युवाओं में घटती मानसिक सहनशीलता

युवाओं में घटती मानसिक सहनशीलता 

सतीश शर्मा

युवाओं में घटती मानसिक सहनशीलता आज के समय की एक गंभीर चुनौती बन गई है। बदलते लाइफस्टाइल, डिजिटल दबाव और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के कारण युवाओं की तनाव झेलने की क्षमता प्रभावित हो रही है। मानसिक तनाव किसी विशेष परिस्थिति या घटना के कारण शरीर पर पड़ने वाले दबाव की प्रतिक्रिया है। यह घटना कोई भी हो सकती है – शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक प्रतिक्रिया। 

जब कोई व्यक्ति तनाव का अनुभव करता है, तो उसमें शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रिया विकसित होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर को इसे अनुभव करने और उस पर प्रतिक्रिया करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। कोई भी तनाव प्रतिक्रिया शरीर को नए वातावरण में ढलने में मदद करती है। यह हमें सतर्क, प्रेरित और खतरे से बचने के लिए तैयार रखकर सकारात्मक करती है। लेकिन यह जानना महत्वपूर्ण है कि तनाव तब एक समस्या बन जाता है जब तनाव के कारण राहत या आराम के बिना भी हम काम करना जारी रखते हैं। तनाव शैक्षणिक परीक्षाओं, पारस्परिक संबंधों, रिश्तों की समस्याओं, जीवन में बदलाव और करियर की खोज से उत्पन्न होता है। इस तरह के तनाव से आमतौर पर मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और व्यवहार संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। जब कोई चुनौतीपूर्ण परिस्थिति आती है, तो मस्तिष्क ‘लड़ो या भागो’ प्रतिक्रिया शुरू करता है। इससे हाइपोथैलेमस कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे हार्मोन छोड़ता है, जो शरीर को खतरे से निपटने के लिए तैयार करते हैं। लगातार बने रहने पर, यह शारीरिक और मानसिक थकान का कारण बनता है ओर जब वह  तनाव नहीं सह पाता तो वह नशा करता  या आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है।

भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में कुल 1,70,746 लोगों ने आत्महत्या की और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को लगभग 17.9% मौतों का प्रमुख कारण बताया गया। आत्महत्या के पीछे कई बहुआयामी कारण होते हैं जिनमें पारिवारिक समस्याएं (33.5%), बीमारियां (17.9%), और नशा (7.6%) शामिल हैं। तनाव कई मामलों में एक छिपे हुए कारक के रूप में काम करता है और अवसाद का रूप ले लेता है।

 राहुल दिल्ली की एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था। बाहर से देखने पर उसकी जिंदगी परफेक्ट थी। अच्छा पैकेज, आलीशान फ्लैट और हाथ में लेटेस्ट स्मार्टफोन लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक कड़वा सच छिपा था पर राहुल पिछले कई महीनों से भयंकर मानसिक तनाव से गुजर रहा था। उसके दिन की शुरुआत ऑफिस के पेंडिंग काम की चिंता से होती और रात स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए बीतती राहुल का जीवन बिखरा हुआ था व तनाव ने राहुल के शरीर और मन पर कब्जा कर लिया था, वह रात भर करवटें बदलता रहता। उसे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ जाता था,राहुल ने दोस्तों के फोन उठाने बंद कर दिए थे। काम की आधिकता के कारण वह कभी दिन मे खाना भी छोड़ देता था । राहुल का काम भी ऐसा था की उसे ऑफिस में हर वक्त उपलब्ध रहना पढ़ता था इस दवाब के कारण वह  अंदर से खोखला होता चला गया ओर अंत मे राहुल को लगने लगा कि वह दुनिया की  रेस में अकेला पढ़ गया है। 

एक बार ऑफिस की एक बड़ी प्रेजेंटेशन के दौरान राहुल के हाथ कांपने लगे। उसका दम घुटने लगा और दिल की धड़कनें तेज हो गईं। उसे पैनिक अटैक आया था। उसे तुरंत ऑफिस के मेडिकल रूम में ले जाया गया। डॉक्टर ने राहुल से सिर्फ एक बात कही, ” राहुल तुम्हारा शरीर ठीक है, लेकिन तुम मानसिक रूप से थक चुके हो, तुम्हें आराम की जरूरत है।”

उस दिन राहुल को समझ आ गया कि सफलता की कीमत मानसिक शांति को दांव पर लगाकर नहीं चुकाई जा सकती। राहुल ने थेरेपिस्ट से मिलकर अपनी समस्या बतायी तो थेरेपिस्ट उसे कुछ सुझाव दिये की वह रात 9 बजे के बाद अपना फोन बंद कर दे,वर्क-आवर के बाद ऑफिस के काम ना करे, राहुल ने सुबह प्राणायाम,आसन व घूमना शुरू किया। उसका परिणाम दिखा राहुल को आज भी काम का प्रेशर मिलता पर अब वह तनाव को खुद पर हावी नहीं होने देता। राहुल जान गया है कि जिंदगी में ‘ना’ कहना और खुद की मानसिक सेहत का ख्याल रखना कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी समझदारी है क्योंकि वह गया था की “जान है तो जहान है” । 

