बरूथिनी एकादशी

बरूथिनी एकादशी

सतीश शर्मा

यह व्रत वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन रखा जाता है। यह व्रत सुख-सौभाग्य का प्रतीक है। इस व्रत का महत्त्व सुपात्र ब्राह्मण को दान देने, करोड़ों वर्ष तक नग्न तपस्या करने तथा कन्यादान के भी फल से बढ़कर है। व्रत करने वाले के लिये खासतौर से उस दिन खाना, दातुन फाड़ना, परनिन्दा, क्रोध करना और असत्य बोलना वर्जित है। इस व्रत में तेलयुक्त भोजन नहीं करना चाहिए। इसका माहात्म्य सुनने से सहस्र गऊओं की हत्या का भी दोष नष्ट हो जाता है। इस प्रकार यह बहुत ही फलदायक व्रत है।

सुबह जल्दी उठकर स्नानादि के बाद भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लें। विष्णु जी को पीले फूल, फल, धूप, दीप और तुलसी दल (तुलसी का पत्ता) अर्पित करें। भगवान को भोग लगाएं और वरुथिनी एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें। संभव हो तो रात्रि में विष्णु जी का कीर्तन करें। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन व्रत करने से अनजाने में हुए पाप नष्ट हो जाते हैं।इस दिन अन्नदान, जलदान, तिलदान या कन्यादान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।यह व्रत सौभाग्यवती महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य का वरदान भी लाता है।

बरूधिनी एकादशी व्रत की कथा

पुराने समय की बात है एक बार नर्मदा नदी के तट पर मांधाता नामक राजा राज्य-सुख भोग रहा था। राजकाज करते हुए भी वह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी था। एक दिन जब वह तपस्या कर रहा था उसी समय एक जंगली भालू आकर उसका पैर चबाने लगा। थोड़ी देर बाद वह राजा को घसीटकर वन में ले गया। तब राजा ने घबराकर तापस धर्म के अनुकूल हिंसा, क्रोध न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भक्तवत्सल भगवान प्रकट हुए और भालू को अपने चक्र से मार डाला। राजा का पैर भालू खा चुका था इससे वह बहुत ही शोकाकुल हुआ। विष्णु भगवान ने उसको दुःखी देखकर कहा कि “हे वत्स! मथुरा में जाकर तुम मेरो वाराह अवतार मूर्ति की पूजा और बरूथिनी एकादशी का व्रत करो। उसके प्रभाव से तुम फिर से पूर्ण अंगों वाले हो जाओगे।” भालू ने जो तुम्हें काटा है यह तुम्हारा पूर्वजन्म का अपराध था। राजा ने इस व्रत का अपार श्रद्धा से किया तथा सुन्दर अंगों वाला हो गया।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *