यह हार नहीं है, एक लम्बी योजना का “कोमा” है
मनमीत सोनी 
यह सम्भव है कि आज आयोजित हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में जे. पी. नड्डा का उतरा हुआ चेहरा देखकर मुझ जैसे प्रखर राष्ट्रवादियों को अतिशय पीड़ा हुई हो। यह भी सम्भव है कि सौरभ दास और आशुतोष रांका और अभिजीत दीपके के चेहरे की ख़ुशी ने आपको एक गहरी निराशा में धकेल दिया हो। यह भी सम्भव है कि आपके मुँह से भी वैसी ही गालियां निकल रही हो :
नीम का पत्ता कड़वा है… ₹#@%&…!
लेकिन यहाँ आपको रुकना होगा।
और भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी के बीच एक बारीक रेखा खींचनी होगी। इसमें तो किसी को कोई संदेह नहीं कि नरेन्द्र मोदी राष्ट्रवाद से दीक्षित व्यक्ति हैं और उन्हें राष्ट्रवाद की समझ फेसबुक / इंस्टाग्राम या x से नहीं मिली है। लेकिन किसी भी विचार की सेवा और उसका प्रसार केवल आक्रमण से नहीं होता। तलवार के साथ ढाल भी महत्वपूर्ण होती है। ढाल का सबसे बेहतर प्रयोग हम किसान आंदोलन, शाहीन बाग़ और रोहित वेमुला जैसे मुद्दों पर देख चुके हैं। लेकिन तलवार का प्रयोग भी हमने 370, राम मंदिर और ऑपरेशन सिंदूर के समय देखा है। यह एक रणनीतिक स्टांस है, जो बहुत कुछ देख समझकर लिया जाता है।
वर्तमान आंदोलन दरअसल कोई आंदोलन है ही नहीं। चौदह से लेकर अठारह की आयु के वर्ग के बच्चों के भीतर उठी हुई एक असंतुष्ट चिंगारी भर है, जिसका इलाज बहुत आसानी से किया जा सकता था। सम्भवतः पहले दिन ही किया जा सकता था। लेकिन नहीं किया गया। यह इस सरकार की मंशा है कि हमें इस राष्ट्र पर कम से कम अभी तीस – चालीस बरस शासन और करना है। और तीस – चालीस बरस शासन करने के लिए बीच बीच में किसी न किसी वर्ग की मांग के आगे झुककर जनता तक यह सन्देश पहुँचाना ज़रूरी है कि हम आपकी आलोचना का आदर करते हैं। साथ ही यह भी कि हम फासिस्ट नहीं हैं। (जो कि हैं भी नहीं)
समस्या यह है कि भारतीय जनता पार्टी के समर्थक एक जल्दबाज़ी में दिखाई देते हैं। वे नरेन्द्र मोदी को जादू की छड़ी समझते हैं। हालांकि स्वयं को जादू की छड़ी के रूप में प्रस्तुत करके ही मोदी सत्ता में आए थे। लेकिन वे तब भी जानते थे कि इस राष्ट्र की नस नस में उपभोक्तावाद, तुष्टिकरण, राष्ट्रद्रोह, आत्मघृणा और आत्मपीड़ा का ज़हर घुल चुका है। उन्हें पूरा एक दशक लगा एक सामान्य हिन्दू के मन में यह भाव भरने के लिए कि वह किसी भी मंच पर खुलकर कह सके :
हाँ! मैं हिन्दू हूँ! बिगाड़ के दिखा कुछ!
यह आत्मविश्वास दशकों पहले लुप्त हो चुका था। भीतर एक मवाद भरा था कि इस महादेश में वामपंथी, लिब्रल्स और बौद्धिक आतंकवादियों के समक्ष हमारी हैसियत कुछ भी नहीं है। इस मवाद को बाहर निकालने के लिए ओपरेशन ज़रूरी था लेकिन यह एक बार में होने वाला ओपरेशन नहीं था। यह क्रमिक सर्जरी थी। जो हुई, और सफलतापूर्वक हुई।
इस सर्जरी के दौरान मरीज़ों के हाथ-पाँव फूल जाने तय थे। यह डर भी बैठ जाना स्वाभाविक था कि हमारा उपचार ठीक से नहीं हो रहा है। लेकिन यह सब हुआ। धीरे धीरे हुआ। आगे भी होता रहेगा।
सवाल यह है कि इस आंदोलन में जिस नेता की दाढ़ी मूंछ भी न निकली, वह मोदी को दबा गया। यहाँ आप पूरी तरह से ग़लत हैं और भ्रमित हैं। नरेन्द्र मोदी जैसा व्यक्ति, जो पिछले पच्चीस बरसों से भारत के मुख्य मीडिया, उसके नैरेटिव, खतरनाक अल्पसंख्यक वर्ग, बौद्धिक आतंकवादियों के सिण्डिकेट को तोड़कर सत्ता पर काबिज़ है, वह अच्छी तरह जानता है कि नालायकों के बराबर नालायक नहीं हुआ जाता। वैसे भी एक मंत्री सरकार नहीं है। कोई नहीं बता सकता कि जे पी नड्डा और जीतेन्द्र सिंह की अमित शाह और नरेन्द्र मोदी से क्या बात हुई होगी।
ध्यान में रखना ज़रूरी है कि इस समय अमित शाह बिलकुल चुप हैं। वे किन कड़ियों को जोड़ रहे हैं और तोड़ रहे हैं, कोई नहीं जानता। न कोई यह जानता है कि अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के भीतर क्या खिचड़ी पक रही है।
आज जो इस्तीफ़ा हुआ, वह हमारे लिए आश्चर्यजनक नहीं है। वह हमसे कहीं अधिक कॉकरोचों के लिए आश्चर्य का विषय है। मैंने जब एक कामरेड को आगे से बढ़कर यह सूचना दी कि धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया तो उनके चेहरे पर बारह बज गए।
उन्होंने हकलाते हुए कहा : “मोदी मान गया? हरामी! कैसे मान गया?”
