मन – पंछी (लघुकथा)
नोरिन शर्मा 
फ़ैमिली कोर्ट से अकेली बाहर निकलकर मान्या कॉलेज पहुँची। पहली दो सुनवाई तक तो माँ साथ हुआ करती थीं पर अब भाभी और उनके बदलते व्यवहार ने उसकी टीस और बढ़ा दी।
शादी के बाद मान्या एक एक पैसे को बचाकर सुकांत के साथ मिलकर एक घर खरीदना चाहती थी। ससुराल में एक पैसा भी उसने कभी नहीं दिया; और एक साल से मायके में उसकी आधी से ज़्यादा तनख़्वाह खर्च हो रही थी। सुकांत एक साल रुककर घर के लिए बचत की योजना बना रहा था। बस इतनी सी बात “तू तू मैं मैं ” में बदल गई और उसे अहंकारी,कंजूस,बदतमीज़ और भी न जाने क्या क्या सुनना पड़ा।अचानक तलाक़ के काग़ज़ सुकांत की टेबल पर पटक, मान्या मायके आ गई।रिश्तों के पुल की चहल क़दमी में दरारें दिखाई दे रहीं थीं लेकिन हर सुनवाई पर सुकांत का शांत और संयमित व्यवहार उसे और बेचैन कर देता।
‘ मुझे मनाकर ले जाएगा या लड़ेगा..? क्या वो भी तलाक़ चाहता है?’ उसका मन – पंछी कई बार अपने अहम को छोड़ सुकांत के पास उड़ जाना चाहता।
आज अचानक उसने कार सुकांत के ऑफिस की ओर मोड़ दी। एक साल से दोनों के बीच खाई ने जन्म ले लिया था। मान्या अपने पश्चाताप से उसे पाटना चाहती थी। दरारें कदाचित भरी जा सकती थीं किंतु भरभराकर टूटे रिश्तों के सेतु की मरम्मत कैसे हो..???
ऑफिस कैंटीन में किसी खूबसूरत कन्या के साथ डोसा खाते- खाते सुकांत ने उसके हाथ पर अपना हाथ जिस तरह रखा मान्या के आस के मन – पंछी उड़कर क्षितिज में विलीन हो गए।





