मंदिर चोरी पर चुप क्यों नए सनातनी
अनंत विजय 
अयोध्या स्थित प्रभु श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी की जांच से अधिक तेजी से इस प्रकरण पर राजनीति हो रही है। श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चौरी की घटना निंदनीय है। ददेोषियों को कठोरतम सजा होनी चाहिए। इस चौरी की सजा जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा। सरकार को चाहिए कि वह विशेष जांच दल (एसआइटी) को एक निश्चित समयावधि में जांच पूर्ण करने का आदेश निर्गत करे। उसकी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस अपनी जांच कर कोर्ट में रिपोर्ट सौंपे। उसकी सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करके दोषियों को सजा दी जाए। इस मामले में न्याय होना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है न्याय होते दिखना। चढ़ावा चोरी प्रकरण पर कई राजनीतिक दल के नेता स्वयं को सनातनी साबित करने पर तुले हुए हैं। कोई किसी को रामघाती बता रहा है तो कोई सुंदरकांड का पाठ करवा रहा है। किसी को प्रभु श्रीराम की आस्था पर हुई चोट की चिंता हो रही है तो कोई भक्तों की आहत भावना की चिंता कर रहा। राजनीति के रंगमंच पर हर दिन श्रीराम भक्ति के नए आयाम प्रस्तुत किए जा रहे हैं। जो दल श्रीराम को किस्से कहानियों का चरित्र मानते थे, श्रीरामजन्मभूमि पर अस्पताल और स्कूल खोलने की वकालत किया करते थे, आज उनकी भी आस्था प्रभु श्रीराम में द्विगुणित हो गई है। जिस प्रकार की राजनीति चढ़ावा चोरी को लेकर हो रही है, उसमें सभी राजनीतिक दल स्वयं को सच्चा सनातनी कहते हुए नहीं थक रहे हैं। यह भारतीय राजनीति का एक नया अध्याय है।
इस पूरे प्रकरण पर जिस प्रकार की राजनीति हो रही है, उससे सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा हो रहा है कि चढ़ावा चोरी बड़ी चोरी है या फिर मंदिर चौरी बड़ी है। वस्तुतः भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि किस तरह से लुटेरों ने हमारे आस्था के केंद्र मंदिरों को लूटा। केवल लूटकर ही नहीं छोड़ा, बल्कि लूटने के बाद मंदिरों को ध्वस्त भी किया। ध्वस्त करने के बाद उस स्थान पर मस्जिदें और ईदगाह बनाई गई। चढ़ावा चोरी के बाद जो राजनीतिक दल इस मसले पर राजनीतिक फसल काटना चाहते हैं, उनमें से अधिकतर ने मंदिर चौरों की पैरोकारी की है। कभी चुप रहकर तो कभी मुखर होकर। सबसे पहले बात करते हैं गुजरात के सेमनाथ मंदिर की। वर्ष 1026 से लेकर 1706 तक कई लुटेरों ने सोमनाथ मंदिर को लूटा। गजनी, खिलजी, मुजफ्फर शाह, औरंगजेब ने सौमनाथ मंदिर को लूटा भी और मंदिर को तोड़ा भी। स्वाधीन भारत में जब सोमनाथ मंदिर के लुटेरों और ध्वंस के दाग को मिटाने का प्रयास हुआ तो कांग्रेस के उस समय के नेता नेहरू ने उसका परोक्ष विरोध किया था।
जब भी इस प्रकरण की बात उठती है तो पंडित नेहरू और डा. राजेन्द्र प्रसाद के बीच के पत्र व्यवहार की याद आती है। 10 मार्च, 1951 को राजेन्द्र बाबू ने नेहरू को लिखा, ‘मैं देखता हूं कि सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह के साथ संबद्ध होने का मेरा विचार आपको पसंद नहीं, क्योंकि इसमें अनेक बातें अंतर्निहित हैं। आपको लगता है कि इस समारोह में मेरे जुड़ने से हो सकता है कि कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निर्माण या पुनरुद्धार पिछले लगभग एक माह से देश की राजनीति में श्रीरामजन्मभूमि मंदिर फिर से चर्चा के केंद्र में है। वस्तुतः चढ़ावा चोरी बेहद निंदनीय कृत्य एवं अपराध है, जिसकी व्यापक जांच जारी है। वहीं देश में ऐसे भी अनेक मामले सामने आ चुके हैं जिनमें पूरा मंदिर ही चोरी कर लिया गया, लेकिन आज चढ़ावा चोरी पर बोलने वाले दलों के नेता मंदिर चोरी पर कुछ नहीं बोल रहे हैं। ऐसे में मंदिर चोरी से जुड़े मामलों और उस पर चुप्पी साधे रखने वाले दलों और नेताओं के बारे में भी हमें जानना-समझना चाहिए किया जाए। मैं समझता हूं, आप मानेंगे कि यह रुख अपनाना उचित नहीं है, खासकर जबकि सरकार इसपर कुछ खर्च नहीं कर रही है। मैं समझता हूं कि इस निमंत्रण को अस्वीकार करने का कोई अर्थ नहीं है।’ (डा. राजेन्द्र प्रसाद कारस्पोंडेंस… खंड 14, पृष्ठ 37) ऐसे में हमें एक बार फिर से विचार करना चाहिए कि स्वाधीन भारत में चढ़ावा चौरी बड़ा अपराध है मंदिर चोरी।
