मैं “सीकर” का हूँ मैडम, मुझे जेन ज़ी पर ज्ञान मत दो

मैं “सीकर” का हूँ मैडम, मुझे जेन ज़ी पर ज्ञान मत दो 

मनमीत सोनी सहायक आचार्य (विधि)

मैं सीकर (राजस्थान) में ही जाया-जन्मा। लेकिन बचपन में चूरू (राजस्थान) चला गया। बीच-बीच में किसी पर्यटक की तरह होली – दीवाली – संक्रांति – गर्मी की छुट्टियों में आता रहा और तेज़ी से बदलते हुए अपने शहर को देखता रहा। 

अपने दादाजी के पीछे लूना मोपेड पर शहर घूमने से लेकर अपनी पत्नी को एक्टिवा पर मैंने इसी शहर में घुमाया। इस वास्ते शहर के उन सुनसान इलाकों को “विकसित” और “प्रदूषित” होते हुए भी देखा। जिन सड़कों पर कोई भूले भटके भी नहीं जाना चाहता था, वहाँ कोचिंगें खुली, लोगों ने अपने घर किराए पर देने शुरू किये, फिर योजना के तहत पीजी और हॉस्टल बने। पीछे-पीछे दुकानें आयीं, और दुकानों के पीछे बड़े-बड़े मॉल, सुसज्जित कैफ़े, यहाँ तक एमबीए किये हुए चाय वाले भी। फिर ठेके भी आये। शराब के ठेके। हाईवे पर चौबीस घंटे खुले। फिर टांसपोर्ट बेहतर हुआ। फिर छोटे-छोटे ठेले वाले आए। इनके साथ पाव-भाजी वाले, मोमोज़ वाले, गन्ने के ज्यूस वाले, मैंगो शेक और लड़कियों के लिए स्पा, ब्यूटी पार्लर और जिम वाले भी आए। 

ज़मीनों की कीमतों ने आसमान छुआ तो ज़मीनों के सौदागर भी आए। 

एक पूरा औद्योगिक-नगर ही खुल गया। यह अर्थव्यवस्था इसी जेन ज़ी को उपभोक्ता बनाने के लिए बनी थी। सो, इन्हें पूरा – पक्का – एक्सपर्ट “उपभोक्ता” बना दिया गया। मैंने एक पूरी पीढ़ी को गर्त में जाते देखा है। अपनी आँखों से देखा है। झूठ नहीं कहता। 

मैंने अलग-अलग संस्थानों में पंद्रह से अठारह वर्ष के बच्चों को पांच बरस पढ़ाया है। यह भी होता था कि उनकी शार्पनेस के आगे मुझे कई बार दिक़्क़त होती थी। उनकी भाषा मुझे असहज करती थी। उनको पढ़ाने के लिए बहुत पढना पड़ता था (जो कि अच्छी बात थी), उनकी जल्दबाज़ी और तेज़ी से बहुत आगे निकल जाने की ज़िद के आगे मेरे मूल्य कुछ पुराने हो गए थे।लेकिन मैं यह भी जानता था कि यह बच्चे एक-दूसरे से आगे निकलने की ज़िद में एक-दूसरे से ही टकरा जाएंगे। और होता भी यही था : – एक बच्ची के पीरियड का दर्द उठता था तो दूसरी बच्ची उसे बाथरूम ले जाने को तैयार नहीं होती थी (बिकज़ शी वाज़ ए बिच), क्योंकि वह उसकी आँखों में “कुतिया” थी। उसके बॉयफ्रेंड को छीनने वाली। एक लड़का दूसरे लड़के की पढ़ाई में मदद नहीं करता था। क्योंकि वह कहता था : “साला एग्जाम पास करके मेरी ही सीट तो खाएगा और मैं “घंटा” इसे सीट नहीं देने वाला!”

मेरे लिए यह बिलकुल नया संसार था। इसकी भाषा से अनजान। इसके मूल्यों से अपरिचित क्योंकि मूल्य थे ही नहीं। इसकी “नशे” की प्रति क्रेविंग देखकर मेरा मुँह खुला रह जाता था। हाईवे पर खुले हुए ठेकों से इन बच्चों के सम्पर्क थे। इनके पास इस इतनी-सी उम्र में आयोडेक्स को ब्रेड पर लगाकर खाने का चाव था, पाँव के मोज़ों को पानी में भिगोकर सड़ाने के बाद सूंघने का चाव था, और लड़कियाँ; वे तो थिनर सूंघती दिख जाती थी। रुमाल में छिड़का हुआ थिनर, जिसके बारे में कोई जासूसी भी नहीं हो सकती। और उस बच्चे को कैसे भूल सकता हूँ, जिसने मुझे ख़ुद बताया कि वह पेट्रोल सूंघने का “एडिक्ट” हो चुका है। यह लेख लम्बा हो जाएगा लेकिन मैंने इतने क़रीब से इन बच्चों को देखा है कि मैं इनके लक्षणों को बहुत अच्छे से पहचानता हूँ। और यह जेन ज़ी या अल्फ़ा या बीटा का सवाल नहीं है। बढ़ते हुए हिंसा के मामले, सेक्सुअल ऑफन्स, ड्रग्स रैकेट, मोटर व्हीकल के मामले और भी न जाने क्या-क्या। 

