वीर सावरकर  एक महान स्वतंत्रता सेनानी

वीर सावरकर  एक महान स्वतंत्रता सेनानी

सतीश शर्मा  

विनायक दामोदर सावरक का जन्म  28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भागुर गांव में हुआ था। उनके  पिता का नाम दामोदर पंत सावरकर और माता का नाम राधाबाई था। युवावस्था में ही उनके  माता-पिता का देहांत हो गया था । उन्होंने पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से स्नातक किया और बाद में कानून की पढ़ाई के लिए लंदन (यू.के.) चले गए।

वीर सावरकर (विनायक दामोदर सावरकर) एक महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और प्रखर राष्ट्रवादी विचारक व  लेखक और ‘हिंदुत्व’ विचारधारा के प्रणेता थे । वे मुख्य रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का बिगुल फूंकने, अंडमान की सेलुलर जेल में अमानवीय यातनाएं सहने और ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा को राजनीतिक रूप देने के लिए प्रसिद्ध थे।

बाल्यावस्था में भी विनायक लोगों की वेदनाओं के बारे में बहुत सचेत थे। वह अकाल और प्लेग जैसी महामारियों के कारण भावनात्मक रूप से द्रवित हो उठे। इसमें ब्रिटिश शासन के कटु व्यवहार और ज्यादतियों ने आग में घी का काम किया। ऐसे वातावरण में युवा सावरकर उद्वेलित हो उठे। उन्होंने अंग्रेजों को अपनी मातृभूमि से निकाल कर भारत को आजाद कराने के शहीदों के अधूरे लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपने परिजनों और मित्रों तक की कुर्बानी देने का प्रण किया। वर्ष 1899 में मात्र 16 वर्ष की आयु में ही सावरकर ने ‘मित्र मेला’ नामक संगठन का गठन किया जिसका मूल उद्देश्य भारत की संपूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना था। बाद में इस संगठन का नाम बदलकर “अभिनव भारत” रख दिया गया।

 उन्होंने लंदन में रहकर ‘इंडिया हाउस’ के माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन संगठित किया।  उन्होंने ही सबसे पहले 1857 की क्रांति को मात्र ‘गदर’ मानने से इंकार किया और इसे सुनियोजित “भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” घोषित करते हुए इसी नाम से ऐतिहासिक पुस्तक लिखी।  वे भारत के पहले क्रांतिकारी थे जिन्हें अंग्रेजों द्वारा दो बार आजीवन कारावास (५० वर्ष) की सजा दी गई। उन्होंने अंडमान की सेलुलर जेल (काला पानी) में असहनीय कष्ट सहे।  जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने ‘हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू?’ (Hindutva: Who is a Hindu?) नामक पुस्तक लिखी, जिसने देश में हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा को एक नई दिशा दी।  वे एक कट्टर समाज सुधारक भी थे। उन्होंने रत्नागिरी में अस्पृश्यता (छुआछूत) के खिलाफ आंदोलन चलाया, अंतरजातीय भोज आयोजित किए और पतित पावन मंदिर की स्थापना की जहाँ सभी जातियों को प्रवेश और पूजा का अधिकार मिला। 

विनायक दामोदर सावरकर द्वारा 1923 में लिखित पुस्तक ‘हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू?’ के अनुसार, वह प्रत्येक व्यक्ति हिंदू है जो सिंधु नदी से लेकर समुद्र (हिंद महासागर) तक फैली भारत भूमि को अपनी पितृभूमि (जन्मभूमि/पूर्वजों की भूमि) और पुण्यभूमि (धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था की भूमि) दोनों मानता है। पितृभूमि  वे सभी लोग जिनके पूर्वज प्राचीन काल से भारत की भौगोलिक सीमा में बसे हुए हैं । पुण्यभूमि  वे सभी धर्म और आस्थाएं जिनका उद्भव भारतीय उपमहाद्वीप में हुआ हो ।  इसके अंतर्गत वैदिक, सनातन, जैन, बौद्ध, और सिख मत आते हैं।  चूँकि इस्लाम और ईसाई धर्म का उद्भव भारत से बाहर हुआ था और इन धर्मों के अनुयायियों के लिए पवित्र स्थान (मक्का या यरुशलम) विदेशों में हैं, सावरकर ने इन धर्मों को मानने वालों को ‘हिंदू’ की श्रेणी में नहीं रखा (भले ही उनके पूर्वज भारतीय ही क्यों न रहे।

