भारतीय संस्कृति का विश्व पर प्रभाव  और उड़ता भारत

भारतीय संस्कृति का विश्व पर प्रभाव 

और उड़ता भारत

सतीश शर्मा

संस्कारों द्वारा जीवन के जो भाव कृति में प्रकट हों वे भाव समूह ही संस्कृति कहलाते हैं। सम् उपसर्ग-कृ धातु क्तिन् प्रत्यय। प्रकृति, विकृति, अनुकृति, प्रतिकृति सभी एक ही धातु से निर्मित। भूख लगने पर खाना प्रकृति, भूख न होने पर भी खाना अथवा बिना परिश्रम किये दूसरों से छीनकर खाना विकृति तथा स्वयं भूखे रहकर भी दूसरों को खिलाना संस्कृति है।भारतीय संस्कृति केवल एक विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान में वैश्विक जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है।

भारतीय संस्कृति ने योग, ध्यान, आयुर्वेद, दर्शन, कला (संगीत, नृत्य, वास्तुकला), और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे सिद्धांतों के माध्यम से विश्व पर गहरा और सकारात्मक प्रभाव डाला है, जिससे आध्यात्मिक शांति, सहिष्णुता और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला है, विशेषकर दक्षिण-पूर्व एशिया और बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ । भारत से उत्पन्न योग और ध्यान ने तनाव कम करने, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के लिए विश्वव्यापी लोकप्रियता हासिल की है । संस्कृति और सांस्कृतिक शब्द का दुरुपयोग- आजकल के केवल नृत्य अदि रंगमञ्चीय कार्यक्रम सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं। इनमें व स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा किये गये सांस्कृतिक कार्यों में बहुत अन्तर यह समझना आवश्यक है।

वसुधैव कुटुम्बकम् एक संस्कृत वाक्यांश है, “वसुधा” (पृथ्वी) + “एव” (ही) + “कुटुम्बकम्” (परिवार) = पृथ्वी ही परिवार है-  महा उपनिषद, जिसका अर्थ है “पूरी पृथ्वी एक परिवार है”।  यह भारतीय दर्शन का मूल मंत्र है जो सार्वभौमिक भाईचारे, एकता और सभी प्राणियों के परस्पर जुड़ाव पर जोर देता है, जिसका अर्थ है कि सभी मनुष्य एक वैश्विक परिवार के सदस्य हैं और हमें दया, करुणा और सम्मान के साथ रहना चाहिए. यह सिद्धांत महा उपनिषद सहित कई ग्रंथों में पाया जाता है और भारतीय संसद के प्रवेश द्वार पर भी अंकित है। यह संकीर्ण सोच (यह मेरा, यह पराया) को त्यागकर उदार हृदय से पूरी दुनिया को अपना परिवार मानने का संदेश देता है, जैसा कि श्लोक में कहा गया है – “अयं निजः परोवेती गणना लघुचेतसाम् ।  उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्”।। 

यह वैश्विक शांति, सहयोग और एकजुटता को बढ़ावा देता है, और कोविड-19 जैसी वैश्विक आपदाओं के दौरान एकजुट होकर काम करने की प्रेरणा देता है। भारत ने G20 जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इस सिद्धांत का उपयोग वैश्विक सहयोग और समावेशी विकास के लिए किया है। हम इस कहानी के माध्यम से भी समझ सकते है । 

एक घने जंगल में, एक बुद्धिमान कौआ और एक भोला हिरण बहुत अच्छे दोस्त थे। वे अक्सर साथ खेलते और बातें करते। एक दिन, वहाँ एक चालाक सियार आया। उसने हिरण को अकेला देखकर सोचा, “इसे कैसे फँसाया जाए?” सियार ने हिरण के पास जाकर कहा, “प्रिय मित्र, तुम इतने अकेले क्यों हो? हम सब तो एक ही परिवार के सदस्य हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ – पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है। हम सबको मिलकर रहना चाहिए।” हिरण सियार की बातों से प्रभावित हुआ और बोला, “हाँ, तुम सही कह रहे हो। मैं भी यही सोचता हूँ।” कौआ, जो यह सब सुन रहा था, उड़कर आया और बोला, “हिरण, सियार की बातों में मत आओ। वह तुम्हें खाने का इरादा रखता है। यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का झूठा प्रयोग कर रहा है।” लेकिन हिरण ने कौए की बात नहीं मानी। वह सियार के साथ आगे बढ़ गया। सियार उसे एक घनी झाड़ी की ओर ले गया, जहाँ उसके साथी भेड़ियों और दूसरे शिकारी जानवर छिपे थे। जैसे ही हिरण झाड़ी के पास पहुँचा, सियार उस पर झपटा। तभी कौए ने ज़ोर-ज़ोर से शोर मचाया और अपने दूसरे पक्षी दोस्तों को बुलाया। सारे पक्षी सियार और उसके साथियों पर चोंच मारने लगे। सियार और उसके साथियों ने भागना शुरू कर दिया। हिरण को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह कौए के पास गया और बोला, “तुमने मेरी जान बचाई। मैं तुम्हारी बात न मानकर मूर्ख बन गया।” कौए ने कहा, “हाँ, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ एक महान विचार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपने शत्रुओं और स्वार्थी लोगों पर आँख बंद करके भरोसा करें। हमें हमेशा अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग करना चाहिए।” ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ सभी के प्रति प्रेम और सद्भाव है, लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि कुछ लोग इस महान विचार का दुरुपयोग कर सकते हैं। हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए और अपनी बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए ताकि हम किसी धोखे का शिकार न बनें। यह हमें याद दिलाता है कि वास्तव में, पृथ्वी पर हर जीव एक परिवार है और हमें सबका ख्याल रखना चाहिए, लेकिन समझदारी के साथ। 

 बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ स्तूप, शिखर (पगोड़ा), और तोरण जैसे भारतीय स्थापत्य लक्षण पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया (जैसे जावा) की वास्तुकला का अभिन्न अंग बन गए हैं ।  ब्राह्मी लिपि से निकली लिपियों और संस्कृत भाषा का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशियाई भाषाओं और शिलालेखों में स्पष्ट दिखता है। भारतीय नृत्य (कथक, भरतनाट्यम) और संगीत की समृद्ध परंपराएँ विश्व भर में सराही जाती हैं । प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद, प्राकृतिक उपचार और स्वास्थ्य के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करती है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी है। शून्य (0) की खोज का श्रेय मुख्य रूप से प्राचीन भारत के गणितज्ञों को दिया जाता है, खासकर ब्रह्मगुप्त (7वीं शताब्दी) को जिन्होंने इसे एक संख्या के रूप में परिभाषित किया और इसके गणितीय नियम बनाए, और आर्यभट्ट (5वीं शताब्दी) को जिन्होंने इसे एक बिंदु के रूप में दर्शाया, जिससे यह एक स्थान-धारक से पूर्ण संख्या बन गया, जिसने आधुनिक गणित की नींव रखी और जटिल गणनाओं को संभव बनाया । शुरुआती अवधारणा (स्थान-धारक): प्राचीन मेसोपोटामिया और माया सभ्यताओं में खाली स्थान दिखाने के लिए शून्य जैसे प्रतीक का उपयोग किया जाता था, लेकिन यह एक संख्या नहीं थी, सिर्फ एक प्लेसहोल्डर (स्थान-धारक) था। आर्यभट्ट (लगभग 476 ईस्वी) इन्होंने ‘आर्यभटीय’ में शून्य को एक बिंदु (डॉट) के रूप में दर्शाया, जो इसे एक संख्या के रूप में समझने में महत्वपूर्ण था । ब्रह्मगुप्त (7वीं शताब्दी) इन्होंने शून्य को एक संख्या के रूप में औपचारिक रूप से मान्यता दी, इसके जोड़, घटाव के नियम लिखे और “ब्रह्मस्फुटसिद्धांत” नामक पुस्तक में इसका वर्णन किया । पश्चिम में प्रसार, शून्य की अवधारणा अरब जगत से होते हुए यूरोप पहुँची, जहाँ इसे स्वीकार करने में कुछ समय लगा, क्योंकि यह पारंपरिक गणितीय विचारों को चुनौती देता था। शून्य के बिना, आज की दशमलव प्रणाली और जटिल गणनाएँ संभव नहीं होतीं । यह विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कंप्यूटर लॉजिक का आधार है। भास्कराचार्य (12वीं शताब्दी) ने शून्य से संबंधित नियमों, जैसे 1/0 = अनंत (Infinity) को प्रतिपादित किया। संक्षेप में, शून्य की अवधारणा प्राचीन सभ्यताओं में थी, लेकिन इसे एक संख्या और गणितीय अवधारणा के रूप में विकसित करने का श्रेय प्राचीन भारत के गणितज्ञों, विशेषकर आर्यभट्ट और ब्रह्मगुप्त को जाता है, जिसने दुनिया को एक नया गणितीय आयाम दिया।  शून्य (शून्य), दशमलव प्रणाली और बीजगणित जैसी भारतीय गणितीय अवधारणाओं ने वैश्विक वैज्ञानिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 

