एक कुशल संगठक – प. पू. डॉ. हेडगेवार

एक कुशल संगठक – प. पू. डॉ. हेडगेवार

सतीश शर्मा 

स्वयं मृगेंद्रता यह वाक्यांश एक प्रसिद्ध संस्कृत सूक्ति “विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेंद्रता” से लिया गया है। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति अपने पराक्रम, योग्यता और कर्मठता से अपना मुकाम हासिल करता है, उसे किसी पद या पदवी के ताजपोशी (राज्याभिषेक) की आवश्यकता नहीं होती। वह स्वयं ही समाज का नेतृत्व करने वाला (राजा) बन जाता है। यह वाक्य डॉ केशव राव  बलिराम हेडगेवार पर सटीक उतरता था। उनकी छड़ी पर यह वाक्य अंकित था। आदर्श स्वयंसेवक कल्पना की साक्षात् प्रतिमूर्ति व ‘त्यजेदेकं कुलस्यार्थे’ अर्थात ‘बडे हित के लिए छोटे हित का त्याग करना चाहिए’ के प्रतीक ये उनके ध्येय वाक्य है  ।

डॉक्टर जी का जीवन कष्टपूर्ण परिश्रमी एवं कर्मठ जीवन हम सब के लिए आदर्श उदाहरण है  । डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल, 1889 को नागपुर के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जब वह महज 13 साल के थे, तभी उनके पिता पंडित बलिराम पंत हेडगेवार और माता रेवतीबाई का प्लेग से निधन हो गया। उसके बाद उनकी परवरिश दोनों बड़े भाइयों महादेव पंत और सीताराम पंत ने की। शुरुआती पढ़ाई नागपुर के नील सिटी हाईस्कूल में हुई। लेकिन एक दिन स्कूल में ‘वंदे मातरम्’ गाने की वजह से उन्हें निष्कासित कर दिया गया। उसके बाद उनके भाइयों ने उन्हें पढ़ने के लिए यवतमाल और फिर पुणे भेजा। मैट्रिक के बाद हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी. एस. मूंजे ने उन्हें मेडिकल की पढ़ाई के लिए सन 1910 में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) भेज दिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह 1915 में नागपुर लौट आए।

21 जून, 1940 को केशव बलिराम हेडगेवार का नागपुर में निधन हुआ। उनकी समाधि रेशम बाग़, नागपुर में स्थित है, जहाँ उनका अंत्येष्टि संस्कार हुआ था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संस्थापक, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का पूरा जीवन देशभक्ति और अद्भुत संगठन-कौशल का अनुपम उदाहरण था। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे उनके जीवन के कई ऐसे रोचक और प्रेरक प्रसंग हैं, जो उनके महान चरित्र को दर्शाते हैं । कुछ उद्धहरण नीचे दिए गए है । 

अंग्रेजों की मिठाई का बहिष्कार (बचपन का प्रसंग)जब वे प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते थे, तब 22 जून 1897 को महारानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक की हीरक जयंती (60वीं वर्षगांठ) के उपलक्ष्य में स्कूलों में मिठाई बांटी गई थी। उस समय 8 वर्ष के बालक केशव ने अपने साथियों के साथ वह मिठाई फेंक दी और कहा, “अंग्रेजों ने हमारे भोंसले राजवंश को खत्म कर दिया और हमारा देश गुलाम है, ऐसे में हम उनकी खुशी की मिठाई कैसे खा सकते हैं?”