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, विचारक और समाज सुधारक थे । सशस्त्र क्रांति के माध्यम से अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने में उनकी भूमिका अग्रणी थी। लंदन में पढ़ाई के दौरान उन्होंने ‘इंडिया हाउस’ से जुड़कर क्रांतिकारियों का एक गुप्त संगठन ‘अभिनव भारत’ बनाया, जिसका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति द्वारा ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना था। उन्होंने 1909 में ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस-1857’ नामक पुस्तक लिखी। सावरकर दुनिया के पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 1857 के गदर (विद्रोह) को मात्र एक सैनिक बगावत न कहकर “भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” करार दिया। इस किताब ने भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों को बहुत प्रेरित किया।  भारत में रहते हुए 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान उन्होंने पुणे में विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी।सावरकर वर्ष 1906 में लंदन गए उन्होंने जल्द ही इटैलियन राष्ट्रवादी ग्यूसेप माज़िनी (सावरकर ने माज़िनी की जीवनी लिखी थी) के विचारों के आधार पर फ्री इंडिया सोसाइटी की स्थापना की। 1910 में नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या में प्रयुक्त पिस्तौल भेजने के आरोप में उन्हें लंदन में गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन  भारत लाते समय, फ्रांस के मार्सेलिस बंदरगाह पर वे जहाज के शौचालय के रास्ते समुद्र में कूद गए और तैरकर किनारे पहुंच गए वहाँ वीर सावरकर पकड़े गए। उन्हें दो बार आजीवन कारावास (50 वर्ष) की सजा दी गई और अंडमान निकोबार की कुख्यात ‘सेलुलर जेल’ (काला पानी) भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने अमानवीय यातनाएं सहीं।  होने के बाद उन्होंने 1937 में जेल से रिहा होने के बाद वे अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और विभाजनकारी राजनीति का विरोध किया वे वर्ष 1937 से 1943 तक हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे । रत्नागिरी में रहकर अस्पृश्यता निवारण, शुद्धि आंदोलन और दलितों के अधिकारों के लिए कार्य किया। जीवन के अंतिम काल में सावरकर का स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा और वह बिस्तर पर ही रहे। 3 फरवरी 1966 को उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया। चिकित्सकों को आश्चर्य था कि बिना दवा के तथा प्रतिदिन मात्र 5-6 चम्मच पानी पीकर भी वे 22 दिनों तक जीवित रहे। अंततः 26 फरवरी 1966 को 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

वीर सावरकर के निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन ने कहा था कि “सावरकर हमारे देश की स्वतंत्रता के एक कर्मठ और जुझारू कार्यकर्ता थे, युवाओं के लिए उनका जीवन एक मिसाल है”। तत्कालीन उप-राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि “वह एक महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने हमारी मातृभूमि की मुक्ति के लिए अनेक युवाओं को कार्य करने हेतु प्रेरित किया”। सावरकर को भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा कि सावरकर समकालीन भारत के महान नेता थे जिनका नाम साहस और देशभक्ति का प्रेरणास्त्रोत है। वह महान क्रांतिकारी के सांचे में ढले ऐसे व्यक्तित्व थे जिनसे अनगिनत लोगों ने प्रेरणा ली।

1 thought on “वीर सावरकर  एक महान स्वतंत्रता सेनानी”

  1. डाॅ भीम सिंह

    महान क्रान्तिकारी वीर सावरकर जी को सादर प्रणाम।

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