त्रिभाषा प्रणाली बहुभाषावाद और राष्ट्रीय एकता
सतीश शर्मा 
राष्ट्रीय शिक्षा नीति ( National Education Policy ) (NEP) 2020 के तहत त्रिभाषा प्रणाली का उद्देश्य छात्रों में बहुभाषावाद और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना है। इस नीति के अनुसार, प्रत्येक छात्र को तीन भाषाएँ सीखनी होंगी, जिनमें से कम से कम दो भाषाएँ भारत की मूल भाषाएँ होनी चाहिए। तीन भाषाओं के चयन मे पहली भाषा यह मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा होगी। शिक्षा का माध्यम भी इसी भाषा में होगा (विशेष रूप से प्राथमिक कक्षाओं तक)।दूसरी भाषा हिंदी भाषी राज्यों में, यह आधुनिक भारतीय भाषा (हिंदी के अलावा) या कोई अन्य भारतीय भाषा होगी। गैर-हिंदी भाषी राज्यों में, यह हिंदी या अंग्रेजी हो सकती है।तीसरी भाषा यह एक आधुनिक भारतीय भाषा या कोई विदेशी भाषा हो सकती है।
राज्यों और छात्रों को अपनी पसंद की तीन भाषाएँ चुनने की पूरी स्वतंत्रता दी गई है।कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। यह सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी राज्य पर कोई विशेष भाषा (विशेषकर हिंदी) थोपी न जाए।मातृभाषा पर जोर रहेगा, शुरुआती शिक्षा में मातृभाषा या स्थानीय भाषा के उपयोग को अनिवार्य बनाया गया है, ताकि बच्चों में समझ और संज्ञानात्मक विकास बेहतर हो। त्रिभाषा प्रणाली का उद्देश्य छात्रों को उनकी स्थानीय संस्कृति से जोड़ना है व देश की भाषाई विविधता का सम्मान करना। छात्रों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए विदेशी भाषाओं को सीखने का भी अवसर देना है ।
त्रिभाषा फार्मूला कोठारी आयोग (1964-66) द्वारा प्रस्तावित किया गया था, जिसे नई शिक्षा नीति 2020 के तहत अधिक व्यावहारिक और लचीला बनाकर लागू किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत भी इस त्रिभाषा सूत्र को जारी रखा गया है, लेकिन इसमें अधिक लचीलापन दिया गया है । इसके अंतर्गत छात्रों द्वारा चुनी जाने वाली तीन भाषाओं मे ये ध्यान रखा गया है की कम से कम दो भाषाएं भारत की मूल भाषाएं होनी चाहिए । राज्यों और छात्रों को भाषाओं के चयन में अधिक स्वतंत्रता दी गई है ताकि किसी भी क्षेत्र के बच्चों पर कोई विशेष भाषा जबरन न थोपी जाए । इस नीति का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्र अपनी संस्कृति और मातृभाषा से जुड़े रहें, राष्ट्रीय स्तर पर संवाद कर सकें और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार रहें ।
त्रि भाषा फॉर्मूला कैसे काम करता है? यह जाने इसके तहत स्कूली छात्रों को तीन भाषाएँ सीखनी होती हैं, जिनका विभाजन इस प्रकार है । प्रथम भाषा, मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा उदाहरण के लिए यदि कोई छात्र राजस्थान का है, तो उसकी पहली भाषा हिंदी होगी। दूसरी भाषा हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी और अंग्रेजी के अलावा कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा या अंग्रेजी,गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी या अंग्रेजी । तीसरी भाषा के रूप मे हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेजी या कोई आधुनिक यूरोपीय/भारतीय भाषा । गैर-हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेजी या कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा । त्रिभाषा फार्मूले के कारण सांस्कृतिक जुड़ाव और पहचान पहचान बदेगी छात्र अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा के माध्यम से अपनी परंपराओं, लोककथाओं और संस्कृति से मजबूती से जुड़े रहते हैं ओर उनका बेहतर संज्ञानात्मक विकास होगा , शोध के अनुसार, कई भाषाएं सीखने से बच्चों की याददाश्त, समस्या-समाधान कौशल और संज्ञानात्मक लचीलापन बढ़ता है।
