जेन जी आंदोलन ,धीरे -धीरे देखिए होता है क्या
हरीश ब शर्मा 
सरकार का क्या होगा? यह सवाल अब फिर से अमित शाह का हो गया है। मानसून सत्र खत्म होने तक सब सामने भी आ जाएगा।
एक नई चिंता आधार वालों ने डाल दी है। दरअसल, जंतर मंतर वाले प्रोटेस्ट में कुछ खास किस्म की तकनीक इस्तेमाल की गई, जिस से इस प्रोटेस्ट में शामिल युवाओं की पहचान हो सके, पहचान के प्रूफ घरों तक पहुंच रहे हैं, वो भी आधिकारिक माध्यमों से नहीं बल्कि आईटी सेल से।
इन्हें देख-दाख कर भूणिये खिसक चुके हैं पैरेंटों के।
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान समाज का एक चेहरा जो जंतर मंतर से सामने आया है, मात-पिताओं के चूलिये हिलाने वाला है। जेन जी के जारी हो रहे एमसी-बीसी ही नहीं एक्सट्रीम वाली #$¢€£&# वाले वीडियो देखकर मम्मियों और पापाओं को पहली बार अपने बच्चों के उस भाषा-ज्ञान का अहसास हुआ है, जिनके शब्दकोश उन्होंने कभी खरीदे ही नहीं!
तो क्या, इसके लिए स्कूलें लगती हैं? हम बीकानेर वालों को बड़ा गुरूर था कि होली पर हम जैसी गालियां कोई नहीं निकाल सकता, लेकिन मोदी को जितनी गालियां और बड़ी धज के साथ पड़ी है, बीकानेर वालों को लग गया कि राजधानी के आगे हम वाकई गांवड़े ही हैं।
बहरहाल, इन दिनों इस तरह के वीडियो में सर्वाधिक दिलचस्पी उनकी है, जिनके होनहार दिल्ली या बड़े शहरों में पढ़ रहे हैं। इस हिचके में कुछ लोगों ने तो रील्स देखनी ही बंद कर दी की सामने से कहीं ‘पापा की परी’ या ‘मम्मी का मगरमच्छ’ प्रकट नहीं हो जाए।
डर लाजमी है। आज जो मोदी को गालियां दे रहे हैं। कल पैदा करने के अपराध में अपने अभिभावकों को भी लताड़ सकता है। लड़के-लड़कियों के हाथ में पकड़े कार्टबोर्ड की भाषा से मम्मियों और पापाओं का भी अभिषेक हो सकता है, डर तो निकल चुका। अब क्या।
डर के आगे जीत है।
जीतो!! काढ़ो बाप रो नाम!
बता दूं, यह सब आज का नहीं है। बरसों का जमा है। विसंगतियों से भरा आक्रोश है, जिसे निकलना ही था।
इसे सकारात्मक लेना चाहिए। रेचन हुआ है जी। कोई बड़ी बात नहीं कि अभिभावकों को अब आरएसएस अच्छी लगने लगे। आदर्श विद्या भारती का प्रवेशोत्सव शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाए।
घर-घर में यही विमर्श है कि ऐसी होती है जेन जी?
मजे की बात जो लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में प्रतिघंटा साठ की औसत से गालियां निकालते हैं, वे भी सहमे हुए हैं। जो बिचारे अभी तक एमसी बीसी से बाहर नहीं निकले थे। बल्कि, इनका उपयोग करते हुए भी आसा-पासा देखते थे, वे भी हतप्रभ हैं।
गालियों के अपडेटेड वर्जन मिल रहे हैं। इनकी दड़ाछंट अदायगी दंग करने वाली है। भेजा तो पढ़ने था… बहरहाल, सोशल मीडिया में अपने नौनिहालों के निहाल करने वाले वीडियो में आ जाने से आशंकित अभिभावक हर सुबह अपने बच्चों को सुभाषित भेजने लगे हैं। संस्कार और तिलक चैनल वाली रील्स भेजी जा रही हैं।
हुजूर आते आते बहुत देर कर दी। अब तो घाण ही बिगड़ चुका है। कुएं में ही भांग पड़ चुकी है। खुमारी तो चढ़ेगी ही। आज मोदी को गालियां देने वाले कल पैदा करने वालों को कहां छोड़ेंगे। पता चल गया ना कि सरकार भी ऐसे झुक जाती है। बाप की क्या औकात…! ताल मिलाओ अभिषेक दीपके के साथ और गाओ, ‘झुकती है दुनिया…’
बैक फुट पर सरकार आई है या यह एक बड़ा शॉट है, नहीं पता, लेकिन जिस तरह से पूरी पीढ़ी चौड़े आई है, पैरेंट्स सहमे हुए हैं। इधर तो दूसरे भी दूसरों को गाली निकालते हैं तो बुरा लगता है…अचरज इस बात नहीं कि गालियां किसे निकाली जा रही है। अचरज इस बात का है कि गालियां इन्होंने सीखी कहां से? गालियों का एक मनोविज्ञान है, जो जानते हैं उनका मानना है कि यह कुंठाओं की उपज होती है। तो क्या पीढ़ी कुंठित हो रही है?
बड़े सवाल हैं। सामना कीजिए। कल सत्ता बदल जाएगी, लेकिन बच्चे हमारे ही रहेंगे। परिवार हमारा रहेगा। और जब सत्ता का हंटर चलेगा, दोष मां-बापों पर मढ़ दिया जायेगा, आपने समझाया नहीं।
समझाते क्या धूड़!
अब पछताए होत क्या,जब चिड़िया चुग गई खेत
सुना है युवाओं की कुंडलियां बन रही है, क्योंकि आंदोलन के दौरान जिन तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, उसमें एक तकनीक आधार से लिंक भी थी। संभव है परिवारों तक नौनिहालों के कारनामे भी पहुंचें। यह भाजपा की कूटनीतिक जीत होगी। युवाओं पर नाज़ करने वाले देश का सिर शर्म से झुका होगा। प्रजा अपराधबोध की शिकार होगी। व्यवस्था को सुधारने की गुहार करेगी। राजा राज करेगा। सारे लोग सिरफिरे नहीं होते। बैठ के सोते हैं। घर तबाह होते देखना कोई नहीं चाहता।






