कँहा गए समाज सुधारक 

कँहा गए समाज सुधारक 

ललित शंकर हरिद्वार

अभी इस्लामिक पर्व बकरीद आने वाली है।हर तरफ खून, पशुओं के मृत शरीरों के अवशेष, निर्ममता से कटने वाले पशुओं के चीखने की आवाज सुनाई देगी।परन्तु पूरे देश मे हिन्दू पर्वो पर पर्यावरण ,प्रदूषण के नाम पर शोर मचाने वाले समाज सुधारक के मुख से कोई शब्द नही सुनाई देगा।हिन्दू पर्व आते ही कुछ पर्यावरण प्रेमी योजनात्मक रूप से ज्ञान देना शुरू कर देते है।होली पर उनको पानी की बर्बादी दिखाई देने लगती है,दिवाली पर उनको वायु प्रदूषण व ध्वनि प्रदूषण दिखाई देने लगता है,दशहरा के पर्व पर रावण दहन में भी उनको पर्यावरण दूषित होता दिखता है।यंहा तक कि इक्का दुक्का जगह मंदिरों में कंही कोई पशुबलि दी जाए तो उसको लेकर भी पशुओं की हत्या की बात करते हैं।लेकिन जैसे ही बेजुबान पशुओं की निर्मम हत्या करने वाली बकरीद आती है।तो ये सब एक दम चुप्पी साध लेते हैं।न कोई सामाजिक संगठन कुछ बोलता,न कोई राजनीतिक दल कुछ बोलता और न ही कोई इस्लामिक स्कॉलर कुछ बोलता।ये सब समझने का विषय है।कि एक धर्म की सामाजिक हित की मान्यताओं पर लगातार उँगली उठाई जाती है।और एक मजहब की गैर सामाजिक मान्यताओं पर चुप्पी साध ली जाती है।बकरीद पर बंगाल सरकार के निर्देशों पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने पशु कुर्बानी पर एक याचिका के जबाव में सख्ती से बयान देते हुए  कहा कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी इस्लाम मे अनिवार्य मान्यता नही है।इससे पहले भी गाय की कुर्बानी पर सुप्रीम कोर्ट ने भी गाय की कुर्बानी पर रोक लगाई है।लेकिन कुछ तथाकथित महजबी प्रेमियों ने इसका विरोध किया है।हिन्दू पर्वो पर सुधार का ज्ञान पेलने वाले लोगों को बकरीद पर बेजुवान पशुओं का दर्द नही दिखता।आखिर क्यों इन पशुओं को निर्ममता से मारकर उत्सव मनाया जाता है।इस्लामिक मान्यता के अनुसार देखेगे तो इस्लाम मे अपनी प्रिय बस्तुओ की कुर्बानी दिया जाती है।अल्लाह ने इब्राहिम से अपनी सबसे प्रिय बस्तु की कुर्बानी मांगी तब इब्राहिम ने अपने प्रिय पुत्र इस्माइल की कुर्बानी देने के लिये तैयार हुए तो एक भेड़ के बच्चे ने इस्माइल को हटाकर स्वयं को उसके स्थान पर रख दिया,जिससे इस्माइल की जगह उस भेङ के बच्चे की गर्दन कट गई।इब्राहिम के बेटे को बचाने वाले भेड़ के वंशज तभी से अपनी जान बचाते फिर रहै4 है।भेड़ें के अलाबा गाय बैल भैंस यंहा तक कि ऊंट को भी इस दिन निर्ममता से काटा जाता है।पर कोई कुछ नही बोल सकता।बकरीद पर सबसे ज्यादा प्रदूषण होता है।पशुओं के कटने के कारण बहुत तेज सामूहिक ध्वनि उनकी चीख से होती है,जिससे ध्वनि प्रदूषण होता है,एक जानकारी के अनुसार इस ईद पर पशुओं की चीख से उतपन्न कम्पन्न से पृथ्वी भी अपने स्थान से हिल जाती है। करोड़ो बेजुबान पशुओं के कटने से उनके शरीर का रक्त बहकर नालियों के रास्ते नदियों में जाता है जिससे जल प्रदूषण होता है,मृत पशुओं के अवशेष बड़ी संख्या में जमीन में फेंके जाते हैं।जिससे भूमि प्रदूषण होता है,उन्ही अवशेषों के झड़ने से उनकी दुर्गंद वायु को प्रदूषित करती है।इन सबके कारण  बड़ी संख्या में बीमारियां फैलती है जिससे मनुष्य पीड़ित हो जाता। पर कोई भी समाज सुधारक एक शब्द नही बोलता।इस दिन बेजुबान व बेगुनाह पशुओं को बेहरमी से काटकर मानवता को भी शर्मशार किया जाता है।इस्लामिक पद्धति के अनुसार हलाल करके ही मारना स्वीकार्य कुर्बानी बताई गई है।हलाल मतलब गर्दन को हल्का काटकर तड़पने के लिए छोड़ देना,धीरे धीरे तड़फ तड़फकर जब वो पशु मरता है वही कुर्बानी मानी जाती है।अधिक पीड़ा देकर मारना मजहबी आनन्द बन गया।परन्तु कोई कुछ बोलने को तैयार ही नही है।वेसे तो देश की जनता सब समझ चुकी है।वो जान गई है कि बकरीद पर इन तथाकथित समाज सुधारकों व राजनेतिक लोगों की चुप्पी कंही न कंही सोची समझी साजिश रहती है

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