त्रिभाषा प्रणाली से राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलेगा यह सूत्र भाषाई विविधताओं के बीच सेतु का काम करता है। उदाहरण के लिए, हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों द्वारा दक्षिण भारतीय भाषा सीखने से भाषाई सौहार्द बढ़ता है ओर साथ ही वैश्विक और कैरियर के अवसर बनेंगे । स्थानीय और राष्ट्रीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी सीखने से छात्रों को वैश्विक स्तर पर और भारत के भीतर रोजगार के व्यापक अवसर मिलते हैं। कक्षा में समावेशिता का भाव विकसित होगा । विभिन्न भाषाई पृष्ठभूमि के छात्र जब एक साझा मंच पर कई भाषाएं सीखते हैं, तो कक्षा का माहौल अधिक समावेशी और सहयोगात्मक बनता है। नवीनतम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के लिए इसी त्रिभाषा फार्मूले (बिना किसी भाषा के थोपे जाने की शर्त के) को लागू करने का प्रावधान किया गया है। बहु-भाषिकता का विकास होगा ओर बच्चे कम उम्र में ही तीन भाषाएं (मातृभाषा, हिंदी/अंग्रेजी और अन्य आधुनिक भारतीय भाषा) सीखकर अधिक भाषा-कुशल बनते हैं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान होगा क्षेत्रीय भाषाओं के सीखने से देश की विविध संस्कृतियों और साहित्यों को समझने का अवसर मिलता है। त्रि भाषा से वैश्विक स्तर पर मजबूती आएगी ।
भाषा के विषय मे भारत का संविधान मे क्या कहता है ये भी जाने । संविधान मे अनुच्छेद 351 केंद्र सरकार को हिंदी भाषा के विकास के लिये निर्देश जारी करने की शक्ति देता है। भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 आधिकारिक भाषाओं को सूचीबद्ध किया गया है। अनुच्छेद 343 भारत संघ की आधिकारिक भाषा से संबंधित है। इस अनुच्छेद के अनुसार, हिंदी देवनागरी लिपि में होनी चाहिये और अंकों के संदर्भ में भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप का अनुसरण किया जाना चाहिये। इस अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि संविधान को अपनाए जाने के शुरुआती 15 वर्षों तक अंग्रेज़ी का आधिकारिक भाषा के रूप में उपयोग जारी रहेगा। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करता है। अनुच्छेद में कहा गया है कि नागरिकों के किसी भी वर्ग “जिसकी स्वयं की विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति है” उसको उसका संरक्षण करने का अधिकार होगा। अनुच्छेद 346 राज्यों और संघ एवं राज्य के बीच संचार हेतु आधिकारिक भाषा के विषय में प्रबंध करता है। अनुच्छेद के अनुसार, उक्त कार्य के लिये “अधिकृत” भाषा का उपयोग किया जाएगा। हालाँकि यदि दो या दो से अधिक राज्य सहमत हैं कि उनके मध्य संचार की भाषा हिंदी होगी, तो आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी का उपयोग किया जा सकता है। अनुच्छेद 347 मे लिखा है की अगर किसी राज्य की जनसंख्या के किसी भाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को किसी राज्य की आधिकारिक भाषा के रूप में एक भाषा को चुनने की शक्ति प्रदान करता है, यदि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग यह चाहता है कि उसके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को राज्य द्वारा मान्यता दी जाए तो वह निदेश दे सकता है कि ऐसी भाषा को भी उस राज्य में सर्वत्र या उसके किसी भाग में ऐसे प्रयोजन के लिये, जो वह विनिर्दिष्ट करे, शासकीय मान्यता दी जाए। अनुच्छेद 350A के अनुसार प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएँ प्रदान करता है। अनुच्छेद 350B भाषाई अल्पसंख्यकों के लिये एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान करता है व विशेष अधिकारी को राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाएगी, यह भाषाई अल्पसंख्यकों के सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जाँच करेगा तथा सीधे राष्ट्रपति को रिपोर्ट सौंपेगा। तत्पश्चात् राष्ट्रपति उस रिपोर्ट को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है या उसे संबंधित राज्य/राज्यों की सरकारों को भेज सकता है।







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इससे बच्चों में अधिक भाषाओं को सिखाने में सहायता मिलेगी।