सनातन धर्म ओर उसकी आचार संहिता को जाने 

सनातन धर्म ओर उसकी आचार संहिता को जाने 

सतीश शर्मा

 सनातन का अर्थ है शाश्वत या हमेशा बना रहने वाला अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। ‘ जैसे भगवान शाश्वत ( सनातन) हैं, ऐसे ही सनातन धर्म भी शाश्वत है। भगवान ने तो सनातन धर्म को अपना स्वरूप बताया है। ब्राह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्म च शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च । ।”श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत्” (जो स्वयं को अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरों के साथ न करें), और “धर्मो रक्षति रक्षितः” (धर्म की रक्षा करने पर वह हमारी रक्षा करता है), जो सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों जैसे सत्य, अहिंसा, और कर्तव्य पर जोर देते हैं। सनातन धर्म का अर्थ है ‘शाश्वत धर्म’ या ‘शाश्वत व्यवस्था’, जो सदा से चला आ रहा है और जिसका न कोई आदि है न अंत यह हिंदू धर्म का ही दूसरा नाम है जो भारत की प्राचीन वैदिक परंपरा पर आधारित है और इसमें सभी के लिए समान, पवित्र आचरण और शाश्वत कर्तव्यों पर जोर दिया जाता है, जिसका लक्ष्य मन को प्रकृति से उठाकर आत्मा की ओर ले जाना और दुख से मुक्ति पाना है। ऐतिहासिक जड़ें,यह भारत की सबसे प्राचीन परंपरा है, जिसकी जड़ें वैदिक शास्त्रों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) में मिलती हैं, और यह किसी एक व्यक्ति या समय से सीमित नहीं है। सार्वभौमिकता और समानता,इसमें कोई भेदभाव नहीं है, सभी वर्ण, जाति और पंथ के लोग एक साथ आ सकते हैं, जो सार्वभौमिक सिद्धांतों और आचरण पर आधारित है, न कि केवल प्रतीकों पर। आत्मा को प्रकृति के बंधनों से मुक्त करके परमात्मा से जोड़ना और दुख से मुक्ति दिलाना इसका मुख्य लक्ष्य है, जहाँ आचरण की पवित्रता सर्वोपरि है।

 सनातन धर्म, वैदिक धर्म, और हिंदू धर्म एक ही परंपरा के विभिन्न नाम हैं, जिसमें ‘सनातन धर्म’ आंतरिक, स्वदेशी पहचान को दर्शाता है। सनातन धर्म एक शाश्वत जीवन पद्धति है जो सत्य, अहिंसा, दया, और पवित्र आचरण के माध्यम से आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग दिखाती है, और यह सभी के लिए खुला है। सनातन धर्म में आचरण संहिता का अर्थ जीवन जीने के नैतिक सिद्धांत और कर्तव्य हैं, जो सत्य, अहिंसा, तप, शौच, संतोष, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान जैसे यम-नियमों पर आधारित हैं, जिनका पालन व्यक्ति को सुखी, शक्तिशाली और आध्यात्मिक बनाता है, जिसमें इंद्रियों पर नियंत्रण, परोपकार, प्रामाणिक व्यवहार और दैनिक प्रार्थना/जप शामिल हैं, जिससे आंतरिक शुद्धि और सामंजस्य स्थापित होता है। हमेशा सच बोलना, किसी को मन, वचन या कर्म से नुकसान न पहुँचाना। अस्तेय (चोरी न करना) और अपरिग्रह (संग्रह न करना): लोभ और लालच से बचना। ब्रह्मचर्य (संयम) और तप, इंद्रियों को नियंत्रित करना, व्रत रखना, सादा जीवन जीना। शौच (पवित्रता) और संतोष, शारीरिक और मानसिक शुद्धि, जो आचमन (पानी पीने) से भी होती है, और जो है उसमें संतुष्ट रहना। स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान, आत्म-अध्ययन, मंत्रों का जाप और ईश्वर के प्रति समर्पण। दूसरों की भलाई करना, दयालुता और करुणा का अभ्यास करना। मन को एकाग्र करना और इष्टदेव का स्मरण करना। दैनिक प्रार्थना, प्राणायाम और गायत्री जप से शरीर, मन और बुद्धि को शुद्ध करना लघुशंका, शौच और भोजन के बाद आचमन करना, जो मन को शुद्ध करता है बड़ों का सम्मान करना और दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना जैसा आप अपने लिए चाहते हैं (भीष्म का उपदेश)।  यह आचरण संहिता व्यक्ति को आंतरिक शांति, आत्म-नियंत्रण और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है, जिससे जीवन में संतुलन और सद्भाव बना रहता है।

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