शिक्षा में अपव्यय व अवरोधन
सतीश शर्मा 
शिक्षा में अपव्यय (बिना प्राथमिक शिक्षा पूरी किए बीच में स्कूल छोड़ना) और अवरोधन (एक ही कक्षा में फेल होकर दोबारा रुकना) मुख्य रूप से गरीबी, अशिक्षा और दोषपूर्ण शिक्षण व्यवस्था के कारण होते हैं। ये दोनों समस्याएँ प्राथमिक शिक्षा स्तर पर सबसे अधिक देखी जाती हैं। अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के प्रचार में जहाँ अन्य बाधाएँ सामने आई उनमें अपव्यय तथा अवरोधन की समस्याएँ भी प्रमुख रही है। शिक्षा में जब अपव्यय पर बात होती है तो पाया जाता है कि प्राथमिक शिक्षा में अपव्यय और अवरोधन अधिक है। हमारी प्राथमिक शिक्षा के लिए यह एक गम्भीर समस्या है। हम जब तक इस समस्या से निजात नहीं पाते तब तक शिक्षा के सार्वजनीकरण का हमारा सपना पूरा नहीं हो सकता।
अपव्यय का आशय बालक का अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी किए बिना ही विद्यालय छोड़ देना, जिससे बालक पर खर्च किया गया धन, समय और श्रम बेकार चला जाता है। हार्टोग कमेटी के अनुसार-“प्राइमरी शिक्षा पूरी करने से पहले बच्चे का किसी स्तर पर स्कूल छोड़ देना अपव्यय है।” अवरोधन का आशय कक्षा में असफल रहने से लिया जाता है। अर्थात एक ही कक्षा में दोबारा पढ़ाई के लिए ठहरना।
आर्थिक कारण से गरीब माता-पिता बच्चों से घरेलू काम करवाते हैं या उन्हें मजदूरी पर भेजते हैं।खर्च का बोझ इतना होता है की मुफ्त शिक्षा के बावजूद कॉपियाँ, किताबें और कपड़ों का खर्च उठाना कठिन होता है। माता-पिता का पढ़ा-लिखा न होना, जिससे वे शिक्षा का महत्व नहीं समझ पाते ओर उनकी उदासीनता बच्चों की पढ़ाई के प्रति परिवार का लापरवाह रवैया भी इसकी वजह है । लड़कियों की शिक्षा को कम महत्व देना।ये कुछ एसे कारण है रुकावट करते है ।
रटने पर जोर देना और पुराने पढ़ाने के तरीके अपनाना। बच्चों के जीवन और रुचि से पाठ्यक्रम का मेल न खाना। स्कूलों में कमरों, शौचालय, और शिक्षण सामग्री का अभाव। शिक्षकों का बच्चों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण न होना।
एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा प्रकाशित “Encyclopedia of Indian Education Vol. 2 में कहा गया है कि “शोध अध्ययनों से निरिक्षण कर यह पाया गया है 20% बच्चे ग्रामीण इलाकों में विद्यालय से बाहर तथा 25% बच्चे शहरी क्षेत्र में विद्यालय से बाहर है, ये सभी बच्चे किसी रोजगार में सलंग्न है, जिनसे उन्हें कुछ आमदनी होती है।”
इस संदर्भ में हम प्रवेश लेने वाले ड्राप आउट, अनामांकित बालक-बालिकाओं की स्थिति वर्ष 2004 के तथ्यों में निम्न प्रकार से देख सकते हैं।
कक्षा 1 में प्रवेश लेने वाले बच्चें,बालक -610148,बालिका 544894,कुल 1155042
ड्राप आउट बालक-बालिकाओं की संख्या- बालक 103881,बालिका -151028,कुल 254909
अपव्यय व अवरोधन के कुछ निम्नलिखित कारण है – निर्धनता-निर्धन अभिभावक अपने भोजन-वस्त्र की व्यवस्था ही ठीक प्रकार से नहीं कर पाते, ऐसी दशा में वे अपने बालकों को शिक्षा कैसे दिलाएँ। वे अपने बच्चों के लिए पढ़ाई के साधन नहीं जुटा पाते जिससे बालक बीच में पढ़ना छोड़ देता है। निर्धन अभिभावक शिक्षा की अपेक्षा जीविका को अधिक महत्व देते है। अतः वे अपने बच्चों को पढ़ाना छुडाकर किसी काम में लगा देते है इससे अपव्यय और अवरोधन अधिक बढ़ रहा है।
