युवाओं की असीम ऊर्जा और  राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी

युवाओं की असीम ऊर्जा और 

राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी

सतीश शर्मा

युवा शक्ति’ का अर्थ है युवाओं की असीम ऊर्जा और राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी। युवा शब्द का तात्पर्य उस अवस्था से है, जो किशोरावस्था के बाद और पूर्ण वयस्कता से पहले आती है । यह जीवन का वह ऊर्जावान, रचनात्मक और परिवर्तनकारी चरण है जब व्यक्ति भविष्य की नींव रखता है । युवा केवल एक शारीरिक आयु नहीं, बल्कि मन की एक स्थिति भी है । इसे निम्नलिखित विशेषताओं से समझा जा सकता है। युवावस्था चुनौतियों का डटकर सामना करने और समस्याओं को अवसरों में बदलने का समय है । युवा वर्ग ही समाज, राष्ट्र और दुनिया में किसी भी नए सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक बदलाव को लाने में सबसे आगे रहता है। युवा अपनी सोच में लचीले होते हैं और वे एक बेहतर दुनिया के निर्माण के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। समाज में युवाओं को किसी भी राष्ट्र का भविष्य और सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति माना जाता है। युवा आन्दोलन  युवाओं द्वारा किसी सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने या उसका विरोध करने के लिए किए गए संगठित प्रयासों को कहा जाता है । यह अक्सर पीढ़ीगत बदलावों और वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश से उत्पन्न होते हैं । युवा आन्दोलनों के मुख्य प्रकारयुवा आंदोलनों ने इतिहास में कई रूप लिए हैं:छात्र और राजनीतिक आन्दोलन: शिक्षा व्यवस्था, भ्रष्टाचार, या रोजगार के अवसरों के खिलाफ युवा अक्सर सड़कों पर उतरते हैं (जैसे- बिहार में प्रतियोगी परीक्षाओं और महाराष्ट्र में पेपर लीक के खिलाफ हुए आंदोलन)।पर्यावरण आन्दोलन: जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण के लिए ‘क्लाइमेट स्ट्राइक’ जैसे अभियान (जैसे- ग्रेटा थनबर्ग का आंदोलन)। लैंगिक समानता, महिला सुरक्षा, और सामाजिक न्याय के लिए आवाज उठाना।: कला, साहित्य या इंटरनेट-आधारित  क्रांतियां जो तेजी से बदलाव की मांग करती हैं。 इतिहास गवाह है कि युवाओं की ऊर्जा ने हमेशा समाज की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई है。चाहे वह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में युवाओं की भूमिका हो, या हाल के वर्षों में पड़ोसी देशों में हुए बड़े राजनीतिक उथल-पुथल (जैसे बांग्लादेश या नेपाल में जेन-ज़ी  आन्दोलन) युवा बदलाव के सबसे बड़े उत्प्रेरक रहे हैं।इसके अलावा, कई संगठन युवाओं को रचनात्मक दिशा देने के लिए शैक्षिक और जागृति आन्दोलन भी चलाते हैं (जैसे- स्काउटिंग शिक्षा और दिया-DIVINE INDIA YOUTH MOVEMENT) । इन दिनों हम लोग अपने देश में अक्सर कई प्रकार के आंदोलनों की चर्चा सुनते रहते हैं, इनमें से प्रत्येक आन्दोलन- ‘ हमारी माँगें पूरी करो, नहीं तो चक्का जाम रहेगा ‘ की बुनियाद पर ही संचालित होते हैं ।  जैसे छात्र आन्दोलन, श्रमिक आन्दोलन, सरकारी कर्मचारियों की वेतनवृद्धि का आन्दोलन, समाज के विभिन्न पेशों से जुड़े लोगों का अपने अपने पेशागत अधिकार एवं सुविधाओं में वृद्धि पाने का आन्दोलन आदि. इन विभिन्न सिलसिलेवार आन्दोलनों के दबाव में सरकार या मालिक की ओर से प्रबन्धन पक्ष कभी कभी इनकी कुछ माँगों को पूरी अवश्य कर देते हैं, फिर भी इनके समक्ष जीवन निर्वाह हेतु न्यूनतम सुविधाओं का आभाव मानो किसी अटल-चट्टान की भाँति जस की तस खड़ी ही रहती है। किसी भी स्वाधीन देश के नागरिक यदि लम्बे समय तक अपना न्यायोचित अधिकार पाने से लगातार वंचित होते रहें, तो यह बहुत स्वाभाविक है कि उनमें विद्रोह का भाव पनपने लगता है. अब प्रश्न यह है कि आखिर क्यों वे लोग अब भी शोषित और वंचित किये जा रहे हैं ? और वे कौन लोग हैं, जो स्वाधीनता प्राप्त होने के सातवें दशक में भी उनका शोषण करने का दुस्साहस कर रहे हैं ?

