अब जेल से शासन नहीं चलेगा 

अब जेल से शासन नहीं चलेगा 

सतीश शर्मा

130वां संविधान संशोधन विधेयक, 2025 इसी कसौटी को संस्थागत रूप देता है। यह निर्णय दोषसिद्धि से पहले ‘सत्ता के नैतिक मानदंड’ की रक्षा करता है। ठीक उसी तरह जैसे सिविल सेवाओं में 48 घंटे से अधिक की हिरासत पर ‘डीम्ड सस्पेंशन’ लागू हो जाता है।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे संवेदनशील धुरी ‘नैतिक वैधता’ तभी टिकाऊ बनती है जब सार्वजनिक पद पर बैठे लोग कानून के सर्वोच्च आदर्शों के अनुरूप ही आचरण करें। 130वां संविधान संशोधन विधेयक, 2025 इसी कसौटी को संस्थागत रूप देता है। यह निर्णय दोषसिद्धि से पहले ‘सत्ता के नैतिक मानदंड’ की रक्षा करता है। ठीक उसी तरह जैसे सिविल सेवाओं में 48 घंटे से अधिक की हिरासत पर ‘डीम्ड सस्पेंशन’ लागू हो जाता है। चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए भी 30 दिन की ऊंची सीमा और पांच वर्ष सजा की दहलीज तय करके विधेयक ने मनमानेपन की आशंका को भी सीमित किया है। ऐसे कदम का भी सदन में विरोध होना समझ से परे है जबकि इस बिल को केंद्र सरकार ने सार्वजनिक रूप से नैतिक तर्क के साथ रखा है।

किसी भी मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को जेल जाने पर 30 दिन के भीतर खुद इस्तीफा देना होगा।

इस्तीफा नहीं देने की स्थिति में 31वें दिन उसका पद स्वत: रिक्त माना जाएगा। ऐसे आरोप जिसमें कम से कम पांच साल की सजा का प्रविधान है उसमें लगातार 30 दिन जेल रहने पर होगी कार्रवाई।

बेल मिलने पर दोबारा मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन सकता है। पूरे देश में इसे एक साथ लागू करने के लिए केंद्र शासित प्रदेश अधिनियम 1963 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 में भी जरूरी संशोधन किये जाएंगे। इन दोनों अधिनियम में संशोधन से संबंधित विधेयक भी पेश किया गया है।

हाल ही में, संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 को लोकसभा में पेश किया गया और बाद में विपक्ष के तीव्र विरोध के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेज दिया गया।

विधेयक में केंद्रीय मंत्रिपरिषद, राज्य मंत्रिपरिषद और दिल्ली के लिए विशेष प्रावधानों से संबंधित अनुच्छेद 75, 164 और 239एए में संशोधन करने का प्रावधान है।

130वें संशोधन विधेयक में क्या प्रस्ताव है?

विधेयक में गंभीर अपराधों के लिए जेल में बंद मंत्रियों को हटाने के लिए एक तंत्र प्रस्तुत किया गया है:

यदि किसी मंत्री को पांच वर्ष या उससे अधिक कारावास की सजा वाले अपराध के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता है और लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है , तो वह अपना पद खो देगा।

राष्ट्रपति को मुख्यमंत्री की सलाह पर कार्य करते हुए , हिरासत के 31वें दिन तक मंत्री को हटाना होगा। यदि कोई सलाह नहीं दी जाती है तो मंत्री स्वतः ही अपने पद से हट जाता है।

हालाँकि, विधेयक में मंत्री के हिरासत से रिहा होने के बाद पुनः नियुक्ति की अनुमति दी गई है ।

यह आशंका है कि गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी मंत्री संवैधानिक नैतिकता, सुशासन और जनता के विश्वास से समझौता कर सकते हैं ।

प्रस्ताव से साफ है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई भी मंत्री किसी ऐसे आपराधिक मामले में गिरफ्तार होकर लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, जिसके लिए पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है तो वह पद पर बना नहीं रह सकता। इस विधेयक के साथ केंद्र शासित प्रदेशों और जम्मू-कश्मीर के लिए समान प्रावधान वाले दो साधारण संशोधन विधेयक भी रखे गए हैं, जिससे नियम पूरे देश में एकरूप हो जाते हैं। विधेयक के ‘वस्तुपत्र एवं कारण’ में सरकार साफ कहती है कि गंभीर आरोपों में हिरासत में गया मंत्री संवैधानिक मर्यादा, सुशासन और जनता के भरोसे को ठेस पहुंचा सकता है इसलिए पद पर बने रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए। यह दंड नहीं बल्कि शासन-नीति सुरक्षा उपाय है।

