जाने नवरात्र तिथि,पूजा विधि व माता के नौ रूप

जाने नवरात्र तिथि,पूजा विधि व माता के नौ रूप

सतीश शर्मा

नवरात्रि के पहले दिन (प्रतिपदा) कलश स्थापना (घटस्थापना) शुभ मुहूर्त में की जाती है। 

नवरात्रि पूजा व कलश स्थापना विधि – सुबह स्नान के बाद स्वच्छ कपड़े पहनें और पूजा स्थल को साफ करें, एक चौड़े मुंह वाले मिट्टी के पात्र में मिट्टी भरकर जौ (सप्त धान्य) के बीज बोएं। मिट्टी या तांबे के कलश पर कलावा बांधें और हल्दी या कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। कलश में गंगाजल और शुद्ध जल भरें। फिर उसमें हल्दी की गांठ, सुपारी, सिक्का, लौंग और इलायची डालें। कलश के मुंह पर आम के 5 पत्ते (या अशोक के पत्ते) रखें। जटा वाले नारियल पर लाल चुनरी लपेटकर, कलावा बांधें और उसे कलश के ऊपर रखें। स्थापना: इस कलश को जौ वाले पात्र के बीच में स्थापित करें और माता दुर्गा की प्रतिमा के दाईं ओर रखें। गणेश जी का ध्यान करने के बाद मां शैलपुत्री की पूजा करें, दीपक जलाएं और अखंड ज्योति (यदि संभव हो) प्रज्वलित करें।

नवरात्रि के पहले दिन (प्रतिपदा) कलश स्थापना (घटस्थापना) शुभ मुहूर्त – 19 मार्च को कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त निम्नलिखित हैं।

सुबह का श्रेष्ठ मुहूर्त – 06:26 बजे से 07-57 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त – 12-04 बजे से 12-53 दोपहर बजे तक

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें शर्मा जी 9560518227 

वासंतिक नवरात्रि 2026

19 मार्च 2026 गुरुवार मां शैलपुत्री पूजा, घटस्थापना

20 मार्च 2026 शुक्रवार मां ब्रह्मचारिणी पूजा

21 मार्च 2026 शनिवार  मां चंद्रघंटा पूजा

22 मार्च 2026 रविवार  मां कुष्मांडा पूजा

23 मार्च 2026 सोमवार मां स्कंदमाता पूजा

24 मार्च 2026 मंगलवार  मां कात्यायनी पूजा

25 मार्च 2026 बुधवार मां कालरात्रि पूजा

26 मार्च 2026 गुरुवार  मां महागौरी पूजा, अष्टमी

27 मार्च 2026 शुक्रवार  मां सिद्धिदात्री पूजा, नवरात्रि पारण ।

प्रथम नवरात्र – नवरात्रि के पहले दिन, यानी की  प्रतिपदा वाले दिन , माता के शैलपुत्री रूप की पूजा की जाती है। शैलपुत्री माता, पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण माता पार्वती को शैलपुत्री कहा जाता है। मां दुर्गा के नौ रूपों में शैलपुत्री प्रथम स्वरूप हैं। सौम्यता, करुणा और धैर्य का प्रतीक – आदिशक्ति के इस स्वरूप को सौम्यता, करुणा, स्नेह और धैर्य का प्रतीक माना जाता है। माता को सफेद रंग की चीजें प्रिय हैं, इसलिए उन्हें सफेद बर्फी, दूध से बनी मिठाई, हलवा, रबड़ी या मावे के लड्डू आदि का भोग लगाना चाहिए।  

द्वितीय नवरात्र – नवरात्रि के दूसरे दिन माता दुर्गा के ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा की जाती है,ब्रह्मचारिणी माता, जो तपस्या, त्याग और वैराग्य का प्रतीक है । देवी ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, इसलिए उन्हें तपस्या का प्रतीक माना जाता है. उन्हें ज्ञान, तपस्या और वैराग्य की देवी भी माना जाता है. साधना और दृढ़ संकल्प के द्वारा उनकी आराधना से साधक को अपार शक्ति और दृढ़ संकल्प की प्राप्ति होती है। उनके एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में जप माला होती है। नवरात्रि के दूसरे दिन उनकी पूजा करने का विधान है। मंत्र – देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥ भोग – माता को दूध से बनी चीजें या चीनी का भोग लगाएं. 