इस हरामी शब्द के भीतर उस कामरेड के कितने सपने ध्वस्त हो गए, इसकी कल्पना केवल वे कर सकते हैं जिन्हें इस बात का अनुमान है कि दिल्ली में जंतर मंतर पर असल में क्या खेल रचा जा रहा था। हमें इस खेल को खुला रहस्य ही रखना चाहिए। यह छ: महीनों में खुलेगा जब कुछ लोग हिरासत में होंगे और कोई उनका नामलेवा भी नहीं होगा। यह मैं स्टाम्प पेपर पर लिख कर दे सकता हूँ।
अब बहुत ज़रूरी बात। हमें क्या करना चाहिए। हम जो राष्ट्रवादी हैं। जो वामपंथियों को पूरी तरह निस्तेज कर देना चाहते हैं, उन्हें पूरी तरह बर्फ़ हो जाना चाहिए। पहले भी इस सरकार ने किसी राष्ट्र विरोधी तत्व को नहीं छोड़ा है। यदि छोड़ा होता तो सीटें कम आने के बावजूद राज्य दर राज्य मोदी लहर न होती। कम से कम बंगाल तो नहीं ही जीता जा सकता था। इसलिए ठंडे रहिये। राष्ट्रद्रोहियों को, उनके दद्दाओं को, ब्रा निकाल कर फेंकती हुई भारी भरकम मादाओं को केवल देखिये। उनका जश्न देखिये। देखिये कि वे मोदी की माँ की….. / बीवी नहीं तो देश को पेलेगा टाइप नारे लगाने वाली जेन ज़ी को कैसे शाबासी दे रही हैं।
यह एक तात्कालिक विजय का आभास भर है। उन्हें इस आभास में रहने दीजिये। यही तो वर्तमान सरकार की योजना है / थी। सब कुछ उघड़ गया है। अब कुछ नहीं बचा। एक भी सोशल मीडिया अकाउंट, एक भी x हैंडल, एक भी इंस्टा आईडी कुछ भी ऐसा नहीं जो सरकार की इंटेल से छुपा हो। जनगणना के बिना जनगणना यही तो होती है।
मैं फिर कहता हूँ कि दो कौड़ी के क्रांतिकारी कवियों, उनकी दीदियों, उनके प्रशंसकों को पूरी तरह उत्तेजित होने दीजिये। कोई कुकुर चाहे रोये चाहे हँसे, हाँफता ज़रूर है। यह हाँफना ही तो उसके कुकुर होने का सबूत है।
इन गधों को यह पता ही नहीं कि इस आंदोलन की गालीबाज़ रील्स ने घर-घर में बैठी हुई सात्विक मातृशक्ति को फिर से एक कर दिया है और मोदी के पक्ष में सहानुभूति का अथाह सोना तौल दिया है।
आप किसी भी समझदार आदमी से पूछ लीजिये : वह आपको इस आंदोलन के बारे में गंभीरता से बात करता हुआ नहीं दिखेगा। यह एक तमाशा था। एक आयोजित प्रायोजित तमाशा। जिससे यह पूरी तरह साफ़ हो गया कि बहुमत अभी भी मोदी के पक्ष में है और वे 29 में फिर बड़े बहुमत से आ रहे हैं।
रही बात इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों की तो मुझसे लिखवाकर ले लीजिये कि आज का दिन इनकी मूल स्वतंत्रता का अंतिम दिन है। आज से वे जिस रडार पर हैं, उसके बारे में उन्हें जब तक मालूम होगा, बहुत देर हो चुकी होगी।
मोदी गुजरात का माणुस है। वह ऐसी बाधाओं को गाड़ी के सामने से गुज़र जाने वाली थैलियों से अधिक कुछ नहीं मानता। वह एक सप्ताह में पूरी जेन ज़ी को अपने पक्ष में मोड़ सकता है। यह पक्ष में मोड़ लेना मोदी का अंतर्निहित जादू है। इस जादू से विपक्षी हमेशा घबराए रहते हैं। मैं फिर कहता हूँ कि डेढ़ – दो सौ गालीबाज़ों को जेन ज़ी न समझा जाए। असली जेन ज़ी घर बैठा है। जंतर मंतर पर तो उनको दूध पिलाने वाली मादाएँ और उनके डायपर बदलने वाले सोशल मीडिया के पप्पू इकट्ठे हुए थे। जिस देश में “सम्पूर्ण क्रांति” जैसे महत्वाकांक्षा का ढ़ोल बज गया, उस देश में दस – पंद्रह हज़ार लौंडो – लपाड़ों को इकट्ठा करके शिक्षा-मंत्री का इस्तीफ़ा नहीं होता पागलो!
ख़ैर!
अब जब यह खुली जंग है और मैं, जो समकालीन हिंदी कविता के वेश्यालय से सारे नाते तोड़ चुका हूँ और पूरी तरह भारतीय जनता का ही हो चुका हूँ, सो कह सकता हूँ कि हाँ मैं राष्ट्रवादी हूँ और आग लगे, भाड़ में जाए तुम्हारे पुरस्कार / अनुदान!
अंतिम बार निवेदन : – मज़े लीजिये! शांत रहिये! देखिये!
इब्तिदा ए इश्क़ है, रोता है क्या? आगे-आगे देखिये! होता है क्या?