केंद्र के समान ढांचा जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 और गवर्नमेंट ऑफ यूनियन टेरिटरीज (संशोधन) विधेयक, 2025 के माध्यम से भी प्रस्तावित है। इन दोनों में वही 30 दिन–5 वर्ष वाली कसौटी रखी गई है और मुख्यमंत्री/मंत्री के हटाए जाने की वही प्रक्रिया लागू होगी। इस तरह किसी भी भौगोलिक अथवा संवैधानिक इकाई में ‘अपवाद’ नहीं बचेगा और आचरण का एक सामान्य, स्पष्ट तथा पूर्व-निर्धारित मानक स्थापित होगा।

लोकसभा में तीखी बहस और हंगामे के बीच यह संवैधानिक संशोधन विधेयक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा जा चुका है। यह समिति लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्यों की होगी, जिन्हें क्रमशः स्पीकर और सभापति नामित करेंगे। सरकार ने समिति से आग्रह किया है कि वह अगली संसदीय बैठक के पहले सप्ताह के अंत तक अपनी रिपोर्ट दे यानी स्क्रूटनी तेज, तथ्यों-तर्कों पर आधारित और समयबद्ध हो। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि JPC की सिफारिशें परामर्शात्मक होती हैं वे बाध्यकारी नहीं, पर परंपरा यही रही है कि सरकार गंभीर आपत्तियों/सुझावों पर संशोधन-प्रस्ताव लाती है।


विधेयक जनप्रतिनिधि के मूलाधिकारों या मतदाता-प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को नहीं तोड़ता वह केवल मंत्री के पद पर बने रहने की शर्तें स्पष्ट करता है। अभियोजन लंबित रहते हुए गिरफ्तारी और लंबी हिरासत में सत्ता-प्रयोग के साथ निहित ‘हितों के टकराव’ को यह व्यावहारिक रूप से संबोधित करता है। पुनर्नियुक्ति का प्रावधान यह दर्शाता है कि बिल दोषसिद्धि से पहले ‘कैरियर-एक्सक्लूजन’ नहीं करता सिर्फ शासन को संदेह से मुक्त रखने की प्राथमिकता तय करता है। यही संतुलन इसे दंडात्मक कानून के बजाय नैतिक-प्रशासनिक साधन बनाता है।
विपक्ष की दलील है कि गिरफ़्तारी राजनीतिक हो सकती है, 30 दिन की हिरासत किसी भी एजेंसी के दुरुपयोग से हासिल की जा सकती है। वस्तुतः, बिल इस आशंका को दो स्तरों पर सीमित करता है। पहला, ‘गंभीर अपराध’ की परिभाषा पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा वाले मामलों तक सीमित है, दूसरा हटाने की प्रक्रिया संवैधानिक है और राष्ट्रपति/राज्यपाल का औपचारिक आदेश प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री की सलाह पर ही होता है यानी निर्वाचित नेतृत्व की जवाबदेही और अनुशासन साथ-साथ चलते हैं। तुलना के लिए याद रखें कि शासकीय सेवाओं में तो 48 घंटे की हिरासत पर स्वतः निलंबन लागू होता है। यहां 30 दिन की लम्बी, न्यायिक निगरानी वाली हिरासत का पैमाना रखा गया है यह कहीं अधिक सख्त प्रक्रिया-सुरक्षा है।

तमिलनाडु के वी. सेंथिल बालाजी प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने बेल के दौरान मंत्री-पद और निष्पक्ष जांच/गवाहों पर दबाव जैसे सवालों को लेकर सख्त टिप्पणियां कीं। अंततः मंत्री-पद छोड़ना और जमानत बचाना दोनों में से चुनाव करना पड़ा। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की हिरासत के दौरान पद बनाम प्रक्रिया की बहस भी इसी नैतिक बिंदु पर आकर टिकती रही। इन घटनाओं ने जनचर्चा में यह प्रश्न स्थायी रूप से दर्ज कर दिया कि जब कोई नेता न्यायिक हिरासत में हो तो क्या वह शासन-प्रक्रिया का निर्विघ्न संचालन कर सकता है। नया बिल इसी व्यावहारिक दुविधा का संवैधानिक समाधान है।