तृतीय नवरात्र इस दिन माता के नौ स्वरूपों में से माता का तीसरा रूप चंद्रघंटा है, जो शक्ति, शांति और साहस का प्रतीक है उसकी पूजा होती है ।  माता चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत शांत और कल्याणकारी है। माता के  माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसलिए उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। माता की बाघ पर सवार होती हैं. वे साहस, शांति और समृद्धि का प्रतीक हैं। नवरात्रि के तीसरे दिन उनकी पूजा की जाती है. उन्हें दूध से बनी मिठाई, खीर या शहद का भोग लगाया जाता है । मंत्र – “या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः॥” नवरात्रि के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की कथा सुनी जाती है । शुभ रंग – लाल रंग। 

चतुर्थ नवरात्र – नवरात्रि के चौथे दिन, माता दुर्गा के कुष्मांडा रूप की पूजा की जाती है, जिन्हें सृष्टि की रचना करने वाली और अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है।  मान्यता है कि जब सृष्टि का निर्माण नहीं हुआ था, तब कुष्मांडा माता ने अपनी हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी. कुष्मांडा माता को आठ भुजाओं वाली देवी के रूप में भी जाना जाता है। माता की पूजा से भक्तों के कष्ट, रोग और शोक दूर होते हैं, और उन्हें दीर्घायु, यश और समृद्धि प्राप्त होती है ।  नवरात्रि के चौथे दिन, कुष्मांडा माता की पूजा करने के लिए, स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें, पूजा स्थल को शुद्ध करें, माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें, और उन्हें फूल, माला, फल, और भोग अर्पित करें। मंत्र – “वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढा अष्टभुजा कुष्माण्डा यशस्वनीम्॥” माता को सफेद चीजों का भोग लगाना शुभ माना जाता है। पूजा के अंत में माता की आरती करें।  कुष्मांडा माता को कुम्हड़े (कद्दू) का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। 

पंचम नवरात्र – नवरात्रि के पांचवे दिन, माता दुर्गा के स्कंदमाता रूप की पूजा की जाती है, जो भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता हैं। स्कंदमाता को कमल के आसन पर विराजमान दर्शाया जाता है, और उनकी गोद में शिशु स्कंद (कार्तिकेय) बैठे होते हैं। स्कंदमाता की पूजा करने से संतान सुख, सुख-समृद्धि, और मोक्ष की प्राप्ति होती है। स्कंदमाता को केले का भोग लगाना चाहिए। मंत्र – “सिंहासनगता नित्यं, पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी, स्कंदमाता यशस्विनी”।। 

स्कंदमाता को पद्मासना देवी भी कहा जाता है।  

षष्टम नवरात्र नवरात्रि के छठे दिन, यानी षष्ठी तिथि को, मां दुर्गा के छठे स्वरूप, मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। मां कात्यायनी को ऋषि कात्यायन की पुत्री माना जाता है, इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा। नवरात्रि के छठे दिन, मां कात्यायनी की पूजा करने से व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए मां कात्यायनी की आराधना की थी। नवरात्रि के छठे दिन लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए. मां कात्यायनी को गेंदे के फूल प्रिय हैं। 

ध्यान मंत्र – वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥ 

सप्तम नवरात्र – नवरात्रि के सप्तमी वाले दिन, माता दुर्गा के सातवें रूप, मां कालरात्रि की आराधना की जाती है. मान्यता है कि माँ कालरात्रि की पूजा करने से सभी प्रकार के भय, बाधाएं और नकारात्मकता का नाश होता है। सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें. माता की प्रतिमा को गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएं. माता को लाल रंग के वस्त्र, रोली, कुमकुम, पुष्प, धूप, और दीप अर्पित करें. गुड़ और उड़द से बने पदार्थों का भोग लगाएं। मां कालरात्रि के मंत्रों का जाप करें।  

