भारत में घटते परिवार व गुमराह युवा पीढ़ी
सतीश शर्मा 
परिवार समाज की सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण इकाई है। यह आमतौर पर रक्त, विवाह या गोद लेने के बंधन से जुड़े लोगों का एक समूह होता है जो एक साथ रहते हैं, एक-दूसरे की देखभाल करते हैं और भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं।एकल परिवार इसमें माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे शामिल होते हैं। पहले संयुक्त परिवार होते थे इसमें कई पीढ़ियों के लोग (जैसे- माता-पिता, बच्चे, दादा-दादी, चाचा-चाची) एक साथ एक ही घर में रहते हैं। नए व्यवसायों और नौकरियों के लिए लोग गाँवों से शहरों की ओर जा रहे हैं, शहरों में महंगे और छोटे मकान होने के कारण पूरा परिवार एक साथ नहीं रह पाता है, वक्त के साथ बदलाव हुआ ओर एकल-अभिभावक परिवार प्रणाली विकसित हुई इसमें केवल एक माता या पिता अपने बच्चों के साथ रहते हैं। परिवार बच्चों का पालन-पोषण और समाजीकरण करता है। यह सदस्यों को भावनात्मक सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और एक पहचान देता है। हमारे जीवन में परिवार का महत्व सबसे ऊपर है क्योंकि यह हमें अटूट प्रेम, सुरक्षा और भावनात्मक संबल प्रदान करता है। यह हमारी पहली पाठशाला है जो हमें अच्छे संस्कार और पहचान देती है। सुख-दुख में परिवार हमेशा साथ खड़ा रहता है। यह एक ऐसा सुरक्षित माहौल देता है जहाँ हम बिना डरे रह सकते हैं। परिवार से ही हमें ईमानदारी, प्यार और बड़ों का आदर करना सीखते हैं। अपनों के साथ रहने से तनाव कम होता है और खुशी मिलती है।
भारत में परिवार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, जिसमें संयुक्त परिवारों का घटना, एकल (न्यूक्लियर) परिवारों का बढ़ना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता इसके मुख्य कारण हैं। यह बदलाव आधुनिकीकरण, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली का परिणाम है। रोजगार और शिक्षा के लिए शहरों की ओर पलायन के कारण पारंपरिक संयुक्त परिवार अब छोटे एकल परिवारों में बदल रहे हैं व बढ़ती महंगाई और जीवनस्तर को बेहतर बनाए रखने की चाहत के कारण अब लोग छोटे परिवार पसंद कर रहे हैं वही महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और कार्यबल में भागीदारी बढ़ने से घर के पुराने पितृसत्तात्मक नियमों में बदलाव आया है व युवा पीढ़ी अपने करियर, जीवनसाथी और जीवनशैली से जुड़े फैसले अब स्वतंत्र रूप से ले रही है इस कारण परिवार सीमित हो रहे है । शिक्षा और करियर को लेकर बढ़ती प्राथमिकता के कारण शादी और बच्चों की योजना में देरी देखी जा रही है इस कारण एक संतान ही हो रही है, कही तो वो भी नहीं है।