वंदे मातरम के लिए स्कूल से निष्कासन नागपुर के नील सिटी हाईस्कूल में पढ़ते समय, जब ब्रिटिश सरकार ने स्कूलों में ‘वंदे मातरम’ गाने पर प्रतिबंध लगा दिया, तब केशव ने इसका कड़ा विरोध किया। विद्यालय द्वारा चेतावनी देने के बावजूद उन्होंने वंदे मातरम का उद्घोष जारी रखा, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया।

कलकत्ता में बाढ़ पीड़ितों की सेवा1910 में मेडिकल की पढ़ाई के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) जाने के बाद, वे गुप्त रूप से ‘अनुशीलन समिति’ जैसे क्रांतिकारी संगठनों से जुड़ गए। जब दामोदर नदी में भीषण बाढ़ आई, तो उन्होंने अपनी परवाह किए बिना बाढ़ पीड़ितों के बीच जाकर राहत शिविर चलाए और पीड़ितों की अथक सेवा की।

ब्रिटिश सरकार की नौकरी को ठुकराना कलकत्ता से डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने विदेश में नौकरी के आकर्षक प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने अपने बड़े भाई से कहा कि वे ब्रिटिश शासन के अधीन रहकर कोई नौकरी नहीं करना चाहते। इसके बजाय, उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की स्वतंत्रता और हिंदू समाज को संगठित करने में समर्पित कर दिया।

स्वयंसेवकों को कार्य सौंपने का अनूठा तरीकाएक बार डॉ. हेडगेवार ने एक स्वयंसेवक को कोई महत्वपूर्ण काम सौंपा। उस स्वयंसेवक ने वह काम किसी दूसरे व्यक्ति को कह दिया, और उसने आगे किसी और को। जब काफी समय बीतने पर वह कार्य पूरा नहीं हुआ, तो उन्होंने स्वयंसेवकों को डांटने के बजाय एक अनूठी सीख दी। उन्होंने स्वयंसेवकों को बताया कि “जो काम अपना हो, उसे स्वयं करना चाहिए। यदि दूसरों के भरोसे छोड़ेंगे तो वह काम कभी पूरा नहीं होगा।”

संघ की स्थापना समाज को संगठित करने की अपनी दूरदर्शिता के साथ, उन्होंने 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर के मोहिते के बाड़ा मैदान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना की। शुरुआत में केवल 5 लोगों के साथ शुरू हुआ यह संगठन, आज दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में से एक है। 12 वर्ष की आयु में इंग्लैण्ड के राजा एडवर्ड सप्तम् के राज्यारोहण के अवसर पर आयोजित आतिशबाजी का बहिष्कार करना व करवाना। 13 वर्ष की आयु में नागपुर के सीतावर्डी किले से यूनियन जैक उतारने के लिए सुरंग खोदना । 16 वर्ष की आयु में “बान्धव समाज” नामक संस्था जो नागपुर में थी से जुड़ कर अपनी आयु वर्ग के युवाओं के साथ क्रान्तिकारी तथा राष्ट्रीय विषयों पर चर्चा करना। रामपायली में विजयादशमी के अवसर पर युवाओं के बीच राष्ट्रवादी व प्रेरणादायी भाषण। यवतमाल की राष्ट्रीयशाला से विद्यालयीन परीक्षा 1909 में उच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण, नेशनल कौंसिल आफ एजूकेशन द्वारा प्रमाण पत्र, मेडिकल की परीक्षा 1914 में 60.81% अंक प्राप्तकर उत्तीर्ण की।
स्वतन्त्रता संग्राम में सदैव अग्रणी। 1904 (15 वर्ष की आयु) में बम बनाना सीखना। 1908 में पुलिस चौकी पर बम फेंकना। 1911 में दिल्ली दरबार के बहिष्कार आन्दोलन में सक्रिय सहभाग।
माध्यमिक परीक्षा के बाद का सम्पूर्ण समय क्रान्तिकारियों के मध्य। माधवदास आदि क्रान्तिकारियों को भूमिगत रखना, अलीपुर बमकाण्ड में फँसे क्रान्तिकारियों के बचाव के लिए धन संग्रह करना आदि।
कलकत्ता के मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के समय प्रसिद्ध क्रान्तिकारी संस्था “अनुशीलन समिति” के अन्तरंग सदस्य बनना। क्रान्तिकारी नाम कोकेन। 1914 में सरकार द्वारा राष्ट्रीय मेडिकल कॉलेज की डिग्री अमान्य करने पर जनमत संग्रह आन्दोलन के दबाव से सरकार को डिग्री मानने को बाध्य किया। मध्य प्रान्त तथा बंगाल के क्रान्तिकारियों के बीच सेतु की भूमिका का निर्वहन कुशलतापूर्वक किया। कलकत्ता से लौटने के बाद 2 वर्षों तक अँग्रेजों को मारने व देश से भगाने के लिए क्रान्ति की योजना। बाल्यावस्था में ही दृढ़ता, संकल्प शक्ति, विवेक के आधार पर कार्य करने की प्रवृत्ति । स्वीकृत कार्य को पूर्ण करने के लिए जो-जो आवश्यक वह करना। काँग्रेस सेवा दल, कार्यकर्ता टोली खड़ा करना आदि। हिन्द संगठन सम्भव करके दिखाया। दूरद्रष्टा तथा संघ तन्त्र स्रष्टा । विभिन्न प्रकृति व स्वभाव वालों के लिए ध्येय के प्रति श्रेष्ठ प्रेरक व सामञ्जस्य कर्ता। प्रचारक पद्धति के निर्माता- लाहौर में भाई परमानन्द के पास व अन्य अनेक स्थानों पर विस्तारक भेजना, पारिवारिक आधार पर संगठन निर्माण, प्रारम्भ से ही अखिल भारतीय संगठन के कल्पनाकार । “समाज में नहीं अपितु सम्पूर्ण समाज का संगठन” के चिन्तनकर्ता। लोक प्रिय (आलोचक कोई नहीं) –संघ हिंसात्मक संगठन नहीं (मध्यभारत प्रान्त विधान सभा में स्वीकृत)। 15 वर्षों में बिना संसाधनों के संगठन को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। आत्मविलोपी, प्रसिद्धि पराङ्मुखी, “मैंने किया” ऐसा कभी नहीं कब सदैव कहा ‘हम सब मिलकर कर रहे हैं’। एक अद्वितीय कार्य पद्धति “दैनन्दिन शाखा” के आविष्कारक।

