
श्री गुरु तेग बहादुर जी – हिन्द की चादर
सतीश शर्मा
गुरु तेग बहादुर (1621-1675) सिख धर्म के नौवें गुरु थे। वे एक महान आध्यात्मिक विद्वान और कवि थे, जिन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। उन्हें हिंद दी चादर’ के रूप में भी जाना जाता है, और उनके बलिदान ने 1675 में मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में धर्म और न्याय के लिए संघर्ष को प्रेरित किया। जन्मः 1 अप्रैल, 1621 को अमृतसर, पंजाब में। उनके पिता छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब थेऔर माँ का नाम माता नानकी जी था। उन्होंने भाई गुरदास जी से गुरुमुखी, हिंदी, संस्कृत और भारतीय धार्मिक दर्शन की शिक्षा ली। इसके अतिरिक्त, बाबा बुद्ध ने उन्हें तलवारबाज़ी और घुड़सवारी का प्रशिक्षण दिया। उनका प्रारंभिक नाम त्यागमल था, जिसे बाद में उनकी बहादुरी और निडरता के कारण तेग बहादुर’ कर दिया गया। माता गुजरी जी , जिनका जन्म 1624 में हुआ था, सिख इतिहास में गुरु तेग बहादुर जी की पत्नी और गुरु गोबिंद सिंह जी की माता के रूप में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। उनका जीवन सिख धर्म के प्रति दृढ़ता, त्याग और अटूट भक्ति का एक प्रेरक वृत्तांत है। गुरु तेग बहादुर के एक ही पुत्र थे, जिनका नाम गुरु गोविंद सिंह था। गुरु गोविंद सिंह ने अपने पिता की शहादत के बाद सिखों के दसवें और अंतिम गुरु का पद संभाला था।
20 मार्च, 1664 को उन्हें सिखों का नौवां गुरु नियुक्त किया गया। गुरु बनने के बाद, उन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों की यात्रा की, जहाँ उन्होंने गरीबों और दुखियों की मदद की और आध्यात्मिक कार्य किए। इस दौरान उन्होंने पंजाब में चक-ननकी शहर की स्थापना की, जो बाद में आनंदपुर साहिब का हिस्सा बना।
एक विद्वान, कवि और योद्धा थे। उनके 115 भजन सिखों के पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं। उन्होंने कई स्थानों की यात्रा की और धर्म और मानवता की सेवा की। उन्होंने पंजाब में आनंदपुर साहिब शहर की स्थापना की।
औरंगजेब के शासनकाल के दौरान कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार के विरोध में उन्होंने अपनी शहादत दी। उन्हें दिल्ली में सिर कलम करके मार दिया गया। उनके शरीर का दाह संस्कार गुरुद्वारा रकाब गंज साहब और सिर का अंतिम संस्कार गुरुद्वारा शीश गंज साहब के स्थान पर हुआ।
उन्होने मुगलिया सल्तनत का विरोध किया। 1675 में मुगल शासक औरंगज़ेब ने उन्हे इस्लाम स्वीकार करने को कहा। पर गुरु साहब ने कहा कि सीस कटा सकते हैं, केश नहीं। इस पर औरंगजेब ने सबके सामने उनका सिर कटवा दिया। गुरुद्वारा शीश गंज साहिब तथा गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब उन स्थानों का स्मरण दिलाते हैं जहाँ गुरुजी की हत्या की गयी तथा जहाँ उनका अन्तिम संस्कार किया गया था।
11 नवम्बर, 1675 ई० ( 20 कार्तिक 1597) को दिल्ली के चांदनी चौक में काज़ी ने फ़तवा पढ़ा और जल्लाद जलालदीन ने तलवार करके गुरु साहिब का शीश धड़ से अलग कर दिया। किन्तु गुरु तेग बहादुर ने अपने मुँह से ‘सी’ तक नहीं कहा। आपके अद्वितीय बलिदान के बारे में गुरु गोविन्द सिंह जी ने ‘बिचित्र नाटक’ में लिखा है- उनकी शहादत को धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के लिए एक महान बलिदान माना जाता है। उनका जीवन और शिक्षाएँ आज भी समानता, न्याय और साहस के मूल्यों के लिए प्रेरणा देती हैं। उनके बलिदान को हर साल 24 नवंबर को शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है।
शहादत और विरासत मुगल बादशाह औरंगजेब ने धर्म परिवर्तन के लिए हिंदुओं पर अत्याचार और दबाव डाला। कश्मीरी पंडितों ने गुरु तेग बहादुर से मदद मांगी। गुरु तेग बहादुर ने हिंदुओं और उनके धर्म की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। औरंगजेब ने गुरु जी को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया और उन पर इस्लाम धर्म अपनाने का दबाव डाला, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। 24 नवंबर, 1675 को दिल्ली में उन्हें औरंगजेब के आदेश पर शहीद कर दिया गया। गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान ने हिंदू धर्म की रक्षा की और उन्हें ‘हिंद दी चादर’ (भारत की चादर) के रूप में सम्मानित किया गया। दिल्ली में गुरुद्वारा शीश गंज साहिब और गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब उस स्थान को चिह्नित करते हैं जहाँ उनके सिर को काटा गया था और उनके शरीर का दाह संस्कार किया गया था।
गुरु तेग बहादुर के अनमोल विचार सत्य, साहस और समानता पर आधारित हैं, जो हमें हर परिस्थिति में शांत रहने, दूसरों के प्रति दयालु होने और अहंकार से दूर रहने की शिक्षा देते हैं । उनके विचार सिखाते हैं कि महान कार्य छोटे-छोटे प्रयासों से बनते हैं, और सच्ची वीरता डर के बावजूद सही काम करने का फैसला है ।
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