ये सिर्फ राहुल की कहनी नहीं है ये आज के हर युवा की दास्तान है । इसी विषय पर नागपुर में ‘समर्पण’ माइंड वेलनेस सेंटर के उद्घाटन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  सरसंघचालक  मोहन भागवत जी  ने युवाओं में घटती मानसिक सहनशीलता और संवेदनशीलता पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना था कि पारंपरिक पारिवारिक मार्गदर्शन की कमी और अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण आज की युवा पीढ़ी मानसिक रूप से कमजोर हो रही है। ये समस्या दिन प्रति दिन गंभीर होती जा रही है ।  

उन्होंने कहा कि संयुक्त परिवारों के टूटने और बड़ों (दादी-नानी) द्वारा कहानियों के माध्यम से दिए जाने वाले संस्कारों के अभाव से युवा अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं।  माता-पिता बच्चों के रोने पर उन्हें मोबाइल थमा देते हैं, जिससे वे ‘गूगल बाबा’ के भरोसे पलते हैं और वास्तविक संवाद से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने चिंता जताई कि 12वीं में फेल होने या घर में डांट पड़ने जैसी छोटी घटनाओं पर भी युवा आत्महत्या जैसे घातक कदम उठा रहे हैं। भागवत जी के अनुसार, युवा मन की घटती क्षमता केवल बच्चे की गलती नहीं, बल्कि परिवार और समाज की सामूहिक विफलता है।

      युवाओं में कम उम्र से ही स्मार्टफोन का उपयोग और सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट’ जीवन की अवास्तविक तुलना उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही है। चोट, बीमारी, या अचानक सदमा लगना। कार्यस्थल पर काम का बोझ, डेडलाइन, या परीक्षा का डर। पैसों की तंगी, रिश्तों में अनबन, या किसी प्रियजन को खोना। इससे वे छोटी-छोटी असफलताओं को पचा नहीं पाते। बढ़ता परीक्षाओं में अंकों की होड़ और भविष्य की अनिश्चितता ने युवाओं को निरंतर दबाव में रखा है। खराब खान-पान और व्यायाम न करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच का संतुलन बिगड़ रहा है। आधुनिक जीवनशैली में संवाद की कमी और पारिवारिक समर्थन के कमजोर होने से युवा भावनात्मक रूप से अकेले पड़ जाते हैं। 

सहनशीलता और मानसिक क्षमता बढ़ाने के लिए  स्क्रीन टाइम सीमित करें और सोशल मीडिया पर दूसरों की जिंदगी से अपनी तुलना करने से बचें। प्राणायाम और नियमित व्यायाम मानसिक शांति देते हैं और भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। अपनी भावनाओं को परिवार या दोस्तों के साथ साझा करें। किसी भी प्रकार के मानसिक तनाव में पेशेवर काउंसलर या थेरेपिस्ट की मदद लेने में संकोच न करें। युवाओं को यह समझना चाहिए कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि सीखने की एक प्रक्रिया है। तनाव कम करने के लिए गहरी सांस लें, 10 मिनट तक मेडिटेशन करें या सैर पर जाएं। खुद को शांत करने के लिए ठंडे पानी से कलाई धोएं, अपनी भावनाओं को डायरी में लिखें और किसी करीबी से बात करें।  जब भी तनाव महसूस हो, कुछ मिनटों के लिए धीमी और गहरी सांस लें। यह शरीर के नर्वस सिस्टम को शांत करता है । नियमित शारीरिक गतिविधि जैसे टहलना, योग या कोई भी व्यायाम करने से शरीर में खुशी देने वाले हार्मोन का स्तर बढ़ता है । अपने किसी दोस्त या परिवार के सदस्य से अपनी परेशानी साझा करें। कई बार किसी के साथ बात करने से ही मन का बोझ हल्का हो जाता है सोने से पहले मोबाइल और टीवी जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से दूर रहें ताकि रात को अच्छी नींद आ सके ।

 आधुनिक मनोविज्ञान के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परंपरा (जैसे पतंजलि योग सूत्र) को अपनाने पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए । “मोबाइल नहीं, बातचीत से बनेगा मजबूत मन । भारत में मानसिक  चिकित्सा और उसके अध्ययन की समृद्ध परंपरा रही है, जिसका अध्ययन किया जाना चाहिए। हमे  अपने पुराणों को पढ़ना चाहिए उनमे ऐसी अनेक कहानियां है जो हमे प्रेरणा देती है । 

ओर अंत मे संतुलित आहार लें, पर्याप्त नींद लें और नियमित रूप से व्यायाम करें। स्वयं को आराम देने के लिए कुछ अभ्यास करें। तनाव कम करने के लिए मांसपेशियों को आराम देने वाले व्यायाम करें। प्रकृति के साथ समय बिताएं । “तनाव हमें नहीं मारता, बल्कि तनाव के प्रति हमारी प्रतिक्रिया हमें मार डालती है।”

(लेखक केशव भाग संघचालक नोएडा महानगर।)

 

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