद्यालयों की स्थिति में मजबूती से सुधार ले आये तो कंही न कंही निजी विद्यालयों की मनमानी पर रोक लग जायेगी।सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति को देखकर अभिभावकों की मजबूरी बन गई है।निजी विद्यालयों में पढ़ाने की।उसी मजबूरी का फायदा निजी विद्यालयों के संचालक अपनी इच्छा योजनानुसार उठाते हैं।

 

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