शिक्षा में अपव्यय एवं अवरोधन की समस्याओं को दूर करने के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं, गरीब बच्चों को मुफ्त वर्दी, कॉपियां, किताबें और छात्रवृत्ति देना। पढ़ाई का समय ऐसा रखना जिससे बच्चे परिवार की मदद भी कर सकें। माता-पिता को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक करना। लड़कियों के लिए मुफ्त और सुरक्षित शिक्षा का प्रबंध करना।सिलेबस को बच्चों के दैनिक जीवन से जोड़ना और आसान बनाना। रटने के बजाय गतिविधि-आधारित शिक्षण पद्धतियों का उपयोग करना। प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति और उनका बच्चों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) लागू करना ताकि बच्चे परीक्षा के डर से स्कूल न छोड़ें। प्रत्येक गांव में उचित दूरी पर स्कूल खोलना। स्कूलों में पीने का साफ पानी, बिजली और अलग शौचालय (विशेषकर लड़कियों के लिए) सुनिश्चित करना। दोपहर के भोजन की गुणवत्ता में सुधार करना ताकि बच्चे स्कूल आने के लिए प्रेरित हों।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में शिक्षा में अपव्यय (ड्रॉपआउट) और अवरोधन को रोकने तथा स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (GER) हासिल करने के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं:1. 5+3+3+4 स्कूली ढांचाप्रारंभिक बचपन की देखभाल और शिक्षा (ECCE), खेल-आधारित शिक्षा के जरिए 3 साल की उम्र से ही बच्चों को औपचारिक शिक्षा से जोड़ा गया है, जिससे बच्चे स्कूल से डरने के बजाय आकर्षित हों। कक्षा 1 और 2 में पारंपरिक परीक्षाओं का दबाव हटा दिया गया है, ताकि अवरोधन (फेल होने) की समस्या खत्म हो। स्कूल छोड़ चुके लगभग 2 करोड़ बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा में वापस लाने का लक्ष्य तय किया गया है । डिजिटल माध्यमों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से प्रत्येक बच्चे की उपस्थिति और सीखने के स्तर की लगातार ट्रैकिंग की जाएगी। प्राथमिक स्तर (कम से कम कक्षा 5 तक) की शिक्षा मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में देने का प्रावधान है। भाषा की समझ न होने के कारण होने वाले अपव्यय को रोकने में यह बहुत मददगार है। पाठ्यक्रम को कम करके व्यावहारिक समझ (Conceptual Understanding) पर केंद्रित किया गया है। आर्ट्स, साइंस या कॉमर्स के बीच की दीवारें हटा दी गई हैं। छात्र अपनी पसंद के विषय चुन सकते हैं, जिससे पढ़ाई में उनकी रुचि बनी रहती है। कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) और इंटर्नशिप को शामिल किया गया है। समावेशी और समानता-आधारित फंडजेंडर इंक्लूजन फंड (Gender Inclusion Fund), लड़कियों और ट्रांसजेंडर छात्रों को स्कूल तक पहुँचाने और सुरक्षित माहौल देने के लिए अलग से फंड की व्यवस्था की गई है। विशेष शिक्षा क्षेत्र (SEZ), शैक्षिक रूप से पिछड़े और वंचित क्षेत्रों में विशेष स्कूल खोले जा रहे हैं । ओपन स्कूलिंग का विस्तार वैकल्पिक रास्ते खोले जा रहे है ,जो बच्चे नियमित स्कूल नहीं जा सकते, उनके लिए राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) के माध्यम से दूरस्थ शिक्षा (Distance Learning) के दायरे को बढ़ाया गया है।
शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु राज्य व केंद्र सरकार अनेको उपाय कर रहे है ताकि छात्र अपनी पढ़ाई बीच मे ना छोड़े । लेकिन सब काम सरकारों पर नहीं छोड़ना चाहिए । हमे जागरूकता अभियान चला कर अपना योगदान देना चाहिए । अनेको सामाजिक संगठन इस काम मे लगे हुए है ।