भारत विश्व का सबसे युवा देश माना जाता है। हमारे देश की बड़ी जनसंख्या युवा वर्ग की है। युवा शक्ति किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होती है। यदि युवाओं की ऊर्जा सही दिशा में लगे तो राष्ट्र प्रगति करता है, और यदि दिशा भटक जाए तो वही शक्ति समस्या बन सकती है। आज का भारतीय युवा अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है। ऐसे समय में विवेकानंद जी के विचार युवाओं को सही मार्ग दिखाते हैं। आज कई युवा यह तय नहीं कर पाते कि जीवन में क्या करना है। सोशल मीडिया और दूसरों की सफलता देखकर वे भ्रमित हो जाते हैं। शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी रोजगार की समस्या बड़ी चुनौती है। हर क्षेत्र में अत्यधिक प्रतियोगिता होने से युवाओं में तनाव बढ़ रहा है। मोबाइल, गेम्स और सोशल मीडिया ने युवाओं का बहुत समय और एकाग्रता प्रभावित की है। इससे पढ़ाई, स्वास्थ्य और पारिवारिक संबंधों पर असर पड़ रहा है। असफलता का डर, तुलना की भावना और भविष्य की चिंता के कारण अनेक युवा मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं। पश्चिमी प्रभाव के कारण कुछ युवाओं में भारतीय संस्कृति, परिवार और नैतिक मूल्यों से दूरी बढ़ती जा रही है। कुछ युवा नशे, हिंसा और गलत मित्र मंडली के कारण अपना भविष्य खराब कर लेते हैं। स्वामी विवेकानंद जी कहते थे – उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” यह संदेश युवाओं को निरंतर प्रयास और आत्मविश्वास की प्रेरणा देता है। विवेकानंद जी के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण होना चाहिए। मजबूत चरित्र वाला युवा ही राष्ट्र निर्माण कर सकता है। युवाओं को स्वस्थ शरीर, अनुशासन और सकारात्मक सोच अपनानी चाहिए। स्वामी जी युवाओं को समाज और राष्ट्र की सेवा के लिए प्रेरित करते थे। उनका मानना था कि भारत का भविष्य युवाओं के हाथों में है। उन्होंने भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और सनातन मूल्यों को विश्व में सम्मान दिलाया। युवाओं को अपनी संस्कृति पर गर्व करना चाहिए। आज भारतीय युवा अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, लेकिन उसके भीतर अपार क्षमता भी है। यदि युवा विवेकानंद जी के विचारों को अपनाएं तो आत्मविश्वास, अनुशासन, चरित्र और राष्ट्रभक्ति जैसे गुणो का विकास होता है और वे न केवल अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकते हैं बल्कि भारत को भी विश्व में सर्वोच्च स्थान दिला सकते हैं।

आज का युवा ऊर्जा, प्रतिभा और उत्साह से भरपूर है। वह तकनीकी रूप से सक्षम है, बड़े सपने देखता है और समाज में परिवर्तन लाने की क्षमता रखता है। लेकिन दूसरी ओर दिशा भ्रम, संस्कारों में कमी, नशा, सोशल मीडिया की लत, मानसिक तनाव और राष्ट्र से दूरी जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं। यदि हम  जाति, भाषा, क्षेत्र और वर्ग से ऊपर उठकर सभी को “हम सब भारतीय हैं” की भावना से  तो ठीक रहेगा है। प्राकृतिक आपदा, महामारी या सामाजिक समस्याओं में सेवा कार्यों के माध्यम से समाज के साथ खड़े रहना चाहिए । इससे युवाओं में सेवा और संवेदनशीलता विकसित होती है। आज भारत को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए भी सोचें। यदि युवा शक्ति सही दिशा में संगठित हो जाए, तो भारत विश्व में पुनः वैभवशाली राष्ट्र बन सकता है।

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