2010 के बाद जन्मी पीढ़ी,माता-पिता और भविष्य की परिकल्पना

2010 के बाद जन्मी पीढ़ी,माता-पिता और भविष्य की परिकल्पना

(नीट आंदोलन के संदर्भ में एक संतुलित विचार)

सुरेश सरदाना  

वर्ष 2010 के बाद जन्मी पीढ़ी को अक्सर “डिजिटल पीढ़ी” कहा जाता है। यह वह पीढ़ी है जिसने जन्म लेते ही मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में आँखें खोली हैं। इनके लिए जानकारी प्राप्त करना जितना सरल है, उतना ही कठिन है सही और गलत के बीच अंतर करना। ऐसे समय में माता-पिता की भूमिका केवल पालन-पोषण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उन्हें संस्कार, संयम, संवेदनशीलता और विवेक का भी सबसे बड़ा स्रोत बनना होगा।

बीते डेढ़ दशक में समाज में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है। पहले माता-पिता बच्चों को समय देते थे, कहानियाँ सुनाते थे, जीवन-मूल्य सिखाते थे और परिवार ही उनकी पहली पाठशाला होता था। आज अधिकांश परिवारों में आर्थिक समृद्धि तो बढ़ी है, किंतु समय का अभाव भी उतना ही बढ़ गया है। माता-पिता बच्चों को अच्छी शिक्षा, महंगे विद्यालय, आधुनिक सुविधाएँ और डिजिटल उपकरण तो उपलब्ध करा रहे हैं, परंतु चरित्र निर्माण, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व के लिए आवश्यक संवाद धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

इसी का परिणाम है कि आज की नई पीढ़ी ज्ञान में तो अत्यंत तेज़ है, किंतु अनेक बार धैर्य, सहिष्णुता और असहमति को सम्मानपूर्वक व्यक्त करने की कला में कमजोर दिखाई देती है। छोटी-सी असफलता भी उन्हें मानसिक तनाव, आक्रोश और निराशा की ओर धकेल देती है।

हाल ही में नीट परीक्षा से जुड़े विवाद और आंदोलनों के दौरान देश ने अनेक प्रकार के दृश्य देखे। यह सत्य है कि यदि किसी परीक्षा में अनियमितता हो तो विद्यार्थियों का शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक विरोध करना उनका अधिकार है। युवाओं की आवाज़ सुनी जानी चाहिए और उनके साथ न्याय होना चाहिए। किंतु कुछ स्थानों पर आंदोलन के दौरान जिस प्रकार अभद्र भाषा का प्रयोग, सामाजिक मर्यादाओं की अनदेखी, आक्रामक व्यवहार तथा असंयमित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं, उसने समाज के चिंतनशील वर्ग को चिंता में डाल दिया।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ऐसे व्यवहार को पूरी युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व नहीं माना जा सकता। अनेक विद्यार्थी पूरे आंदोलन के दौरान शांतिपूर्ण, संयमित और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखते रहे। फिर भी जहाँ कहीं भाषा की गरिमा टूटी, संवाद की जगह आक्रोश ने ले ली और तर्क की जगह कटुता दिखाई दी, वहाँ यह प्रश्न अवश्य उठा कि क्या हमारी शिक्षा केवल प्रतियोगी परीक्षाएँ पास कराने तक सीमित रह गई है? क्या हम बच्चों को सफलता का महत्व तो बता रहे हैं, परंतु असफलता को गरिमा के साथ स्वीकार करना नहीं सिखा पा रहे?

आज सबसे बड़ी चुनौती बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की भी है। अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, तुलना, सोशल मीडिया पर दिखावटी सफलता और माता-पिता की ऊँची अपेक्षाएँ कई बार बच्चों पर असहनीय दबाव बना देती हैं। परिणामस्वरूप उनका आत्मविश्वास बाहरी उपलब्धियों पर निर्भर होने लगता है। जब अपेक्षाएँ टूटती हैं, तब क्रोध, निराशा और असंतुलित व्यवहार सामने आ सकता है।

ऐसी परिस्थिति में माता-पिता को भी आत्ममंथन करना होगा। क्या हम बच्चों को हर सुविधा देकर अपने दायित्व से मुक्त हो सकते हैं? क्या हमने उन्हें विनम्रता, सहानुभूति, संवाद, धैर्य और सामाजिक उत्तरदायित्व का अभ्यास कराया है? क्या हमने उन्हें यह सिखाया है कि अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी पालन करना होता है?

भविष्य की परिकल्पना केवल तकनीकी रूप से सक्षम बच्चों की नहीं, बल्कि नैतिक रूप से सुदृढ़ नागरिकों की होनी चाहिए। यदि 2010 के बाद जन्मी पीढ़ी को सही दिशा देनी है तो परिवार, विद्यालय और समाज—तीनों को मिलकर कार्य करना होगा। विद्यालयों में केवल अंक प्राप्त करने की दौड़ नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास, भावनात्मक संतुलन, संवैधानिक मूल्यों और संवाद की संस्कृति पर भी समान बल देना होगा। माता-पिता को बच्चों के साथ प्रतिदिन कुछ समय बिना मोबाइल और स्क्रीन के बिताना चाहिए। परिवार में भोजन साथ करना, विचार साझा करना और बुज़ुर्गों के अनुभव सुनना भी बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।

भारत का भविष्य केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक या आर्थिक विकास से महान नहीं बनेगा। वह तब महान बनेगा जब हमारे बच्चे ज्ञान के साथ विवेक, सफलता के साथ विनम्रता, अधिकारों के साथ कर्तव्य और स्वतंत्रता के साथ अनुशासन को भी अपनाएँगे।

अंततः, 2010 के बाद जन्मी पीढ़ी स्वयं कोई समस्या नहीं है; वह तो हमारे वर्तमान समाज का प्रतिबिंब है। यदि हम उन्हें संस्कार, संवेदना और संतुलित दृष्टि देंगे तो वही पीढ़ी भारत को विश्व में नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी। किंतु यदि हमने केवल सुविधाएँ दी और मूल्य नहीं दिए, तो तकनीकी रूप से समृद्ध होकर भी सामाजिक और नैतिक दृष्टि से हम एक गंभीर संकट का सामना कर सकते हैं।

यही समय है—बच्चों का भविष्य बनाने से पहले, माता-पिता और समाज को अपना वर्तमान सँवारने का।

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