महाशिरात्रि का महत्व व कथा
सतीश शर्मा 
महाशिवरात्री भगवान् शिव का अत्यत महत्वपूर्ण व्रत है। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि का व्रत आता है। शिव’ का अर्थ है कल्याणकारी और ‘रात्रि’ का अर्थ है विश्राम। महाशिवरात्रि वह रात है जब हम शिव तत्व (परम चेतना) की शरण में जाकर गहरा विश्राम पाते हैं। पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (महाशिवरात्रि) को हुआ था । यह पावन पर्व महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है, जब शिव-शक्ति का मिलन हुआ था । इस दिन शिवजी और पार्वतीजी की पूजा होती। पूजा मे निम्नलिखित समान रोली, मौली, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, चन्दन, दूध, दही, घी, चीनी, शहद, फल-फूल, कमलगट्टा, धतूरा, बेलपत्र, प्रसाद्, दक्षिणा चढ़ाकर धूप दीपक जलाकर पूजा अर्चना करें ओर रात को जागरण करें व अगर संभव हो तो चार प्रहर की पूजा करें । ब्राह्मण से पूजा पाठ करवायें वस्त्र व दक्षिणा आदि दें । शिव मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करे। इस दिन ध्यान योग का भी बढा महत्व हैं कुछ समय ध्यान आसन का भी अभ्यास करें । शिवजी का भोग लगाकर सबको प्रसाद बाटें। सात्विक आचरण करें । महाशिवरात्रि को मंदिरों में चार पहर की पूजा होती हैं । माना जाता है कि सृष्टि का प्रारम्भ इसी दिन से हुआ था।
महाशिवरात्रि की कथा – प्राचीन समय में एक नृशंस बहेलिया था जो नित्य प्रति अनगिनत निरपराध जीवों को मारकर अपने परिवार का पालन पोषण करता था। एक बार पूरे जंगल में विचरण करने पर भी जब उसे कोई शिकार न मिला तो बहेलिया एक तालाब के किनारे बैठ गया। उसी स्थान पर एक बेल के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित था। बहेलिया ने उसी वृक्ष की शाखा पर चढ़कर अपनी आवास स्थली बनाने के लिए विचार किया, बेलपत्रों को तोड़ते हुए शिवलिंग को ढक दिया। दिन भर की भूख से व्याकुल उस बहेलिया का एक प्रकार से शिवरात्रि व्रत पूरा हो गया। कुछ रात बीत जाने पर गर्भवती हिरणी उधर कुलाचें भरती आई। व्याध उसे मारने को तैयार हो गया। झिझकती, भयाकुल हिरणी दीन वाणी में बोली हे व्याध! मैं अभी गर्भवती हूँ मेरी प्रसव बेला भी समीप है, इसलिए इस समय मुझे मत मारो, मैं प्रजनन क्रिया के बाद शीघ्र ही आ जाऊंगी तब मार देना । बहेलिया उसकी बातों में आ गया।
थोड़ी रात व्यतीत होने पर एक दूसरी मृगी उस स्थान पर आई।बहेलिये के निशाना साधते ही उस मृगी ने भी निवेदन किया कि मैं अभी ऋतुक्रिया से निवृत्त सकामा हूं। इसलिए मुझे पति समागम करने दीजिए,मुझे मारिए नहीं मैं मिलने के पश्चात् स्वयं तुम्हारे पास आ जाऊंगी तब आप मेरा शिकार कर लेना। बहेलिया ने उसकी बात को स्वीकार कर लिया ओर जाने दिया । रात्रि की तृतीय बेला में एक तीसरी हिरणी छोटे छोटे बच्चों को लिए उसी जलाशय में पानी पीने आई। बहेलिया ने उसको भी देखकर धनुष बाण उठा लिया। तब वह हिरणी कातर स्वर में बोली हे व्याध! मैं इन बच्चों को हिरण के सरंक्षण में कर आऊँ तो तब तुम मुझे मार डालना। बहेलिया ने दीन वचनों, से प्रभावित होकर इसे भी छोड़ दिया। प्रातः काल के समय एक मांसल बलवान हिरण उसी सरोवर पर आया। बहेलिया ने पुनः अपने स्वभावनुसार शर संधान करना चाहा। यह क्रिया देखते ही हिरण व्याध से प्रार्थना करने लगा हे व्याधराज ! मुझसे पूर्व आने वाली तीन हिरणियों को तुमने मारा है तो मुझे भी मारिये अन्यथा अगर वे तुम्हारे द्वारा छोड़ दी गई हों तो मुझे मिलकर आने पर मारना। मैं ही उनका सहचर हूं। हिरण की करुणामयी वाणी सुनकर बहेलिया ने रात भर की बीती बात कह सुनाई तथा उसे भी छोड़ दिया। दिन भर उपवास, पूरी रात जागरण तथा शिव प्रतिमा पर बेलपत्र गिरने (चढ़ाने) के कारण बहेलिया में आन्तरिक शुचिता आ गई। उसका मन निर्दयता से कोमलता में ऐसा बदल गया कि हिरण परिवार को लौटने पर भी न मारने का निश्चय कर लिया। भगवान शंकर के प्रभाव से उसका हृदय इतना पवित्र तथा सरल हो गया कि वह पूर्ण अहिंसावादी बन गया। उधर हिरणियों से मिलने के पश्चात हिरण ने बहेलिया के पास आकर अपनी सत्यवादिता का परिचय दिया। उनके सत्यग्रह से प्रभावित होकर ‘अहिसा परमोधर्मः’ का पुजारी हो गया। उसकी आंखों से आंसू छलक आये तथा पूर्वकृत कर्मों पर पश्चाताप करने लगा। इस पर स्वर्गलोक से देवताओं ने व्याध की सराहना की तथा भगवान शंकर ने दो पुष्प विमान भेजकर बहेलिया तथा मृग परिवार को शिवलोक का अधिकारी बनाया। बोलो शंकर भगवान की जय ।