एक बहुत कच्ची उम्र में कि जब गुप्तांगों पर ठीक से बाल तक नहीं फूटते, इनकी ज़ुबान पर “फ़क़” और “,,,,,, दूंगा” जैसे शब्द आम हैं। इनमें से कुछ पोटेन्शिययल रेपिस्ट हैं, सवाल यह है कि वर्ल्ड की बेस्ट इकोनॉमी बनने के सपने देखने वाले भारत में इनकी निगरानी कौन कर रहा है? यदि हाँ, तो भगवान इस “मोरल पोलिसिंग” को और मज़बूत करे! और नहीं – तो मोदीजी सब कुछ छोड़ो! इन बच्चों पर ध्यान दो! इनके माता-पिता को भी कहता हूँ – बच्चों पर ध्यान दो! ये अब हाथों बातों में नहीं रहे हैं! 

मैं इस लेट जेन ज़ी के पक्ष में भी बहुत कुछ सोचता हूँ। लेकिन संकट इतना बड़ा है कि तुरंत कोई कार्यवाही चाहिए। यह बच्चे अपना सारा इतिहास, सारा शब्दकोश और सारा परिवेश भुलाकर कोचिंगों में पढ़ रहे हैं। इनके पास न अख़बार का समय है, न मीडिया का। यदि कुछ लोगों का यह तर्क मान भी लें कि सारे अख़बार और न्यूज़ चैनल मोदीजी ने खरीद लिए हैं तो मेरा यह कहना है कि जब सब कुछ सोनिया जी के चरणों में था और अरिंदम चौधरी जैसा “फ़्रॉड” राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित होता था, तब हम भी तो ऐसी ही किसी दूसरी “गोदी मीडिया” के भरोसे थे। हमने तो विनोद दुआ जैसे पत्रकार को सोनिया जी के पाँव छूते देखा है। यह तो सत्ता के खेल हैं। कल कांग्रेस, आज बीजेपी तो कल फिर कांग्रेस। लेकिन यह बच्चे खेल नहीं हैं। वे हमारी आशाएँ हैं। हमारा जिया हुआ एक-एक क्षण उन्हीं के लिए है और कमाई की एक-एक पाई तो उनके लिए है ही। मेरा कमेंट वॉक्स चाहे गालियों से भर जाए। लेकिन मैं मेरे बच्चे की जीभ काट दूंगा यदि मेरे बच्चे ने यह नहीं सीखा कि कब कौन-सी बात कहाँ कहनी है। कुछ कमीने चाहे लाख तर्क दें कि “अस्तित्व” ज़रूरी है या “भाषा की तमीज़”! लेकिन सच यही है हमारा अस्तित्व हमारी भाषा से ही बना है।मैं अपने हृदय के फूल और आँख के आँसू ही तो वसीयत कर सकता हूँ। मेरे पास मेरी टूटी-फूटी कमज़ोर कविताओं के अलावा कोई पूँजी नहीं। 

मेरे बच्चे! 

मैं तुम्हें सच में “अच्छा बच्चा”, आगे जाकर “समझदार लड़का”, उससे आगे जाकर “कमाल का आदमी” बनते हुए देखना चाहता हूँ। चूँकि मैं “सीकर” का हूँ। इसलिए ऑटोमैटिकली “कोटा” का भी हूँ। भोपाल और दिल्ली और कानपुर का भी हूँ। सब जगह यही फैक्ट्रीयां चल रही हैं। ऐसी कोई मशीन नहीं कि इधर से आलू डालो तो उधर से सोना निकले। सड़ी हुई चिप्स ही निकल रही हैं। प्लास्टिक के कुरकुरे जैसे कमज़ोर और टेढ़े-मेढ़े लड़के और संघर्ष के एक झोंके में उड़ जाने वाली आलू की चिप्स जैसी पतली-कुपोषित लड़कियाँ! कोई तो रोक लो भाई!!!! 

( नोट : मैंने इस लेख के शीर्षक में “ज्ञान मत दो” लिखा। मैं चाहता तो यह भी लिख सकता था : “ज्ञान मत ,,,,,,”! 

लेकिन “ज्ञान” लिया और दिया ही जाता है। ,,,,,, नहीं जाता। भाषा ही वह रौशनी है, जो हमारी अँधेरी आत्मा को प्रकाशित करती है या प्रकाशित होने का आभास देती है। गालियों को “एज़ इट इज़” लिखने के लिए मैं शर्मिंदा हूँ। इसके लिए पाठकों से क्षमा। वे मेरी मजबूरी समझेंगे। )

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