आदर्श विद्या मंदिर के वे दिन और “गो-मूत्र” और प्रियंका गाँधी
मनमीत सोनी 
वे आदर्श विद्या मंदिर, चूरू के सहज – सरल दिन थे। मैं चूरू (राजस्थान) में गया – गया ही था। तीसरी कक्षा का छात्र। नीली निक्कर और आधी बांहों के सफ़ेद शर्ट वाला नन्हा बालक। आदर्श विद्या मंदिर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाने वाली संस्था ही थी। वामपंथी सदा से इन विद्यालयों को गाली देते आए हैं और मुझ जैसे राष्ट्रवादी इन गालियों का उत्तर अपनी शिष्टता और तर्कणा से देने के लिए स्वयं को बाध्य समझते हैं। वे दिन सम्भवतः जीवन के सबसे सुरभित दिन थे। गायत्री मंत्र, भोजन मंत्र, कल्याण मंत्र, कराग्रे वसते लक्ष्मी के दिन। शेर – बकरी के दिन। खो – खो के दिन। कबड्डी के दिन। पकड़म पकड़ाई और डबल बिल्लो के दिन। गृह – कार्य के दिन। दैनंदिनी में हस्ताक्षर के दिन। पिता के घोर संरक्षण और माता की गोद में भागकर छुप जाने के दिन। विद्या मंदिर के अध्यापकों को गुरुजी या आचार्य जी कहने के दिन। आचार्य जी के सफ़ेद झक्क कुर्ते पायजामों के दिन। एटलस की ऊँची साइकिलों के दिन। वही दिन कि आदर्श विद्या मंदिर के पीछे के खुले प्रांगण में गायों और उनके बाछों को पालने के दिन। गो-शाला से उठती हुई उस पवित्र गंध के दिन। गाय के गोबर के सूखे हुए उपलों पर सिकती हुई रोटियों के दिन। उस मिट्टी के दिन जिसमें हम पानी छिड़कते थे। हम तरसते थे कि कब आधी छुट्टी या पूरी छुट्टी हो और हम भागकर हमारी गाय – माताओं के पास चले जाएं। उन्हें हरी ताज़ी घास खिलाएं। उन्हें लोहे की बाल्टियों में पानी पिलाएँ। अपने घर से अपने भोजन के लिए लाई हुई गुड़ – रोटी परोसें। गायें हमें चाटती थीं। बहुत लाड करते थे तो गायों की आँखों में पानी छलक जाता था। उनकी खुरदरी जीभ से कोमल उन दिनों केवल एक चीज़ थी : विद्या मंदिर की बहिनों द्वारा बांधी जाने वाली राखियों का वह लाल – पीला रेशमी धागा!
हम पर कोई दबाव न था कि हम गो-शाला जाएं। उल्टा होता यह था कि आचार्य जी तो हमें मना करते थे : पढ़ लो बच्चो! लेकिन हम न मानते थे। हमारी माँएँ हमें पुकारती थीं। हम हमारी माँओं के खान – पान, प्यास और पानी और लाड और दुलार के लिए प्रतिबद्ध थे। गोपाष्टमी और जन्माष्टमी पर तो जैसे हमारे पंख उग आटते थे। हम गायों को सजाते थे। उनके पाँवों में घुँघरू बाँधते थे। उनकी पूजा करते थे। उन्हें तिलक लगाते थे। वहीं पास में गो-मूत्र से गो-मूत्र अर्क बनता था। गायों के मूत्र को इकट्ठा करके उसे बाल्टी में भरना। फिर उसे सूत के कपड़े से तीन – चार बार कपड़ – छान करना। फिर उसे एक मशीन से आसवित करना। फिर उस औषधि को बूँद – बूँद रिस कर टपकते हुए देखना। फिर उसे कांच की बोतलों में सुरक्षित करना। फिर उन पर काग़ज़ की फर्री चिपकाना। और सुंदर हस्तलेख से लिखना : “गो-मूत्र”! ईश्वर साक्षी है कि इन पंक्तियों को लिखने में भी वह आनंद नहीं जो केवल उस एक शब्द को लिखने में था। हमें घिन्न न आती थी। हम गीता – प्रेस के आरोग्य – अंक के पाठक थे। हमें मधुमेह से लेकर यूरिक एसिड से लेकर अध-कपारी से लेकर लकवे से लेकर कैंसर तक की मूलभूत जानकारी थी।