माता के संस्कार ओर पुत्र 

माता के संस्कार ओर पुत्र 

 

डॉ निर्मला शर्मा

महाभारत में मुख्य रूप से दो माँए समानांतर अपने पुत्रों की परवरिश करती हैं – एक कुंती और दूसरी गांधारी।

राजमहल एक ही है, वंश एक ही है, लेकिन फिर भी दोनों माँए अपने बच्चों को अलग-अलग तरह से संस्कारित करती है। जहाँ एक और थोड़ा सा भी गलत बोलने पर, अपनों से बड़ों की आज्ञा की थोड़ी सी अवमानना करने पर कुंती अपने पुत्रों को डाँट देती है और तुरंत क्षमा मांगने के लिए कहती है , वहीं दूसरी ओर गांधारी अपने पुत्र की हर गलती को छुपा कर, बड़ों के अपमान को अपना प्रतिशोध समझकर खुश होती है और चुप रहती है। 

    जैसे-जैसे ये बच्चे बड़े होते हैं देखिए उनमें किस तरह के संस्कार आते हैं।  एक इस जिद पर अड़कर बैठ जाता है कि सब कुछ मेरा ही है। किसी को कुछ नहीं दूंगा और दूसरी तरफ संस्कारित पुत्र थोड़ा सा मिलने पर भी खुश होकर लेने को राजी हो जाते हैं, किंतु जिद्दी पुत्र अपने कुल का सर्वनाश के लिए तुला रहता है। युद्ध को निमंत्रण देता है और एक दिन अपना और अपने कुल का पूरी तरह से सर्वनाश कर देता है। 

 इस बात के माध्यम से यही कहना चाहती हूँ कि पांडवों को भले ही हमेशा राजमहल में रहने का सौभाग्य नहीं मिला किंतु उनकी माता ने उनको बहुत अच्छी तरह से पाला- पोसा और संस्कार सिखाएं। दुर्योधन भले ही हमेशा राजमहल में रहा किंतु उसके संस्कार गड़बड़ ही रहे। जिसका नतीजा पूरे कुरूवंश को भुगतना पड़ा। ऐसा अनेक घरों में भी होता रहा है जो बच्चा है हमेशा बाहर रहे हैं वे संस्कारी होते हैं क्योंकि बाहर की दूरियों के थपड़े पड़ते हैं और जो हमेशा घर में ही रहे वह आराम की वजह से जिद्दी ही हो जाते हैं। 

इन माताओं के संस्कारों को एक शिक्षक के संस्कारों से जोड़कर भी देखा जा सकता है कि एक ही विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ाते हुए, एक गुरु अपने बच्चों को सीखाता है कि बड़ों का सम्मान करो, उनको इज्जत दो, राष्ट्र की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझो, उसे कभी नुकसान मत पहुंचाओ यही राष्ट्रवाद है। दूसरी ओर एक गुरु अपने बच्चों के गाली -गलौज करने पर खुश होता है। बड़ों का अपमान करने पर उनको शाबाशी देता है और राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर भी उसको नजरअंदाज करता है ,यही वामपंथ है। राष्ट्रवाद हमेशा राष्ट्र को जोड़ने की बात करता है और वामपंथ ,,,,,,,,

 

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