JPC अब विभिन्न हितधारकों संवैधानिक विशेषज्ञों, बार काउंसिल, राज्य सरकारों, पूर्व न्यायाधीशों व पुलिस, जांच एजेंसियों से साक्ष्य लेकर प्रावधानों की भाषा को और कस सकती है। उदाहरण के लिए, लगातार तीस दिन की गणना, ‘जमानत’ और ‘न्यायिक हिरासत’ के बीच सीमा-रेखा और ‘पुनर्नियुक्ति’ के समय जैसे बिंदुओं पर अधिक स्पष्टता संभव है। समिति की रिपोर्ट आते ही सरकार आवश्यक संशोधनों सहित बिल को विशेष बहुमत के लिए पुनः सदन में ला सकती है। इस पूरी प्रक्रिया से स्पष्ट है कि यह कदम विपक्ष सहित भविष्य की किसी भी सरकार पर समान रूप से लागू होगा अर्थात यह कदम ‘विनर-टेक्स-ऑल’ की राजनीति नहीं बल्कि ‘रूल्स-टेक-ऑल’ का लोकाचार स्थापित करता है।

बिल का स्वरूप ‘डिस्क्वालिफिकेशन’ नहीं बल्कि ‘ऑफिस-होल्डिंग’ का अस्थायी नियमन है। यह विधायिका/न्यायपालिका/कार्यपालिका के शक्तिसंतुलन को प्रभावित किए बिना ‘संवैधानिक नैतिकता’ को लागू करता है। गंभीर अपराध, न्यायिक हिरासत और 30 दिन जैसी वस्तुगत कसौटी इसे ‘मनमाना’ होने से बचाती है। साथ ही पुनर्नियुक्ति का विकल्प इसे ‘स्थायी दंड’ में तब्दील नहीं होने देता। यह कहा जा सकता है कि यह कानून न्यायिक जांच में और अधिक मजबूती से खड़ा होगा। इस दिशा में सरकार का सार्वजनिक औचित्य-वक्तव्य पहले ही दर्ज है कि लक्ष्य ‘लोकनीति में नैतिक मानक उठाना’ है न कि राजनीतिक प्रतिद्वंदी को निशाना बनाना।
लोकतांत्रिक गणराज्य में ‘पब्लिक ऑफिस’ निजी अधिकार नहीं, सार्वजनिक ट्रस्ट है। रिपब्लिकन एथिक्स कहता है कि किसी भी संभावित ‘डॉमिनेशन’ चाहे वह शक्ति के भय का या दबाव का हो, से नागरिकों की स्वतंत्रता सुरक्षित रखी जाए। जब कोई मंत्री न्यायिक नियंत्रण में हो तो उसी पद की संस्थागत शक्ति जांच और गवाही को प्रभावित कर सकती है भले ही व्यक्ति दोषी न हो। इस जोखिम से बचाव के लिए ‘ऑफिस से अस्थायी दूरी’ एक न्यायसंगत व कम से कम हस्तक्षेप वाला उपाय है। पॉपुलिस्ट तर्क, ‘जनादेश मिला है, इसलिए पद नहीं छोड़ेंगे’ लोकतांत्रिक भावनाओं को भले लुभाए पर संस्थानों की निष्पक्षता और शासन की विश्वसनीयता इसी तरह के स्पष्ट नियमों से ही बची रहती है। नया बिल जनादेश का अनादर नहीं करता वह जनादेश के विश्वसनीय क्रियान्वयन का औजार बनता है।

130वां संशोधन विधेयक और उससे जुड़े पूरक बिल भारतीय लोकतंत्र को एक स्पष्ट संदेश देते हैं। शासन का अधिकार केवल चुनाव जीतने से नहीं बल्कि नियम-आधारित नैतिक उत्तरदायित्व निभाने से भी आता है। 30 दिन, पांच वर्ष, पुनर्नियुक्ति जैसी तराजू से यह ढांचा कठोरता और न्यायसंगतता का संतुलन बनाता है। संयुक्त समिति की जांच, संभव संशोधनों और संसद की बहस के बाद जब यह कानून रूप लेगा तो ‘जेल से शासन’ के युग का अंत और ‘नैतिक वैधता’ के नए मानक की शुरुआत दोनों एक साथ दिखेंगे। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता है, यही संवैधानिक निष्ठा। – साभार डी डी न्यूज 

 

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