मेट्रो सिटी (महानगरों) में रह रहे जॉब वाले दम्पतियों के बच्चे कॉलेज लाइफ़ में शराब और चरस का सेवन सीख चुके हैं स्कूल बैग के अंदर वेप (ई सिगरेट) मिल रही है इन बच्चों का परिवार नामक संस्था में कोई विश्वास नहीं है ना यह शादी करवा के परिवार बढ़ाएंगे लिविन रिलेशन मे रहे का चलन बढ़ रहा है । यह अपने बूढ़े मां बाप के पास रहना पसंद नहीं करते, कॉलेज में ब्रेनवॉशड इन बच्चों की ही जिद्द और बदतमीजियो के कारण इनके मां बाप दूसरे रिश्तेदारों से भी कट चुके हैं जब इनके बूढ़े मां बाप मरेंगे तो यह संतानें उनका विधिवत संस्कार तक नहीं करेगी श्राद्ध तो दूर की बात।
बड़े शहरों में पैसा कमाने में व्यस्त दंपति ने ये बच्चे पैदा अवश्य किए हैं, पर यह काम आएंगे आंदोलन लॉबी के यह ताउम्र सिंगल रह जाएंगे और आंदोलन जीवियों द्वारा जंतर मंतर या दिल्ली में रखे धरने प्रदर्शनों में जाने के काम आएंगे यह सिर्फ यूट्यूब वाले कोचिंग सेंटरों की सुनेंगे बीमार पड़े मां बाप की नहीं आज जो 55-60 के हो चले हैं उन्हें कोई पानी पिलाने वाला नहीं होगा आज जो एक्टिविस्ट 60-70 वर्ष की उम्र वाले हैं इनके पारिवारिक बैकग्राउंड पता करवा लो, इनके मां बाप भी ऐसे ही अकेले कमरों में मर गए उन्हें देखने तक नहीं पहुंचे यह 65-70 वाले । नहीं यकीन तो एक्टर पीयूष मिश्रा से पूछ लो वो खुद बताता है जब वह आंदोलन कारी था उसके मां बाप ऐसे ही बिना सेवा के तंगी में मर गए, तब जाकर उसके दिमाग से आंदोलनों का नशा उतरा।
किसी चालाक भेड़िये की तरह मुंह से मीठा बोलने वाले आंदोलन कारी ईको सिस्टम के प्रोडक्ट लोग अपने बच्चों को विदेश भेजकर उनके भविष्य को संवार रहे है ओर आपके बच्चों को आंदोलनजीवी और LGBT समलैंगिक बना कर आज उन्हें प्रेरित कर रहे के सदा सिंगल रहो और जंतर मंतर पर क्रांति करने के लिए ही तुम्हारा जन्म हुआ है।
90 के दशक में न्यूयॉर्क, सन फ्रांसिस्को, लॉस एंजल्स, शिकागो, वाशिंगटन भी ऐसी ही शापित हो गया था । आज इन चारों मेट्रो सिटी में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को LGBT/समलैंगिक बना दिया जाता है। ज़रा सोचो आपके पैदा किए बच्चे किसके काम आ रहे हैं? आपके या आंदोलन जीवियों के? क्या 10 साल बाद भारत में आपके बच्चे भी ऐसे ही परिवार के बिना सिंगल/समलैंगिक होकर मर खप जाएंगे? आज की Zen G पीढ़ी जब बूढ़े होके मरेगी तब इनको खुद को आग लगाने वाला कोई नहीं बचेगा भारतीय परिवार अब भी ना सुधरे तो अगले 10 साल बाद आपकी लाश (अर्थी) के पास रोने वाला कोई रिश्तेदार तक मौजूद नहीं होगा आपके पास।
परिवार का भविष्य आर्थिक सुरक्षा, अच्छी शिक्षा और आपसी एकजुटता पर निर्भर करता है। एक सुरक्षित कल के लिए वित्तीय योजना, बच्चों का सही मार्गदर्शन और स्वास्थ्य का ध्यान रखना जरूरी है। हर महीने कमाई से कम खर्च करें और सही जगह निवेश करें। परिवार के लिए स्वास्थ्य और जीवन बीमा जरूर लें। पैसों के मामलों पर परिवार के साथ खुलकर बात करें। बच्चों के विकास के लिए उन्हें अपना समय और ऊर्जा दें। बच्चों के करियर और शिक्षा के संबंध में आज ही सही फैसले लें। बच्चों को अच्छे संस्कार और नैतिक शिक्षा सिखाएं। लेकिन कुछ बदलाव हो रहे जैसे की भौतिक रूप से अलग रहने के बावजूद परिवार के सदस्य दूर रहने के बाद भी वीडियो कॉल और मैसेज के जरिए भावनात्मक रूप से जुड़ रहे हैं।