 ‘सर्व संप्रदाय का सिद्धांत भारतीय संस्कृति की सहिष्णुता और विविधता में एकता की भावना को दर्शाता है। भारतीय संस्कृति में सहिष्णुता एक गहरा और प्राचीन मूल्य है, जो विविधता में एकता, विभिन्न संप्रदाय और विचारों के प्रति सम्मान तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को दर्शाता है, जिसकी जड़ें प्राचीन दर्शन, संविधान और सामाजिक प्रथाओं में निहित हैं, हालांकि समय के साथ इसमें चुनौतियाँ भी आई हैं, लेकिन यह भारतीय पहचान का एक अहम हिस्सा है। भारतीय संस्कृति ने जीवन में शांति, धैर्य और सद्भाव के मूल्यों को बढ़ावा दिया है, जो आधुनिक जीवन की भागदौड़ में महत्वपूर्ण हैं। शांति, धैर्य और सद्भाव जीवन के तीन महत्वपूर्ण गुण हैं जो आंतरिक स्थिरता, तनाव मुक्ति और दूसरों के साथ सामंजस्य बिठाने में मदद करते हैं, जहाँ शांति मन की स्थिरता है, धैर्य सही समय का इंतज़ार है, और सद्भाव आपसी समझ और संघर्ष-मुक्त संबंध है।  ये तीनों मिलकर एक सुखी और संतुलित जीवन का आधार बनाते हैं, जिसके लिए निरंतर अभ्यास और स्वीकृति की आवश्यकता होती है । 

भारतीय रेशम मार्ग  प्राचीन और मध्यकाल के दौरान एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्गों का एक विशाल नेटवर्क था, जो मुख्य रूप से चीन से शुरू होकर भूमध्य सागर तक जाता था और रेशम के भारी व्यापार के कारण इसे यह नाम मिला । यह सिर्फ रेशम ही नहीं, बल्कि मसाले, अनाज, कपड़े, धातुएं और विचारों के आदान-प्रदान का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम था, जिसने विभिन्न सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक जुड़ाव बढ़ाया ।  भारतीय संस्कृति ने अपनी प्राचीनता, विविधता और गहरे आध्यात्मिक तथा दार्शनिक मूल्यों के माध्यम से विश्व के कई हिस्सों को प्रभावित किया है, जिससे वैश्विक समझ और मानव जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि हुई है। आज योग और आयुर्वेद पूरे विश्व को स्वास्थ्य की एक नई परिभाषा व दिशा तय कर रहा है। विश्व अपने परिवार को बचाने के लिए भारतीय परिवार की व्यवस्था को समझने के लिए भारत की ओर देख रहा है ‌। भगवत गीता का संदेश पूरे विश्व में शांति सद्भाव और कर्म योग का संदेश पहुंचा रहा है। जहां हम अध्यात्म में विश्व का मार्गदर्शन करने के लिए तैयार है, वहीं रक्षा क्षेत्र, अंतरिक्ष,वैज्ञानिक व तकनीकी क्षेत्र में भी अब हम विश्व में अग्रणी देशों की श्रेणी में आ रहे हैं।

ओर अंत मे हम कहे की योग और आयुर्वेद आज दुनिया भर में शारीरिक और मानसिक कल्याण के प्रमुख साधन बन गए हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ की वैश्विक स्वीकार्यता इसका प्रमाण है। 2025 में ‘दीपावली’ को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया जाना भारत की बढ़ती सांस्कृतिक शक्ति को दर्शाता है ।  भारत की पारंपरिक जीवन शैली जिसे वैश्विक स्तर पर सराहा जा रहा है, पर्यावरण संरक्षण के लिए दुनिया को एक नया रास्ता दिखा रही है। ‘शून्य’ का आविष्कार और प्राचीन खगोलीय ज्ञान आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति की नींव रहे हैं। भारतीय संगीत, नृत्य और विविध व्यंजन आज दुनिया के हर कोने में अपनी पहचान बना चुके हैं। भारत 2026 में ‘इंडिया AI इम्पैक्ट समिट’ जैसे आयोजनों के माध्यम से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल क्रांति का नेतृत्व कर रहा है। भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, जिसका लक्ष्य आने वाले वर्षों में और भी ऊंचे पायदान पर पहुँचना है।अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण और ऐतिहासिक विरासतों का जीर्णोद्धार भारत के आत्मविश्वास और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का प्रतीक है। स्वदेशी फाइटर जेट्स और इसरो (ISRO) के किफ़ायती अंतरिक्ष मिशनों ने ‘उड़ता भारत’ को नई ऊंचाइयां दी हैं। इसी क्रम मे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पंच परिवर्तन, हमारे जीवन में सामाजिक मूल्यों के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए जो पांच बिंदु दिए हैं उनसे एक व्यापक बदलाव आने की संभावना है। स्व का बोध, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, सामाजिक सद्भाव व नागरिक कर्तव्य यह पांच बिंदु हैं। 

बहुत शीघ्र हम प्रार्थना की ये लाइन साकार करने वाले है –

 परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्।।

भारत माता की जय 

आओ नवयुग की प्रतिमा मे करें प्रतिष्ठा प्राण की । 
अज्ञान को दूर भगाएं ज्ञान का उजाला करें।
गरीब बेसहारा बच्चों कि शिक्षा हेतु सहायता करने के लिए निम्नलिखित खाते में दान करें।
सुमन संगम आश्रय 
अकाउंट नंबर 44629950112
IFSC code – SBIN0061208
State Bank of India Sector 77 Noida 

 

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