शिरोपीड़ा तो हम हथेली के कुछ पॉइंट्स दबाकर ही ठीक कर लेते थे। किसी के उल्टी होती या जी घबराता तो हमारे विद्यालय में सैंधव नमक और अजवायन का मिश्रण भी था। हमने रस -सिंदूर से लेकर कौन्च के बीज तक की औषधियों की बहुत सारी जानकारी तो यूं ही प्राप्त कर ली थी। वे बिखरे हुए अध्यवसाय के दिन थे। नंदन, चंपक और बाल – भास्कर के अतिरिक्त विष्णु सहस्त्रनाम, अमोघ शिव कवच और दुर्गा सप्तशती के सस्वर पाठ के दिन।
कल श्रीमती प्रियंका गाँधी को गो-मूत्र का उपहास उड़ाते हुए संसद में सुना। मैं जान गया, इस परिवार ने केवल कुत्ते और बिल्लियों जैसे जीव पाले हैं। इनके स्विमिंग पूल्स में बत्तख तैरते होंगे, लेकिन इनके मन श्वेत बत्तखों से विपरीत उतने ही काले हैं।इन्होंने “टॉमी – टफी – रेंचो – पिंटू” इत्यादि कुकुरों को पाला है। “सीता – गीता – ममता – मानसी” जैसी गायों को नहीं। इस स्त्री के भीतर ममत्व कैसे हो सकता है? यह, जो एक “जीनियस” वैज्ञानिक को “गो-मूत्र” एक्सपर्ट बता रही है, इसने कभी गाय के गोबर के उपले न थापे होंगे। इसने गाय को चारा पानी नहीं नीरा होगा। इसने गाय की खाल पर हाथ न फिराए होंगे। इसने गाय की आँखों में आँखें डालकर उस अप्रतिम करुणा के दर्शन न किये होंगे। इसने गाय को गुड़ – रोटी न खिलाई होगी।
गो-मूत्र औषधि है या नहीं : मैं नहीं जानता। हालांकि मेरा मन कहता है कि ऐसा है। वैज्ञानिक अधिक जानते होंगे। लेकिन गाय से प्राप्त पंचगव्य मेरी आस्था का घनीभूत केंद्र है। मैं गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और घी को अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु और आकाश के समतुल्य मानता हूँ। मेरे जीवन का प्रारम्भ इन्हीं तत्वों से हुआ। मेरे जीवन का तर्पण भी इन्हीं तत्वों के सहारे होगा। मेरा पुत्र मेरा कपाल खोलेगा, तो उसे गाय का देशी घी चाहिए होगा। पंडित जी हवन करवाएंगे, तो उसमें घी के साथ – साथ गोबर के उपले भी लगेंगे। मेरा मृत्यु – भोज बिना दूध और दही के न हो सकेगा। और गो – मूत्र…वह भी चहिये होगा, जब मेरे परिवार में कोई नया बच्चा जन्म लेगा…!!!
आज “गावो विश्वस्य मातर:” का उद्घोष मेरी धमनियों में बज रहा है। मेरे गले में एक सुंदर घंटी है, जो अहर्निश बजती ही रहती है। मेरे पांवों और हाथों में शब्दों के नीले घुँघरू हैं। मेरी आत्मा के माथे पर सिंदूरी तिलक। मैं, विश्व की सभी गायों की ओर से एक प्रतिनिधि हूँ। मेरा अस्तित्व दूध से धुला है। मेरे होने के आँगन में लिपा हुआ है गोबर। मेरी लिखत की दीवारों पर हैं मेरी माँ के हाथों लाल – सुगंधित रोली से माँडे हुए माँडने।
मैं, अबोध प्रियंका गाँधी की चालाक और धूर्त हँसी को क्षमा करता हूँ। ईश्वर उन्हें गायों के निकट ले जाए। वे समझें कि जीवों में गाय – सा सरल सहज सुंदर जीव कोई नहीं। गाय साक्षात ममत्व है। आभार प्रियंका जी, यदि आपकी टिप्पणी न देखी – सुनी होती तो आदर्श विद्या मंदिर के वे महान दिन याद न आते। आरोग्य – अंक को झाड़ने से उठती हुई स्वर्ण – धूल में मेरा मन आज न नहा रहा होता। मेरी आत्मा को न चाट रही होती, किसी गाय की खुरदरी जीभ!