मंत्र – “ॐ कालरात्र्यै नमः” “या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः” ।। मां कालरात्रि को गुड़ और उड़द से बने पदार्थों का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि मां कालरात्रि त्रिनेत्र वाली देवी हैं और उनकी सवारी गर्दभ है।  

अष्टम नवरात्र – नवरात्रि के अष्टमी तिथि पर, माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप, माँ महागौरी की पूजा की जाती है। माँ महागौरी का स्वरूप रंग अत्यंत गोरा होता है. उनकी चार भुजाएँ होती हैं. वे बैल (वृषभ) की सवारी करती हैं।  वे भगवान शिव की अर्धांगिनी मानी जाती हैं. वे प्रेम, मातृत्व, पवित्रता और सुंदरता की प्रतीक हैं। अष्टमी तिथि को धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन कन्या पूजन और हवन का आयोजन किया जाता है।  इस दिन माँ की आराधना करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। माँ महागौरी को सफेद वस्त्र और आभूषण अर्पित करें।  सफेद रंग की मिठाई और नारियल की खीर भोग में चढ़ाएं. पीले, लाल और सफेद रंग के फूल अर्पित करें।  “महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा” मंत्र का जाप करें। 

नवमं नवरात्र – नवरात्रि के नौवें दिन, जिसे महानवमी भी कहते हैं, माता का रूप सिद्धिदात्री होता है। यह माता दुर्गा का नौवां और अंतिम स्वरूप है, जो सभी सिद्धियों की दाता मानी जाती हैं। सिद्धिदात्री का अर्थ है, जो सिद्धियों को प्रदान करने वाली है। माता सिद्धिदात्री को सभी प्रकार की सिद्धियों की देवी माना जाता है। माता सिद्धिदात्री चार हाथों वाली होती हैं, कमल पर विराजमान होती हैं और उनका वाहन सिंह होता है। माता सिद्धिदात्री की पूजा करने से भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं और सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। माता को खीर, पूरी और हलवा का भोग लगाया जाता है। माता दुर्गा के नौ रूपों में से अन्य रूप हैं: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि और महागौरी।

एक स्त्री के पूरे जीवनचक्र का बिम्ब है नवदुर्गा के नौ स्वरूप-
1. जन्म ग्रहण करती हुई कन्या “शैलपुत्री” स्वरूप है !
2. कौमार्य अवस्था तक “ब्रह्मचारिणी” का रूप है !
3. विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह “चंद्रघंटा” समान है !
4. नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह “कूष्मांडा” स्वरूप है !
5. संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री “स्कन्दमाता” हो जाती है !
6. संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री “कात्यायनी” रूप है !
7. अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह “कालरात्रि” जैसी है !
8. संसार ( कुटुंब ही उसके लिए संसार है ) का उपकार करने से “महागौरी” हो जाती है !
9. धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार मे अपनी संतान को सिद्धि ( समस्त सुख-संपदा ) का आशीर्वाद देने वाली “सिद्धिदात्री” हो जाती है । 

शिक्षा का यह प्रसार केवल समाज के सामूहिक सहयोग से ही संभव है। आप हमारे साथ सहयोगी के रूप में जुड़कर या ‘शिक्षा दान’ के माध्यम से इस नेक कार्य में सहभागी बन सकते हैं।

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2 thoughts on “जाने नवरात्र तिथि,पूजा विधि व माता के नौ रूप”

  1. Purushottam taparia

    राम राम जय गौ माता की।जय मां अपने नव रूपों में हम सभी को सद्बुद्धि दे। विश्व बंधुत्व की भावना जगे। सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया।

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