स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया पूरी तरह वैध है- सुप्रीम कोर्ट
सतीश शर्मा 
सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को पूरी तरह से वैध और संवैधानिक ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को पूरा संवैधानिक अधिकार है कि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग समय-समय पर मतदाता सूची का शुद्धिकरण करता रहे। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने विपक्ष और याचिकाकर्ताओं (जैसे ADR और प्रशांत भूषण) की आपत्तियों को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत पूरी तरह वैध है। महज सामान्य प्रक्रिया से अलग होने के कारण इसे गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के सीमित उद्देश्य के लिए नागरिकता की जांच करने की शक्ति है। हालांकि, चुनाव आयोग का फैसला नागरिकता पर अंतिम मुहर नहीं माना जाएगा। यदि चुनाव आयोग आवश्यक दस्तावेजों की कमी के कारण किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटाता है, तो ऐसे मामलों को नागरिकता कानून के तहत अंतिम फैसले के लिए 4 हफ्तों के भीतर केंद्र सरकार की सक्षम अथॉरिटी को रेफर करना होगा। अदालत ने माना कि पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेजों की मांग करना मनमाना नहीं है विना दस्तावेज के चुनाव आयोग पात्रता कैसे तय करेगा की वोटर सूची मे नाम हो या ना हो इसलिए दस्तावेज मांगना गैर सविधानिक नहीं है । कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस सूची में आधार कार्ड को भी 12वें पहचान दस्तावेज के रूप में शामिल किया गया था। चुनाव आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह वोटर लिस्ट से हटाए गए (बिहार के लगभग 65 लाख) मतदाताओं की सूची को बूथ-स्तर पर कारणों के साथ सार्वजनिक करे ताकि पारदर्शिता बनी रहे। यह फैसला बिहार में की गई एसआईआर प्रक्रिया की याचिकाओं पर आया है, लेकिन इसका असर अब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और असम समेत उन अन्य 12 राज्यों में चल रही एसआईआर प्रक्रियाओं पर भी पड़ेगा।
केरलम के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कैमरे पर स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि SIR के माध्यम से डुप्लीकेट वोट हटे थे और उससे कांग्रेस को केरलम लाभ हुआ था।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट को पूरी तरह से शुद्ध और अपडेट करने की एक विशेष और गहन प्रक्रिया है। यह” सामान्य वार्षिक संशोधन से बहुत अलग और अधिक व्यापक होती है। इसमें चुनाव आयोग के “बूथ लेवल अधिकारी” हर घर जाकर मतदाताओं की भौतिक उपस्थिति और दस्तावेजों की सघन जांच करते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य वोटर लिस्ट से फर्जी, मृत, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टि वाले मतदाताओं के नाम हटाना है। इस प्रक्रिया के दौरान छूटे हुए और नए पात्र मतदाताओं (18 वर्ष से अधिक) के नाम तुरंत जोड़े जाते हैं। यह प्रक्रिया किसी राज्य या क्षेत्र में वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की शिकायतों या असमंजस की स्थिति में ही अपनाई जाती है। सामान्य रिवीजन और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में अंतर है की “सामान्य संशोधन” यह हर साल होता है, जिसमें मुख्य रूप से लोग खुद आवेदन देकर अपना नाम जुड़वाते या सुधरवाते हैं। “विशेष गहन संशोधन” यह चुनाव आयोग द्वारा चलाया जाने वाला एक विशेष अभियान है, जिसमें आयोग खुद आगे बढ़कर डेटा की 100% शुद्धता के लिए जमीनी स्तर पर व्यापक जांच करता है।
इस फैसले के बाद स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पर बहस रुक जानी चाहिए ओर मतदाता जागरूकता के लिए सभी राजनीतिक दलों को व अन्य ऐसे समुह जो इस कार्य में लगे हैं उन्हें यह अभियान चलाना चाहिए।