एक बार नागपुर में सर्दियों की रात थी। शाखा का कार्य देर तक चला। सब स्वयंसेवक जा चुके थे, केवल डॉक्टरजी और गुरुजी कार्यालय में बैठे अगले दिन की योजना बना रहे थे। रात बहुत ठंडी थी। गुरुजी ने देखा कि डॉक्टरजी के कंधे पर केवल एक पुरानी, पतली चादर है। गुरुजी ने कहा— “डॉक्टरजी, यह चादर बहुत पतली है, आप मेरी चादर ले लीजिए।” डॉक्टरजी मुस्कुराए— “और तुम?” गुरुजी बोले— “मैं संभाल लूँगा।” डॉक्टरजी ने कुछ नहीं कहा। बात वहीं समाप्त हो गई। अगली सुबह गुरुजी जब जागे, तो देखा—

वही पुरानी चादर उनके ऊपर थी । वे चौंक गए। रात में डॉक्टरजी ने चुपचाप अपनी चादर गुरुजी को उढ़ा दी थी, और स्वयं पूरी रात ठंड में बैठे रहे।

गुरुजी दौड़कर डॉक्टरजी के पास गए और बोले— “आपने ऐसा क्यों किया?” डॉक्टरजी ने बहुत सहज भाव से कहा— “संघ में बड़े होने का अर्थ सुविधा लेना नहीं, अपने स्वयंसेवकों को सुख देना है।” यह सुनते ही गुरुजी की आँखें भर आईं। उन्होंने डॉक्टरजी के चरण छुए और कहा— “आज आपने मुझे नेतृत्व नहीं, प्रेम का अर्थ सिखाया।” कहते हैं, गुरुजी ने जीवन भर उस रात को याद रखा— क्योंकि उस रात उन्हें एक नेता नहीं, एक पिता का स्नेह मिला था।
1934 में वर्धा में संघ का शिविर लगा। महात्मा गांधी भी उस समय वर्षों में ही श्री जमनालाल बजाज के बंगले पर ठहरे हुए थे, शिविर के बारे में चर्चा होने पर गांधी जी ने उसे देखने की इच्छा व्यक्त की। उनके भन में संघ के बारे में कोई बहुत अच्छी धारणा नहीं थी, पत्तु शिविर में आकर वे चभत्कृत हो गये। छुआछूत और भेदभाव मिटाने को जो बात के वर्षों से बोल रहे थे, संघ-शिविर में वह उन्हें व्यवहार में दिखायी दी।

