औरत
नोरीन शर्मा 
सीखती रही वो,गर्दन नीची कर,पढ़ने जाना..
मौन का टेप,मुँह पे चस्पा कर ,किसी से नज़र न मिलाना
हँसते हुए ,आवाज़ और दंतपंक्ति पर,अंकुश लगाना
बहुत होनहार विद्यार्थी थी वो,झट से ससुराल के नियम क़ायदे सीख
गुणवती बहू,कहलाने लगी..!!
दिन बीते,वर्ष बीते,पचास पार,दो बहुओं की सास बनी…!
रसोई सौंप,वो भी गंगा नहाने ,अपने पति संग जाने के सपने,बुनने लगी…!
सेवानिवृत्ति ,केवल पुरुषों की होती है ,उनके दफ्तरों से…
स्त्रियों के हिस्से,नाती – नातिन,पोते – पोती के साथ
गृहस्थी का दायित्व किसी अदृश्य डोर से बंधा मिलता है!
बालकनी में आराम से बैठ,चाय की चुस्की ,बस ख़्वाबों तक सीमित है ….
अल्लसुब्ह की भागमभाग,चढ़ती दोपहरी तक,सन्नाटे में तब्दील हो
सांय सांय कानों को बेधती ,बेशर्मी से पसर जाती है..!!!
सीखने की कोई उम्र नहीं होती,सुनती रही जीवन भर,सच,अब भी सीख रही है
टीसती बाहों में नन्हें को खिलाना,जोड़ों की कर्कश आवाज़ को
अनसुना कर रसोई से कमरों तक,दौड़ लगाना..
बदलते चश्मे के नंबर के बावजूद,ख़ुद को पढ़ना
ऊंचा सुनाई देने के बावजूद,ख़ुद की सुनना
ख़ुद को बिखरने से बचाए रखने की ख़्वाहिश
और,ख़ुद अपने लिए जीने की,जी तोड़ कोशिश..!!
साँझ ढले ,अपने हिस्से के,नन्हे रक्तिम
आसमान को बाहों में लिए,ऊंचे दरख़्तों की फुनगियों पे तिरते
ख़्वाबों को जीभर जीने की,पुरज़ोर तमन्ना लिए
वो हर दिन पढ़ने बैठ जाती है ,हर दिन उकेरती है,कुछ लम्हे,
हर नई सुबह ,अपने ,और अपनों के लिए
गुनगुनाती है ,गुलाबी सपनों की तहरीर,और
उनकी ताबीर,जिसकी इबारत
उसने ख़ुद उसने लिखी है;अपनी हथेलियों के सफ़े पर…!!!
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नौरीन जी, आपने एक औरत के जीवन को बखूबी समझा है । जिन शब्दों में आपने औरत के जीवन को उकेरा है वह बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। औरतें हर पल सीखती है, गुनती है……. । औरतों के जीवन पर बहुत ही सुंदर शब्दों में आपने भावाभिव्यक्ति की है।