विश्व के सात उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी-7 की बैठक फ्रांस के शहर एवियन में हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस सम्मेलन में भाग लेने का समाचार आया, तो सबकी निगाहें प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की वहां होने वाली मुलाकात पर टिक गई। सम्मेलन संपन्न हुआ। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच भेंट हुई। मौदी विरोधियों को उम्मीद थी कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच कुछ ऐसा घटित होगा जिससे कि मोदी को घेरा जा सकेगा। हुआ इसके ठीक विपरीत। प्रधानमंत्री जब सम्मेलन कक्ष में पहुंचे, तो राष्ट्रपति ट्रंप अपनी कुर्सी से उठकर उनसे गर्मजोशी से मिले। द्विपक्षीय वार्ता के बाद साझा प्रेस कांफ्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत में मोदी विरोधियों की आशाओं पर पानी फेर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान अमेरिका संघर्ष के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा भी राष्ट्रपति ट्रंप के सामने उठाया। मजबूती के साथ अपनी बात रखी।
इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की। जब उनसे महान नेता की परिभाषा पूछी गई, तो उन्होंने कहा प्रधानमंत्री मोदी, जो 12 वर्ष से प्रधानमंत्री हैं और बहुत सालिड हैं। वह काम बहुत शांति से करते हैं, लेकिन बहुत सख्त हैं। यह मैं बहुत अच्छे से जानता हूं। वह 150 करोड़ आबादी वाले देश के नेता हैं और निरंतर बने हुए हैं। जब ट्रंप बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के लिए शांत, लेकिन सख्त शब्द का प्रयोग कर रहे हैं, तो इसका विश्लेषण करना चाहिए। पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 भारतीयों की धर्म पूछकर हत्या की थी। उस आतंकी वारदात के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने के लिए आपरेशन सिंदूर आरंभ किया। पाकिस्तान ने भारत पर ही हमला कर दिया, जिसका भारतीय सेना ने मुंहतोड़ जवाब दिया। 10 मई को संघर्ष विराम हुआ। तब से कई महीनों तक जब भी राष्ट्रपति ट्रंप को अवसर मिलता वे इस बात को कहते कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम उन्होंने ही करवाया। इस बात को उन्होंने पचास से अधिक बार दोहराया। जब भी डोनाल्ड ट्रंप यह बात कहते, तो यहां विपक्षी दलों के नेता प्रधानमंत्री को घेरने का प्रयास करते। उनकी विदेश नीति को लेकर प्रश्न खड़े करने लगते। उसी समय अमेरिका ने एकतरफा टैरिफ बढ़ाने की घोषणा कर दी थी। उस दौर में राष्ट्रपति ट्रंप भारत को लेकर सकारात्मक टिप्पणी नहीं करते थे। एक बार तो उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के डेड (मृत) होने की बात तक कह डाली थी। उनके बयानों पर यहां मोदी विरोधी सक्रिय हो जाते। यह सिलसिला कई महीनों तक चला। इस बीच प्रधानमंत्री कनाडा के दौरे पर गए थे। उनकी और ट्रंप की फोन पर बातचीत हुई। ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी से वाशिंगटन होते हुए भारत लौटने का निमंत्रण दिया। राष्ट्रपति ट्रंप के उस अनुरोध को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देकर टाल दिया था। इसको अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़े कदम के तौर पर देखा गया था। ट्रंप की बयानबाजियों का मोदी ने कोई नोटिस ही नहीं लिया। कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। मोदी की इस उदासीनता के भाव ने अमेरिका के साथ कूटनीतिक संबंधों को नया आयाम दे दिया।
होर्मुज जलमार्ग के बंद होने पर जब कच्चे तेल का संकट हुआ, तो भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चे तेल का आयात जारी स्खा। अमेरिका ने रूस से तेल खरीद पर प्रतिबंध लगाया था, पर भारत-रूस संबंध पर उसका असर नहीं पड़ा। अमेरिका ने एकतरफा प्रतिबंध लगाया था और अपनी तरफ से ही एक महीने की छूट दी। वह छूट भी खत्म हो गई, लेकिन उसके बारे में फिर कोई बयान नहीं आया। इस वर्ष जून में जिस मात्रा में भारत रूस से कच्चा तेल आयात कर रहा है वह एक नया कीर्तिमान बनने की और बढ़ रहा है। शिप ट्रैकिंग डाटा के अनुसार भारत अपनी जरूरतों का 50 प्रतिशत से अधिक तेल रूस से आयात कर रहा है। बिना किसी बयानबाजी के यह काम निर्बाध गति से चलता रहा। यह प्रधानमंत्री मोदी का अपना इकोनामिक्स है, जिसको अंतरराष्ट्रीय राजनय में मोदीनामिक्स कहा जाने लगा है। दरअसल जब राष्ट्रपति ट्रंप मोदी को टफ निगोशिएटर कहते हैं, तो उसके पीछे मोदी की खामोश पर दृढ़ निर्णयों की पृष्ठभूमि है। राहुल गांधी भले ही प्रधानमंत्री मोदी को कंप्रोमाइज्ड प्राइम मिनिस्टर कहें, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रधानमंत्री की जो स्थिति है, वह इस बयान को बचकाना साबित करता है। फ्रांस में जी-7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जितने भी वैश्विक नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं, वे सब इस बात की गवाही देने के लिए पर्याप्त हैं कि मोदीनामिक्स कैसे काम कर रहा है। आज अंतरराष्ट्रीय राजनय में मोदी ने वैश्विक नेताओं के साथ जिस तरह के व्यक्तिगत संबंध बनाए हैं, उसका लाभ देश को हो रहा है। इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भले ही मजाक में कहा हो कि वह और मोदी वायरल कपल हैं, लेकिन इससे दोनों देशों के संबंधों में एक निकटता झलकती है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने जिस तरह से हिंदी में बोलकर प्रधानमंत्री का स्वागत किया और भारत-फ्रांस मैत्री के अमर रहने की बात की, वह दोनों देशों की निकटता को दर्शाता है।
इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया में छिड़े संघर्ष के दौरान जिस तरह से खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत किया, वह भी अंतरराष्ट्रीय राजनय में एक मिसाल है। दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के बाजार की ताकत को न केवल पहचानते हैं, बल्कि अपनी इस ताकत का उपयोग अंतरराष्ट्रीय राजनय में बहुत बेहतर तरीके से करते हैं। बगैर आक्रामक दिखे दृढ़ता से देशहित के लिए कदम उठाते रहते हैं। 150 करोड़ भारतवासियों की ताकत और राजनय में प्रधानमंत्री की गंभीरता मोदीनामिक्स को विशिष्टता प्रदान करती है। यह अनायास नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति कहते हैं कि अगर भारत पर संकट आया, तो अमेरिका साथ खड़ा रहेगा। अगली ही पंक्ति में यह भी कह देते हैं कि जब तक मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। अगर खाड़ी संकट नहीं आता और देश की अर्थव्यवस्था पर उसका असर नहीं पड़ता, तो भारत ने विकास की जो रफ्तार पकड़ी थी वह कायम रहती। खाड़ी संकट के दौरान ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारत ने जिस तरह की रणनीति अपनाई, उसके कारण ही जनता पर बहुत अधिक बोझ नहीं पड़ा। जिस तरह से ऊर्जा चुनौतियों का सामना भारत ने किया और नई जगहों से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया, वह एक केस स्टडी है। आने वाले समय में प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में जब उपलब्धियों और चुनौतियों पर शोधादि होंगे तो मोदीनामिक्स उसके केंद्र में होगा।