श्रीरामजन्मभूमि के मामले में तो पूरे देश ने देखा कि जब जन्मभूमि को मुक्त करवाने का आंदोलन चल रहा था तो कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों का क्या रुख था। अदालतों में प्रभु श्रीराम के बारे में किस तरह की बातें कही गईं, पूरे देश को अब भी याद है। जब श्रीरामजन्मभूमि स्थित विवादित ढांचा गिरा था, उसके बाद जिस तरह की राजनीति हुई, वह भी स्मृतियों में है। संसद में श्रीरामजन्मभूमि में विराजमान रामलला को अनआथौराइज्ड तक कहा गया। समाजवादी पार्टी नेता रामगोपाल वर्मा ने तो यहां तक कह दिया था कि जो गुंबद पर चढ़ गए थे, वो नीचे उतर नहीं सके। उनको इस बात की चिंता भी नहीं थी कि हिंदू मतदाता उनकी पार्टी को बोट देंगे या नहीं। उसी समाजवादी पार्टी के नेता अब सनातनी और रामभक्त होने का दावा करते हुए घूम रहे हैं।
श्रीरामजन्मभूमि स्थित मंदिर की भी तो चोरी ही हुई थी। उसके बाद वहां मस्जिद बना दी गई थी। चढ़ावा चोरी पर हमलावर राजनीतिक दल के नेता मंदिर चौरी पर एक शब्द भी नहीं बोल पाते थे। डा. राजेन्द्र प्रसाद ने जवाहरलाल नेहरू को जो लिखा, उसका एक वाक्य देखा जाना चाहिए- ‘कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मुसलमान आक्रमणकारियों या मंदिर चोरों के प्रति नरम रुख दिखा कर वर्षों तक मुस्लिम बोट की राजनीति होती रही। काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर भी यही रुख रहा है। वहां भी यही सारे दल मंदिर चोरों के पक्ष में दिखते हैं।
मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर भी ताजा-ताजा रामभक्त हुए राजनीतिक दलों का रुख भी देखना चाहिए। इस बात का उल्लेख इतिहास की तमाम पुस्तकों और वृत्तांतों में मिलता है कि वर्ष 1670 में औरंगजेब ने मथुरा के केशवदेव मंदिर का ध्वंस कर वहाँ शाही ईदगाह बनवाया था। क्या यह हिंदू मंदिर की चोरी नहीं थी। पूरे मंदिर की चोरी करके वहां ईदगाह बनवा दिया गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उस स्थान की नीलामी कर दी।
नीलामी में बनारस के राजा पटनीमल ने यह जमीन खरीदी थी। कालांतर में उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने पटनीमल के वारिसों से यह जमीन खरीद ली। उनके साथ उस समय जयदयाल डालमिया और हनुमान प्रसाद पोदार भी थे। बाद में उस स्थान पर रामकृष्ण डालमिया ने केशवदेव का मंदिर बनवाया। मंदिर बनने से लेकर 1968 तक कांग्रेस का क्या रुख रहा, यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
आज भी श्रीकृष्णजन्मभूमि स्थित कारावास में जाने पर स्पष्ट लगता है कि मंदिर चोरों ने हिंदुओं के इस पवित्र स्थल पर डाका डाला था। क्या स्वाधीनता के बाद इन मंदिर चोरों के कृत्यों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी? लेकिन नहीं हुई। क्योंकि इससे मुस्लिम बोट बैंक के छिटकने का खतरा था। आज जो भी राजनीतिक दल सनातनी होने का दावा कर रहे हैं, उनको मंदिर चोरों पर भी अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। उचित तो यह होगा कि सनातनी होने का दावा करनेवाली पार्टियां श्रीकृष्णजन्मभूमि के मामले में भी सनातनी रुख अपनाएं और उसको मुक्त करने के अभियान में साथ आएं। बयानों में सनातनी दिखने से बेहतर होगा कि अपने कर्मों में सनातनी दिखें। क्योंकि कर्म की प्रधानता का अपना महत्व है।






