खेल तो छोड़ दो नेता जी
ललित शंकर हरिद्वार 
भारत के नेताओ ने भारत का राजनीतिक स्तर इतना नीचे गिरा दिया है कि समझ नही आता कि ये भारत के नेता है या फिर विदेश के।जनता, जाति, धर्म ,सेना के बाद अब भारत का विपक्ष खेल पर भी राजनीति करने लगा है।भारत के नेता कभी सैनिकों की वीरता पर संदेह करके राजनीति करते हैं,कभी राफेल जैसे रक्षक विमानों की खरीद पर राजनीति करते है।अब तो भारत के विपक्ष ने खेल को भी नही छोड़ा।अभी भारतीय क्रिकेट टीम ने जब टी20 विश्व विजेता बनकर भारत का गौरव विश्व मे बढ़ाया तो पूरा भारत झूम उठा,लेकिन भारत के कुछ नेता उसमे राजनीति करने लगे। विजय के विश्व कप ट्रॉफी को लेकर आईसीसी के चेयरमैन जय शाह,भारत के मुखकोच गौतम गम्भीर भारत के कप्तान सूर्यकुमार यादव अहमदाबाद में स्टेडियम के नजदीक हनुमान मंदिर गए,इनके साथ ओर भी खिलाड़ी गए थे। इन सभी ने भगवान के दर्शन किये और भारत की जीत पर भगवान को धन्यवाद दिया।इसके तुरंत बाद भारत के नेताओ के शरीर मे राजनीतिक खुजली शुरू हो गई।टीएमसी के नेता तथा 1983 के विश्वकप टीम के सदस्य कीर्ति आजाद ने मन्दिर जाने का विरोध करते हुए बड़ा बयान देते हुए कहा कि ट्रॉफी मन्दिर क्यो लेकर गए,मन्दिर लेकर गए तो फिर मस्जिद व चर्च भी लेकर जाना चाहिए।कांग्रेस सांसद परगट सिंह ने कहा कि खेल को धर्म से अलग रखना चाहिए,कांग्रेस के ही नेता तारिक अनवर तथा जेएमएम नेता महुआ मांझी ने कहा कि ट्रॉफी मन्दिर ले जाना गलत परम्परा,कांग्रेस के की सुखदेव भगत सिंह सहित कई नेताओं ने मन्दिर जाने का विरोध किया।समझने की बात ये कि विरोध ट्रॉफी ले जाने का हो रहा या फिर मन्दिर जाने का।वास्तव में विरोध मन्दिर का हो रहा है।भारतीय टीम ने मैच से पहले मन्दिर जाकर भगवान से विजय की प्रार्थना की थी।उनकी आस्था के अनुसार उनको विजय मिल गई।जिसके बाद ईश्वर में शृद्धा रखने वाले खिलाड़ी मन्दिर चले गए।उसमे राजनीति करने की क्या आवश्यकता है।इससे पहले भी कई बार खिलाई मन्दिर गए है।अभी महिला विश्वकप जितने पर भारतीय महिला टीम सामूहिक रूप से भगवान महाकाल के दर्शन करने गई थी।रोहित शर्मा की टीम भी विजय के बाद भगवान के दर्शन करने गई थी,क्रिकेट के अतिरिक्त अन्य कई खिलाड़ी ईश्वर में आस्था रखकर खेल खेलते है।जितने पर ईश्वर का आशीर्वाद मानते हैं।पेरिस ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता मनु भाकर ने पदक जीतने पट भगवत गीता को जीत का श्रेय देते हुए कहा कि मैं हमेशा गीता साथ रखती हूं,ओलंपिक में स्वर्ण पदक दिलाकर भारत का मान बढ़ाने वाले नीरज चोपड़ा भारत आते ही सबसे पहले पदक के साथ महाकाल के दर्शन करने गए और महाकाल को धन्यवाद दिया।महान क्रिकेटर विराट कोहली मैच से पहले पत्नी के साथ कैंची धाम गए,जिसके बाद उन्होंने लगातर 2 शतक लगाए,जिसका श्रेय ईश्वर को दिया।ये सब विषय आस्था का है।जिसकी जिसमे आस्था है ।पूर्व के मो अजहरउद्दीन की कप्तानी में कई बार मुस्लिम खिलाड़ी जीत के लिए दरगाह गए।कीर्ति आजाद ,तारिक अनवर जैसे लोग कंही न कंही इस बात को तूल देकर उसपर मजहबी राजनीति करना चाहते हैं।कांग्रेस सपा ,टीएमसी सहित कई दलों के बड़े बढे नेता चुनावी जीत के लिये दरगाह जाते हैं।कभी कोई कुछ नही बोलता।कीर्ति आजाद ने कहा कि ट्रॉफी मस्जिद व चर्च भी ले जानी चाहिए।समझने का विषय है कि मना किसने किया ले जाने को।जो मन्दिर लेकर गए वो हिन्दू व भगवान में आस्था रखने वाले थे।तो वो ले गए।अगर मोहम्मद सिराज कहते कि कहते कि मैं ट्रॉफी को मस्जिद ले जाऊं तो कोई मना थोड़े करता।विषय ट्रॉफी मन्दिर ले जाने का नही है।कीर्ति आजाद जैसे नेताओं को बस इस देश मे हिन्दू मुसलमान करके मुस्लिम वोटों की राजनीति करनी है।कीर्ति आजाद के बयान से पहले देश मे किसी ने भी इसकी चर्चा नही की।सब जीत की खुशी में मग्न थे।परंतु निश्चित ही कीर्ति आजाद के बयान के बाद लोग सोचने तो लगे ही होंगे।भारत के नेताओ को खेल में तो राजनीति नही करनी चाहिए।भारत की टीम किसी धर्म की नही बल्कि देश की टीम है।चूंकि भारत आस्थावान देश है इसलिये इसी आस्था के कारण भारत के कप्तान व कोच ट्रॉफी लेकर मन्दिर चले गए।वो इसलिए क्योंकि इसी मंदिर में कोच व कप्तान ने भगवान से जीत के लिये आशीष मांगा था।भारत के पूर्व खिलाफ हरभजनसिंह ने कीर्ति आजाद के बयान पर कहा है कि खेल पर तो राजनीति न ही करो।ट्रॉफी मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे चर्च कंही भी ले जाओ।उन्होंने कीर्ति आजाद का नाम लेकर कहा कि खेल को राजनीति से दूर ही रहने दो।भारत की जनता को कीर्ति आजाद जैसे नेताओं की बात पर ध्यान न देकर जीत पर गर्व करना चाहिए।
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