स्वयंसेवक के संबंध में डाॅक्टर जी की धारणा बहुत स्पष्ट और व्यापक थी। सामान्यः यह समझा जाता है कि स्वयंसेवक एक स्वयंसेवी कार्यकर्ता है, जो एक संगठन के लिए अथवा किसी सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए निर्धारित है। डाॅक्टर जी की धारणा इससे सर्वथाभिन्न है। डाॅक्टर जी ने स्वयंसेवक के संबंध में अपनी धारणा 25 दिसंबर 1934 को महात्मा गांधी को बतायी थी, जब गांधी जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘वर्धा’ जिला स्थित शिविर में आए थे, तब उन्होंने कहा था कि ‘स्वयंसेवक वह है, जो राष्ट्र के बहुमुखी विकास और उन्नति के लिए देश भक्ति से प्रेरित होकर प्राण न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहता है’। संघ का उद्देश्य यही है कि वह स्वयंसेवकों का निर्माण और विकास करे। 

संघ में स्वयंसेवकों में किसी प्रकार का विभेद नहीं होता है। हम सभी स्वयंसेवक हैं और इसलिए हम सब समान हैं। हम सभी समान रूप से एक दूसरे के साथ स्नेह करते हैं। हम एक दूसरे के स्तर में ना तो भेद करते हैं और न कोई अंतर पैदा करते हैं। यही कारण है कि किसी बाहरी सहायता के बिना संघ का कितने थोडे काल में अद्भुद विकास हो गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दैनिक शाखा और कार्यक्रमों में यही उद्देश्य रहता है कि गुणवत्ता वाले स्वयंसेवक का निर्माण किया जाए। डाॅ. हेडगेवार जी की स्वयंसेवक को प्रशिक्षण प्रदान करने की पद्धति यही थी कि उपदेश देने की बजाय व्यक्तिगत उदाहरण दिखाया जाए। वे उसी बात का उपदेश देते थे कि जिसका वे स्वयं आचरण करते थे। इसलिए वे कभी किसी स्वयंसेवक को कुछ कहते थे, अथवा कोई काम करने के लिए सुझाव देते थे तो उनका अपना व्यवहार उनके कथन को शक्ति प्रदान करता था। उनके जीवन में एक जाज्वल्यमान और प्रेरणादायी उदारहरण प्रस्तुत किया गया है। स्वयंसेवकों को शाखाओं में जो संस्कार मिलते हैं, उनमें इतनी क्षमता होती है कि धीरे-धीरे स्वयंसेवक अपना पूरा जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित करने लिए तैयार हो जाते हैं। 

संस्कारों नाम स भवति यस्मिन् जाते,पदार्थीभावति योग्यः कस्यत्तिदर्थस्य।

संस्कार वह प्रक्रिया है, जिसे अपनाने से एक व्यक्ति या वस्तु उस प्रयोजन के लिए उपयुक्त हो जाती है, जिस प्रयोजन के हेतु, उसका अस्तित्व है। डाक्टर जी ने ऐसी व्यवस्था की कि लोग शाखा के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, उनके लिए शाखा एक संस्कार केंद्र हो और उन्हें संस्कार प्रदान करे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दूसरा नाम देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और अनुशासन है। जिन स्वयंसेवकों के अंतरमन में ध्येय की प्रेरणा उत्कट रूप में जागृत हो चुकी है और जो संघ का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं, उनके जीवन चरित्र से समाज प्रेरणा लेगा और समाज की आंतरिक ऊर्जा जागृत हो जाएगी।

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